03-Jan-2015 05:51 AM
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मंडीदीप की दावत राइस मिल में किसानों की धान की 128 करोड़ कीमत की जो 8 लाख 15 हजार बोरियां जल गईं थीं, अब उस आग का रहस्य और गहरा गया है। श्रम विभाग की एफआईआर में मिल के मालिक राजेंद्र वाधवा और प्रबंधक राजेश जायसवाल को प्रथम दृष्ट्या दोषी बताया गया है, लेकिन आग किन कारणों से बेकाबू हुई? किसने लगाई? ये सारे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। दावत के मालिकों ने मप्र के भोले-भाले मुख्यमंत्री को सब्जबाग दिखाकर मिल के लिए सरकार से कई रियायतें प्राप्त की और अब बीमा राशि हड़पने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जा रहा हैं।
काराखाना अधिनियम 1948 की धारा 38 में अलग-अलग तरह के कारखानों के लिए अलग-अलग तरह की नियमावली है। चावल मिल में भंडारण और उत्पादन के उपरांत कचरे के निपटान से लेकर तैयार माल को उचित तरीके से रखने और उसके परिवहन के नियम-कायदे हैं। लेकिन दावत मिल पर तो सरकार की मेहरबानी थी। श्रम मंत्री अंतर सिंह आर्य ने 14 जून को जब दावत मिल का निरीक्षण किया था, उस वक्त उन्होंने मिल प्रबंधन को शासन से सहायता दिलाए जाने का आश्वासन दिया था। इस आश्वासन के बाद यह तो तय हो गया था कि मिल प्रबंधन के प्रति नरमी बरती जाएगी लेकिन जब कंपनी के संचालक और मैनेजर के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रायसेन की अदालत में चालान प्रस्तुत किया गया, तो हड़कंप मच गया। श्रम विभाग ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है उसमें फैक्ट्री की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं। भंडारण से लेकर अग्निकांड से बचने की व्यवस्था तक कई खामियां पाई गई हैं। सबसे बड़ी कमी तो यह है कि किसानों की मेहनत से उपजाई गई 45 हजार मीट्रिक टन धान को अलग-अलग रखने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि सारा धान एक ही जगह कंपनी परिसर में इस तरह रखा हुआ था मानो इसे आग में ही झोंकना है।
इस फैक्ट्री में 1 साल की भीतर 4 बार आग लग चुकी थी। वर्ष 2013 में 25 जून को धान के गोदाम में आग लग गई, जिससे बड़ी मात्रा में धान गीली हो गई और करोड़ों का नुकसान हो गया। 2013 में ही दीवाली के आस-पास बिजली गिरने से धान जल गई। 2014 में अप्रैल माह में धान के भूसे में आग लग गई। लेकिन इसके बाद भी कंपनी प्रबंधन सुप्त बैठा रहा। इस तरह की बड़ी मिलों में आग से बचने के जो इंतजाम किए जाते हैं, वे इंतजामात दावत राइस मिल में नहीं हैं। इसीलिए एक वर्ष में चौथी बार आग लगी। चौथी आग इतनी भयानक थी कि भोपाल नगर निगम, कोलार नगर पालिका, भेल, मंडीदीप, औबेदुल्लागंज, सुल्तानपुर, बाड़ीबरेली, नसरुल्लागंज, शाहगंज और बुदनी से दमकलें आईं लेकिन एचईजी, वर्धमान और नाहर जैसी कंपनियों से भी दमकलें बुलानी पड़ीं। कुल जमा 36 के करीब दमकलें आग को बुझा पाईं। इसका अर्थ यह हुआ कि आग को इस हद तक धधकने दिया गया। यदि नजदीक ही रैकप्वाइंट तक आग पहुंच जाती तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता। मीलों दूर से आग की लपटें और धुंआ देखा जा सकता था। अब श्रम विभाग ने जो रिपोर्ट सौंपी है उसमें कंपनी प्रबंधन को सीधे-सीधे निशाना बनाया गया है। सवाल यह है कि दोषियों पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? सुनने में तो यह भी आया है कि दावत के खिलाफ दर्ज प्रकरण वापस लेने की तैयारी की जा रही है। क्योंकि मजिस्ट्रेट के सामने जब यह मामला आएगा और कारखाना अधिनियम 1948 का हवाला देते हुए पूछताछ होगी तो कंपनी की पोल खुल जाएगी। दावत कंपनी के मालिकों की मध्यप्रदेश सरकार के आला अफसर और मंत्रियों से निकटता छिपी नहीं है।
दावत को मध्यप्रदेश में आने के लिए सरकार ने ही हर प्रकार की सहूलियत दी थी और नियमों को ताक पर भी रखा गया। दावत ने बुधनी के आस-पास की जमीनें भी खरीदीं। किसानों से कहा कि आप धान पैदा कीजिए हम खरीद लेंगे। लालच में किसानों ने भी धान उपजाना शुरु कर दिया लेकिन दावत की मिल में धान के उचित भंडारण की व्यवस्था ही नहीं की गई। कंपनी ने किसानों को बरगलाया कि मंडी शुल्क ज्यादा होने के कारण कंपनी किसानों को सही दाम नहीं दे पा रही है। यदि किसान सरकार पर मंडी शुल्क में छूट के लिए दबाव बनाएंगे तो उन्हें लाभ मिलेगा। बाद में चावल मिल तथा किसानों के दबाव में आकर सरकार ने मंडी शुल्क में छूट दे दी। बताया जाता है कि छूट लेने के लिए दावत प्रबंधन ने अंधाधुंध खरीदी की थी पर उस धान को लापरवाही से रखा गया था। इसी कारण इस भयानक आग में 8 लाख से अधिक धान की बोरियां जल कर नष्ट हो गईं। इस प्रकरण में एक खास बात यह है कि मंडी बोर्ड ने इस राइस मिल पर छापा भी मारा है, जिसमें मंडी टैक्स चुराने की बात उजागर हुई है। लेकिन किसानों के मार्फत दबाव बनाकर और सरकार में अपनी पहुंच का फायदा लेकर कंपनी प्रबंधन ने करोड़ों का मंडी शुल्क बचा लिया। अब सवाल यह है कि क्या कंपनी को बचाने के लिए सरकार इस मामले को ठंडे बस्ते में डालने जा रही है? लगभग 180 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है और कंपनी ने 128 करोड़ रुपए का बीमा क्लेम किया है। यदि सरकार मुकदमा वापस नहीं लेती है तो कंपनी को बीमा का क्लेम भी नहीं मिलेगा। इसीलिए श्रम निरीक्षक का तबादला भी कर दिया गया है।