02-Jan-2015 02:46 PM
1237737

नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के नेतृत्व में हिंदुत्व सेना विहिप के कथित घर वापसी अभियान पर आमने-सामने हैं। मोहन भागवत का कहना है कि जो भी व्यक्ति हिंदू धर्म से भटका है, उसे घर वापस लाएंगे। अगर किसी व्यक्ति को यह पसंद नहीं तो इसे रोकने के लिए कोई कानून बनाए। हम धर्म परिवर्तन के लिए बाहर नहीं निकले हैं, लेकिन अगर हिंदू परिवर्तन नहीं करेंगे तो हिंदू धर्म कभी नहीं बदलेगा। हम इस मामले पर तटस्थ हैं। हम अपने लोगों को उनसे बचाएंगे जो दूसरों का सिर काटते हैं।
उधर धर्म जागरण समिति के राजेश्वर सिंह ने तो खुलेआम घोषणा कर दी है कि 2021 तक सबको हिंदू बना दिया जाएगा। योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति ने जो आग सुलगाई थी उसमें घी डालने का काम अब हिंदूवादी संगठन कर रहे हैं। राजेश्वर सिंह ने इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट का हवाला देते हुए साफ कहा है कि ईसाइयों और मुसलमानोंं को भारत में रहने का कोई हक नहीं है। इसी कारण हिंदुत्व पर संसद गर्माई हुई है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री हिंदुत्ववादी ताकतों से परेशान हैं और दूसरी तरफ संसद में उनसे धर्मांतरण पर सफाई मांगी जा रही है। उधर सुषमा स्वराज ने यह कह कर विवाद को और हवा दे दी है कि जब तक कानून नहीं बन जाता घर वापसी जारी रहेगी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी धर्मांतरण पर कानून बनवाने के पक्ष में हैं और इसलिए विभिन्न राजनीतिक दलों से सहयोग की मांग भी कर बैठे हैं। लेकिन इस कवायद से दो बातें साफ नजर आ रही हैं। एक तो संघ परिवार सरकार पर दबाव बना रहा है कि वह धर्मांतरण के खिलाफ कोई सख्त कानून का ड्राफ्ट तैयार कर उस पर बहस कराए।
विरोधी दल भी इस साजिश को समझ रहे हैं, लेकिन उन्हें डर है कि ऐसा कानून बनने से नुकसान हिंदुओं को नहीं बल्कि ईसाइयों और मुसलमानों को उठाना पड़ेगा। इसीलिए चालाकी से धर्मांतरण पर हल्ला मचाया जा रहा है। लेकिन यह कोलाहल हिंदूवादी ताकतों को और मजबूती प्रदान कर रहा है। सारे देश में आज मिशनरियां और मदरसे भयभीत हैं कि कहीं उन पर कोई कानून न लाद दिया जाए। लेकिन इस माहौल ने नरेंद्र मोदी के खुलकर काम करने के मंसूबों पर पानी फेरा है और भारत की विश्वव्यापी छवि को भी कहीं न कहीं धक्का पहुंच रहा है। जिसे नरेंद्र मोदी दुनिया भर की यात्राएं कर सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी का चुनावी एजेंडा कभी भी हिंदुत्व पर केंद्रित नहीं रहा। उन्होंने अपने चुनावी भाषणों में भी किसी विवादास्पद मुद्दे को हवा नहीं दी। वे सुशासन और विकास की बात करते रहे और जनता ने उन्हें इसी आधार पर ऐतिहासिक जीत से नवाज दिया। लेकिन आज बहुमत से जीतने वाले मोदी की राह में उनके अपने ही रोड़ा बने हुए हैं।नरेंद्र मोदी की इस सख्ती के बाद घर वापसी को लेकर माहौल थोड़ा हल्का तो हुआ है लेकिन तनाव और तल्खीअभी भी है। सूत्र बताते हैं कि विहिप ने 6 लाख लोगों की घर वापसी का लक्ष्य रखा है। राजस्थान के झालावाड़ से इस मुहिम की शुरुआत हुई थी। दरअसल राजस्थान, उत्तरप्रदेश सहित पश्मिोत्तर राज्यों में कई समुदाय ऐसे हैं जिनमें एक ही परिवार में हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों को मानने वाले पाए जाते हैं। विश्व हिंदू परिषद इस अनोखे और अनुकरणीय समुदाय को पूर्ण हिंदू बनाने का लक्ष्य निर्धारित कर चुकी है। अगले चरण में गरीब मुस्लिमों, ईसाईयों की घर वापसी कराई जाएगी और उसके बाद बाकी बचे लोगोंं पर ध्यान केंद्रित होगा। विहिप के कुछ नेताओं ने बयान भी दिया है कि वे आने वाले 10 वर्षों में सभी को वापस घर में बुला लेंगे यानी सभी को हिंदू बना लेंगे। विहिप का यह बयान अतिश्योक्तिपूर्ण और अतिरंजित लग सकता है लेकिन इस तरह के बयानों से भारत की छवि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बिगड़ रही है।मोदी आर्थिक उदारवाद और पूंजीवाद के मार्फत देश में गरीबी, भुखमरी जैसी समस्याओं से लड़ते हुए विकास की गति को तीव्रतर करना चाहते हंै। वे 18 लाख करोड़ की उन परियोजनाओं को गति देना चाहते हैं, जिनमें बहुत ढीला काम हो रहा है। लेकिन मोदी की दुविधा यह है कि सारे देश में हिंदू बनाम मुस्लिम या अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक का तनाव फैल रहा है। हाल ही में भोपाल में विहिप की प्रेस कॉन्फें्रस में रिटायर्ड मेजर सिन्हो ने चेताया है कि भारत को आस-पास के पड़ोसी देशों को देखकर चलना पड़ता है, क्योंकि आस-पास इस्लामी देश हैं। जाहिर है ऐसी कोई भी मुहिम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धक्का पहुंचाएगी।भारत एक ऐसे देश के रूप में पहचाना जाने लगेगा जहां सांप्रदायिकता तथा उग्र धार्मिकता का बोलबाला है। भारत की यह छवि बहुत दुखदायी सिद्ध हो सकती है। जिस तरह माहौल बिगड़ रहा है और हिंदू नेता उग्र से उग्रतर होते जा रहे हैं, वह भारत के लिए सुखद स्थिति नहीं है। धर्म जागरण मंच के राजेश्वर सिंह और विश्व हिंदू परिषद के बिहार के प्रमंडलीय प्रमुख राकेश सिन्हा, धर्म जागरण मंच के पदाधिकारी इन सबकी सक्रियता अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। उत्तरप्रदेश के बहराइच के कमलपुरी गांव मेें जब 70 लोग ईसाई बन गए तो तनाव उत्पन्न हो गया। उधर बिहार में भागलपुर जिले में ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले लोगों का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। बाद में इन लोगों की घर वापसी कराई गई। यह सच है कि इन क्षेत्रों में धर्मांतरण कुछ ज्यादा ही हुआ है और ईसाई मिशनरियों के संसाधनों का इंडिया होप सेंटर के कार्यकर्ताओं ने भरपूर उपयोग करते हुए कुछ क्षेत्रों में गरीब परिवारों को आर्थिक प्रलोभन या अन्य तरीके से ईसाई बनाने की कोशिश की है, इस समस्या से निपटने के लिए प्रशासन को सजग रहना चाहिए न कि विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों को। जो काम प्रशासन को करना चाहिए वह विहिप जैसे संगठन करेंगे तो माहौल अवश्य बिगड़ेगा। लेकिन अकेला धर्मांतरण का मामला नहीं है और भी कई मुद्दे हैं जो परेशान कर रहे हैं।
पहले लव जिहाद को लेकर बहुत हल्ला मचाया गया, उसके बाद गौवंश हत्या का मामला उछला फिर चौरासी कोस की परिक्रमा, यूपी के एक गांव में मंदिर में लाउड स्पीकर जैसे कई मुद्दे सारे देश में चर्चित रहे। उधर कालीकट में कुछ हिंदूवादी संगठनों ने किसी प्रेमी जोड़े की पिटाई कर दी, पुणे में एक मुस्लिम युवक की सोशल मीडिया पर कथित टिप्पणी के बाद उसकी हत्या कर दी गई। इस तरह के कई मुद्दे मोदी को तंग कर सकते हैं। संघ ने भी भारतीयों को हिंदू कहने और भारत की पहचान हिंदू से होने जैसे मुद्दे प्रारंभ में उठाए थे। सुषमा स्वराज गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाए जाने की पैरवी कर चुकी हैं।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिन मुद्दों पर संघ और भाजपा का रुख स्पष्ट है उनकी चर्चा दूर-दूर तक नहीं है। समान नागरिक संहिता पर ना तो कोई आंदोलन हुआ और ना ही कोई बात छिड़ी। इसी तरह धारा 370 पर भाजपा ने आश्चर्यजनक रूप से पाला बदल लिया। यहां तक की राम मंदिर का मुद्दा भी बहुत धीमे स्वर में उठाया जाता है। हाल ही में जब कासिम ने राम लला को मुक्त कराए जाने संबंधी बयान दिया था, उस वक्त अवश्य कुछ बयान सुनने में आए थे लेकिन बाकी समय तो दूसरे ही मुद्दे छाए रहे जो कि केंद्र में सत्तासीन सरकार के लिए गले की हड्डी हो सकते हैं।
घर वापसी क्रिया की प्रतिक्रिया?
यह सच है कि घर वापसी को एक आक्रामक हिंदू एजेंडे की शक्ल में प्रस्तुत किया गया है, किंतु क्या यह सच नहीं है कि घर वापसी के पीछे हिंदुओं की सदियों की पीड़ा और क्रोध भी है। जिस तरह पहले मुस्लिमों और फिर बाद में ईसाईयों ने भोले-भाले हिंदुओं का जबरिया या प्रलोभन देकर या बहका कर या जातिवाद का भय दिखाकर मतांतरण किया, आज उसी के चलते हिंदु समाज में एक ऐसा आक्रामक तबका तैयार हो चुका है जो हर उस व्यक्ति को वापस अपने धर्म से जोडऩा चाहता है जिसने भय या अन्य कारण से मतांतरण कर लिया था। हिन्दू समाज या सनातनी धर्म में धर्मांतरण जैसा कभी कोई शब्द या परम्परा अस्तित्व में नहीं रही। वहीं ईसाई और मुसलमान समाज में धर्मांतरण कराना एक धार्मिक कृत्य के रूप में गिना जाता है। केवल हिंदुत्व धर्मांतरण का समर्थन नहीं करता और केवल इस धर्म में धर्मांतरण के लिये कोई रस्म मौजूद नहीं है यह अकाट्य और तथ्यात्मक बात है। यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है कि कोई व्यक्ति हिंदू कब बनता है क्योंकि हिंदुत्व ने कभी भी दूसरे धर्मों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के रूप में नहीं देखा। वस्तुत: हिंदू होने के लिये व्यक्ति को हिंदू के रूप में जन्म लेना पड़ता हैÓ और यदि कोई व्यक्ति हिंदू के रूप में जन्मा है, तो वह सदा के लिये हिंदू ही रहता है।Ó
उपजी हुई नई परिस्थितियों के खतरे में कुछ दशकों से ही धर्मान्तरित हिन्दुओं की घर वापसी की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई है। यह प्रतिक्रियात्मक प्रक्रिया है जो क्षुब्द हिन्दू समाज को परिस्थिति वश अपनानी पड़ी है। धर्मांतरण के दंश से डसने वाले ईसाईयों और मुस्लिमों से उपजा हिन्दू समाज का यह दु:ख कोई नया नहीं है, 23,अप्रैल,1931 को यंग इण्डिया में महात्मा गांधी ने लिखा था- विश्वास करना और उनका सम्मान करना। इसका अर्थ है, सच्ची विनयशीलता। मानवतावादी कार्य की आड़ में धर्म-परिवर्तन रुग्ण मानसिकता का परिचायक है। यहीं लोगों द्वारा इसका सबसे अधिक विरोध होता है। आखिर धर्म नितांत व्यक्तिगत मामला है। यह हृदय को छूता है.. मैं अपना धर्म इस वजह से क्यों बदलूं कि ईसाई मत का प्रचार करनेवाले उस डॉक्टर का धर्म ईसाई है, जिसने मेरा इलाज किया है? या डॉक्टर मुझसे यह उम्मीद क्यों रखे कि मैं उससे प्रभावित होकर अपना धर्म बदल लूँगा?
हरिजनÓ में महात्मा गांधी ने लिखा
यदि मेरे पास शक्ति है तथा मैं इसका प्रयोग कर सकता हूँ तो मुझे धर्म-परिवर्तन को रोकना चाहिए। हिंदू परिवारों में मिशनरी के आगमन का अर्थ वेशभूषा, तौर-तरीके, भाषा, खान-पान में परिवर्तन के कारण परिवार का विघटन है।Ó मई, 1935 में एक ईसाई नर्स ने गांधीजी से पूछा था कि क्या आप मतांतरण के लिए मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगा देना चाहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा था, अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं मतांतरण का यह सारा खेल ही बंद करा दूं!Ó
महात्मा गांधी ने फिर लिखा
आज भारत में और अन्य कहीं भी धर्मांतरण की शैली के साथ सामंजस्य बिठाना मेरे लिए असंभव है। यह ऐसी गलती होगी, जिससे संभवत: शांति की ओर विश्व की प्रगति में बाधा आएगी। यदि हिंदू भला आदमी है या धर्मपरायण है तो वह इससे संतुष्ट क्यों नहीं हो पाता?Ó धर्मांतरण की पीड़ा से आहत महात्मा गांधी ने स्वयं स्वीकार किया था कि अन्य धर्म में धर्मान्तरित हो जानें पर हिन्दू जन प्राय: राष्ट्र के विरोधी और यूरोप के भक्त बन जाते हैं।
गांधीजी ने अपने बाल्यकाल में ही धर्मांतरण की यह पीड़ा अपने ह्रदय में अंकित कर ली थी जब वे स्कूलों के बाहर मिशनरियों से हिंदू देवी-देवताओं के लिए अपशब्दों भरे आख्यान सुनते थे। बहुत अध्ययन के बाद उन्होंने चर्च के मतप्रचार पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा था, यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों और गरीबों की सेवा करने के बजाय डॉक्टरी सहायता, शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करेंगे तो मैं उन्हें निश्चय ही चले जाने को कहूंगा। उन्होंने कहा था कि भारतीय का राष्ट्रधर्म अन्य राष्ट्रधर्मियों की भांति ही श्रेष्ठतम है। यहां प्रचलित मान्यताएं, परम्पराएं और धर्म श्रेष्ठ हैं और हमें किसी अन्य नए धर्म या मत की आवश्यकता कतई नहीं है।
वस्तुत: महात्मा गांधी विवेकानंद के उन शब्दों की आत्मा को पहचान गए थे जो स्वामी विवेकानद ने इस धर्मांतरण के पर भारतीय समाज को जागृत करते हुए कहे थे कि -जब हिंदू समाज का एक सदस्य मतांतरण करता है तो समाज की एक संख्या कम नहीं होती, बल्कि हिंदू समाज का एक शत्रु बढ़ जाता है।Ó आज कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में बैठे दलों को यह तथ्य समझना और गले उतारना होगा कि भारत में योजना-बद्ध तरीके से धर्मांतरण की मुहिम चलाने की रणनीति अपनाई जा रही है। आंकड़े की सुनें तो तथ्य है कि भारत में चार हजार से ज्यादा मिशनरी ग्रुप सक्रिय हैं जो धर्मांतरण की जमीन तैयार कर रहे हैं। त्रिपुरा में एक प्रतिशत ईसाई आबादी थी जो एक लाख तीस हजार हो गई है। अरुणाचल प्रदेश में 1961 में दो हजार से कम ईसाई थे जो आज बारह लाख हो गये है और कमोबेश ऐसी ही कहानियां देश भर के अन्य क्षेत्रों के सन्दर्भ में भी बनती जा रही हैं।