20-Dec-2014 06:14 AM
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ईशा ने सूली पर चढऩे से पहले कहा था कि परमात्मा इन लोगों को माफ कर देना, यह नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। किंतु नरेंद्र मोदी भलिभांति जानते हैं कि उनके मंत्रिमंडल के मंत्री और भाजपा के सांसद क्या बक रहे हैं और उनका आशय क्या है। साध्वी निरंजन ज्योति ने राम भक्तों को रामजादे कहा और बाकी सब को क्या कहा, यह मोदी बेहतर जानते हैं। फिर भी मोदी ने सदन में साध्वी का बचाव किया और कहा कि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में तो बड़ी मधुर और आत्मीय भाषा बोली जाती है, फिर साध्वी की जुबान इतनी कड़वी और जहरीली कैसे हो गई। वे साध्वी हैं या साध्वी के वेश में कोई खलनायिका? मोदी को बचाव करना था और उनके समक्ष कोई चारा भी नहीं था, लेकिन साध्वी के उस कथन ने राममंदिर आंदोलन की उन सिहरन भरी यादों को ताजा कर दिया, जब मंच से ऐसे ही जुमले बोले जाते थे। लेकिन खुदा का शुक्र है कि देश अब उतना नादान नहीं है। इसीलिए इन जिम्मेदार सांसदोंं, मंत्रियों को माफी देने का कोई औचित्य नहीं है, जो अच्छी तरह जानते हैं कि वे क्या कह रहे हैं और क्या कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ भले ही 6 दिसंबर की घटना को हिंदुओं के लिए शोर्य, स्वाभिमान और एकता का प्रतीक मानें, किंतु नरेंद्र मोदी भी जानते हैं कि वह घटना दुखद थी और गर्व करने लायक तो बिल्कुल भी नहीं थी। आदित्यनाथ से लेकर महात्मा गांधी के हत्यारे के प्रति सहानुभूति जताने वाले साक्षी महाराज तक तमाम खतरनाक मंत्रियों और सांसदों पर नरेंद्र मोदी को लगाम लगानी ही होगी। स्वच्छता अभियान से लेकर सद्भावना उपवास तक हर कदम पर नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी का सहारा लिया है। यदि एकता का प्रतीक सरदार पटेल को बनाया गया, तो सद्भावना के प्रतीक के रूप में उन्होंने महात्मा गांधी को महिमामंडित किया। लेकिन सवाल यह है कि महात्मा गांधी केवल महिमामंडन या वोट कबाडऩे के लिए हैं, उनके आदर्शों को मानने के लिए मोदी और उनके साथी कितना तत्पर हैं? यदि वास्तव में यह लोग गंभीर होते तो साध्वी निरंजन ज्योति के मुंह से वे घटिया शब्द नहीं निकलते और न ही योगी आदित्यनाथ विवादित ढांचा विध्वंस को हिंदुओं का गौरव बताने की नादानी करते और न ही साक्षी महाराज गोडसे जैसे निर्दय हत्यारे के प्रति सहानुभूति प्रकट करते। इतिहास की नकारात्मक गलतियों को सुधारने की कोशिश होनी चाहिए, उनका महिमामंडन ठीक नहीं। मोदी विकास और आधुनिकता की बात कर रहे हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छता की बात कर रहे हैं लेकिन दुख इस बात का है कि संसद का ज्यादातर समय धर्मांतरण, गीता विवाद और साक्षी महाराज जैसों के बयानों को लेकर बेकार गया है। पक्ष-विपक्ष दोनों गैर जिम्मेदार आचरण करेंगे तो देश ने जो बदलाव किया है वह सार्थक सिद्ध कैसे होगा। बेहतर है कि मोदी ऐसा वातावरण तैयार करें, जिसके चलते संसद में सारगर्भित बात-चीत हो सके।
-राजेन्द्र आगाल