क्या इच्छा मृत्यु को भी स्वीकृति मिलेगी?
19-Dec-2014 05:30 AM 1237616

सुप्रीम कोर्ट ने आत्म हत्या को अपराध मानने से इनकार कर दिया है। अब आत्म हत्या की कोशिश करने के बाद बचने वाले लोगों पर आईपीसी की धारा 302 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद उन लोगों में भी आशा की किरण जाग्रत हो गई है जो लंबे समय से इच्छा मृत्यु को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मुंबई में बलात्कार की शिकार अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु की मांग की गई थी, क्योंकि शानबाग उस दुखद घटना के बाद ही कोमा में चली गई थीं और पिछले चालीस वर्षों से वे कोमा में ही हैं। यदि कोर्ट आत्म हत्या को अपराध नहीं मानता है तो फिर इच्छा मृत्यु पर भी उसका रवैया सकारात्मक ही रहेगा, ऐसी उम्मीद की जा रही है। लेकिन इसके साथ ही एक खतरा यह भी है कि कहीं इस तरह की कानूनी स्वीकृति का गलत उपयोग न होने लगे। कई बार कानूनी छूट का दुरुपयोग होने के कारण पुलिस और सुरक्षा एजेंसिंयों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जो पहले ही काम के बोझ से दबी हुई हैं। न्यायालय आत्म हत्या को क्षणिक आवेश मानता है, इसलिए इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस क्षणिक आवेश से भी बहुत कुछ नुकसान हो सकता है, खासकर उन लोगों को कष्ट उठाना पड़ता है जो आत्म हत्या करने वाले व्यक्ति के निकट के परिजन होते हैं। आत्म हत्या को अपराध मानकर धारा 302 के तहत जब कार्रवाई की जाती थी, उसके बाद भी आत्म हत्या के प्रकरण रुके नहीं बल्कि और बढ़ गए।

अब मर्सी किलिंग को स्वीकृति प्रदान करने के लिए भी मांग की जाएगी। क्योंकि गंभीर रोगों सहित कोमा में चले गए या मरणासन्न व्यक्तियों को मृत्युु देने के लिए पहले भी कई आंदोलन हो चुके हैं, लेकिन कोर्ट का कहना है कि जब जीवन दिया नहीं जा सकता तो लिया कैसे जा सकता है। मरने के इच्छुक व्यक्ति को सहयोग कर मृत्यु देना जिन देशों में मान्य है (नीदरलैन्ड, बेलजियम) वहां मर्सी किलिंग, एक्टिव यूथीनेशिया (दया मृत्यु, सुख मृत्यु) कहलाता है। भारत में यह मान्य नहीं है और यहां इसे कंसेन्ट किलिंग (सहमती से मारना) माना जाता है। इसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304 के तहत कल्पेबल होमिसाइट (सदोष मानव दहन) अपराध माना जाता है। मुंबई उच्च न्यायालय ने एमएस डुवाल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में 1987 में माना था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार में जीवित न रहने का अर्थात मरने का अधिकार निहित है। अत: न्यायालय का सुझाव था कि आईपीसी की धारा 309 जिसके तहत आत्महत्या के प्रयास को अपराध माना गया है, उसे अनुच्छेद 21 और 14 के विपरीत मानते हुए रद्द कर दिया जाए। उच्चतम न्यायालय की खण्ड पीठ ने पी रथीनाम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में 1994 में मुंबई उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य मामले में 1996 में उपर्युक्त निर्णय को उलट दिया था। उच्चतम न्यायालय ने मुम्बई न्यायालय के आत्महत्या के अधिकार के निर्णय को गलत करार दिया था।

उच्चतम न्यायालय के मत में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन सुरक्षा के मौलिक अधिकार में मरने का अधिकार नहीं आता। हां, उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह अवश्य कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को निरर्थक चिकित्सा न करवा कर मार्यादित मृत्यु वरण करने की स्वतंत्रता है। उन्होंने इच्छा मृत्यु और मरणासन्न व्यक्ति द्वारा उपचार की सहमति न देकर मृत्यु वरण करना अलग-अलग माना।

क्या है निर्णय

आत्महत्या की कोशिश अब अपराध की श्रेणी में नहीं आएगी। सरकार ने आईपीसी की धारा-309 हटाने का फैसला किया है। इसके लिए संसद में 36 साल बाद एक बार फिर विधेयक लाया जाएगा। 1978 में भी धारा को खत्म करने का विधेयक राज्यसभा में पारित हुआ था। लेकिन यह बिल लोकसभा पहुंचता, इससे पहले ही संसद भंग हो गई। बुधवार को सरकार ने राज्यसभा में बताया  कि आईपीसी में संशोधन किया जाएगा। गृह राज्यमंत्री हरिभाई चौधरी ने एक सवाल के जवाब में कहा, विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में धारा-309 हटाने की सिफारिश की थी। 18 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों ने सहमति जताई है।Ó आईपीसी की धारा-309 कहती है- जो आत्महत्या की कोशिश करे, उसे एक साल तक के साधारण कारावास या जुर्माना या दोनों सजा सुनाई जा सकती हैं।Ó

  • दिल्ली से रेणु आगाल
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