05-Dec-2014 10:01 AM
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देश के दो हिस्सों से दो सुखद खबरें आईं। जम्मू-कश्मीर में आतंक की दीवार को तोड़कर जनमानस ने भारतीय लोकतंत्र में आशा प्रकट की और वहां रिकार्ड मतदान हुआ। दूसरी तरफ गुजरात में स्थानीय निकाय के चुनाव में मतदान अनिवार्य किया गया। मतदान की अनिवार्यता से अधिक महत्व है मतदान की प्रेरणा का। विश्व की सर्वाधिक श्रेष्ठ शासन व्यवस्था लोकतंत्र ही है जहां जनता बहुमत से अपनी पसंद का शासन चुन सकती है और पसंदीदा लोगों को सत्ता सौंप सकती है। इस व्यवस्था में इतनी खूबसूरती है कि विपक्ष का महत्व भी उतना ही बना रहता है और निर्भीक आलोचना से लेकर असहमति प्रकट करने तथा अपने आप को अभिव्यक्त करने के समस्त रास्ते खुले रहते हैं। जम्मू-कश्मीर के जनमानस ने जब दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में शून्य से कई अंश नीचे तापमान की बाधाओं को दूर करते हुए निर्भीक होकर मतदान किया तो यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय लोकतंत्र में उनकी आस्था न केवल दृढ हुई है अपितु वे भारतीय लोकतंत्र की परख आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। कश्मीर की भयावह बारिश और उससे उपजी बाढ़ ने नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ भारत और पाकिस्तान को जनता की नि:स्वार्थ सेवा करने का अवसर दिया था। दोनों तरफ की जनता ने दोनों मुल्कों की सेवा भावना का आंकलन किया। नियंत्रण रेखा के उस पार जहां बाढ़ की त्रासदी के बाद यंत्रणा भोगते लोगों के आंसू पोंछने के लिए न तो सत्ता थी और न ही संसाधन, वहीं इस तरफ भारतीय सेना अपनी जान पर खेलकर कश्मीर के बच्चे-बच्चे को बचाने में लगी हुई थी। अलगाव वादियों के उकसावे पर और पैसा बांटने के बाद कृत्रिम रूप से उत्तेजित किए गए कुछ युवकों ने भारतीय सेना पर पथराव भी किया लेकिन भारत की सेना ने उस फलदार वृक्ष की तरह जो पत्थर मारने पर भी फल ही देता है, उन बाढ़ पीडि़तों की सेवा से मुख नहीं मोड़ा। कश्मीर की जनता ने इस हकीकत को देख लिया है और वह स्वप्रेरणा से घर से बाहर निकल आई है मतदान करने के लिए। जिन स्त्रियों को कभी पुरुषवादी फरमान का सामना करते हुए घर के भीतर परदे में से ही अपने लिए रास्ता तलाशना होता था, वे भी बड़ी संख्या में बाहर निकलीं और बदलाव के लिए मतदान किया। इसीलिए मतदान की अनिवार्यता से ज्यादा महत्वपूर्ण मतदान की यह स्वप्रेरणा है, जिसने नई आशा को जन्म दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन चुनाव के बाद कश्मीर के हालात बदलेंगे। धरती का यह स्वर्ग अपने फूलों से महक उठेगा। भारत के अन्य गणराज्यों के मतदाता भी यह सीखें कि आतंकी धमकियों और मौसम की कठोरता को दरकिनार करते हुए किस तरह मतदान किया जाता है। सारे देश में मतदाता अपनी स्वयं की इच्छा से मतदान करने लगें तो बहुत कुछ बदलेगा। यदि किसी को सारे प्रत्याशी पसंद नहीं हैं, तो नोटा का बटन भी दिया हुआ है। इसलिए भले ही नोटा का बटन दबाएं किंतु मतदान अवश्य कर आएं।