25-Dec-2021 12:00 AM
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आखिरकार 40 साल बाद मप्र के दो बड़े शहर भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हो गई है। इस प्रणाली के लागू होने से जहां पुलिस अधिक पावरफुल हुई है, वहीं उसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। अब भोपाल और इंदौर पुलिस कमिश्नर पर जिम्मेदारी होगी कि वे अपने अधिकारों का तेजी और ताकत के साथ उपयोग करें और प्रदेश के दोनों प्रमुख शहरों की जनता के मन में विश्वास पैदा करें। राजधानी भोपाल व प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में पुलिस कमिश्नरों की नियुक्ति के साथ ही अब पुलिस विभाग के पास इन शहरों में अपराध पर नियंत्रण को लेकर कोई बहाना नहीं बचा। अब तक यह होता रहा है कि जब भी अपराध बढ़े, पुलिस विभाग की ओर से दबी जुबान में यह सवाल उठाया गया कि हमारे हाथों में ज्यादा कुछ नहीं है।
देर से ही सही लेकिन दुरुस्त तरीके से आखिरकार मप्र के दो बड़े शहरों भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी गई है। जानकारों का कहना है कि मप्र में लागू हुई पुलिस कमिश्नर प्रणाली देश की सबसे अच्छी प्रणाली है। वहीं दोनों शहरों की कमान सर्वश्रेष्ठ पुलिस अधिकारियों को सौंपी गई है। भोपाल की कमान 1997 बैच के आईपीएस मकरंद देउस्कर को और इंदौर की कमान 2003 बैच के आईपीएस हरिनारायणचारी मिश्र को सौंपी गई है। दोनों शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के साथ ही वहां की करीब 50 लाख आबादी को उम्मीद जगी है कि कानून व्यवस्था की स्थिति अब सुदृढ़ होगी। वैसे भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के साथ ही भले ही पुलिस का पावर बढ़ा है, लेकिन चुनौतियों का पहाड़ भी खड़ा हो गया है। अब देखना यह है कि सरकार और जनता के विश्वास पर दोनों शहरों के अफसर कितने खरे उतरते हैं। हालांकि अभी नए ढांचे में ढलने में थोड़ा वक्त तो लगेगा ही।
गौरतलब है कि करीब 40 सालों से मप्र में पुलिस कमिश्नर प्रणाली का इंतजार हो रहा था। अब जाकर यह इंतजार खत्म हुआ है। सरकार ने भोपाल का पुलिस कमिश्नर मकरंद देउस्कर को और इंदौर का पुलिस कमिश्नर हरिनारायणचारी मिश्र को बनाया है। अब इन दोनों अधिकारियों पर जिम्मेदारी होगी कि वे अपने अधिकारों का तेजी और ताकत के साथ उपयोग करें और प्रदेश के दोनों प्रमुख शहरों में अपराध कम करके दिखाएं। राजधानी भोपाल व प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में पुलिस कमिश्नरों की नियुक्ति के साथ ही अब पुलिस विभाग के पास इन शहरों में अपराध पर नियंत्रण को लेकर कोई बहाना नहीं बचा। अब तक यह होता रहा है कि जब भी अपराध बढ़े, पुलिस विभाग की ओर से दबी जुबान में यह सवाल उठाया गया कि हमारे हाथों में ज्यादा कुछ नहीं। इस सवाल का इशारा आईएएस अफसरों के पास निहित मजिस्ट्रियल अधिकारों की ओर होता रहा और इसी की आड़ में पुलिस विभाग अन्यमनस्क मन:स्थिति में बना रहा। किंतु अब पुलिस कमिश्नरों की नियुक्ति के साथ ही यह अन्यमनस्कता टूटनी चाहिए। अब यह तय हो चुका है कि यदि भोपाल में अपराध बढ़े तो नव-नियुक्त पुलिस कमिश्नर मकरंद देउस्कर और इंदौर में अपराध बढ़े तो हरिनारायणाचारी मिश्र से सवाल पूछे जाएंगे। अब इन दोनों बड़े शहरों में अपराधों पर नियंत्रण की कमान, अधिकार, उत्तरदायित्व, जिम्मेदारी सबकुछ इन दोनों अफसरों पर है।
क्या है कमिश्नर प्रणाली
कमिश्नर प्रणाली के गुण-दोष और जरूरतों पर चर्चा से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिरकार कमिश्नर प्रणाली क्या है? कमिश्नर प्रणाली को आसान भाषा में समझें तो अभी तक दोनों शहरों के पुलिस अधिकारी कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं होते थे। वो आकस्मिक परिस्थितियों में कलेक्टर, संभागीय कमिश्नर या शासन के दिए निर्देश पर ही काम करते थे। पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने पर जिला अधिकारी और एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के ये अधिकार पुलिस अधिकारियों को मिल गए हैं। इसमें शहर में धरना-प्रदर्शन की अनुमति देना, दंगे के दौरान लाठीचार्ज या कितना बल प्रयोग हो ये निर्णय सीधे पुलिस ही करेगी। यानी उनके अधिकार और ताकत बढ़ गए हैं। पुलिस खुद फैसला लेने की हकदार हो गई है। ऐसा क्यों माना जाता है कि कानून व्यवस्था के लिए कमिश्नर प्रणाली ज्यादा बेहतर है। ऐसे में पुलिस कमिश्नर कोई भी निर्णय खुद ले सकते हैं। सामान्य पुलिसिंग व्यवस्था में ये अधिकार जिलाधिकारी के पास होते हैं। यही नहीं पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू होने से अब पुलिस का बल भी बढ़ जाएगा। शहर को जोन में बांट दिया गया है। हर जोन में डीसीपी की तैनाती की गई है।
बता दें भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के भाग 4 के अंतर्गत जिलाधिकारी यानी कलेक्टर के पास पुलिस को कंट्रोल करने के अधिकार होते हैं, जो पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद पुलिस विभाग को मिल गए हैं। यानी जिले की बागडोर संभालने वाले कलेक्टर के कई अधिकार पुलिस कमिश्नर को मिल गए हैं।
जानकारों के अनुसार कमिश्नर प्रणाली प्रशासन की सबसे बेहतर व्यवस्था मानी जाती है। जिन शहरों में यह प्रणाली लागू है, वहां कानून व्यवस्था से संबंधित निर्णय तत्काल किए जाते हैं। इसलिए मप्र के इंदौर और भोपाल में कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद से लोगों में विश्वास जगा है कि अब उन्हें त्वरित न्याय मिल जाएगा। जानकारी के मुताबिक देशभर में दिल्ली, उप्र, तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, पंजाब, केरल, असम, हरियाणा, नागालैंड, ओडिसा के 77 शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है। इनमें डीजी से लेकर एसपी स्तर तक के अधिकारियों को पुलिस कमिश्नर के पद पर पदस्थ किया जाता है। दिल्ली, मुंबई और बैंगलुरू में डीजी स्तर की पुलिस कमिश्नर प्रणाली है जबकि चेन्नई और कोलकाता में सबसे पुरानी पुलिस कमिश्नर प्रणाली होने के बाद भी यहां अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पुलिस कमिश्नर बनाए जाते रहे हैं।
कमिश्नर प्रणाली की मांग वर्षों से
देश के लगभग सभी बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है। मप्र में इंदौर और भोपाल में भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की मांग वर्षों से होती रही है। लेकिन जब से ये दोनों शहर मेट्रोपॉलिटिन सिटी के रूप में बदले हैं, तब से इसकी मांग तेज हो गई थी। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि इंदौर और भोपाल में इस प्रणाली की जरूरत लंबे समय से अनुभूत की जा रही थी। जब-जब दिल दहला देने वाला कोई बड़ा हत्याकांड होता, सुर्खियां बटोरने वाली बड़ी डकैती डलती या फिर शर्मिंदा करने वाला दुष्कर्म का कोई मामला घटित होता, तब-तब पुलिस पर प्रश्न उठते। और पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की मांग उठती। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने चौथे कार्यकाल में यह करना संभव हो पाया है। उनके पहले कार्यकाल में 2008 में पहली बार ऐसी उम्मीद जागी थी। तब उपसमिति की रिपोर्ट में हरी झंडी मिलने के बाद भी निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार को अनुशंसा भेज दी थी। तब मंत्रिमंडलीय उपसमिति में जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी, नरोत्तम मिश्रा और नागेंद्र सिंह थे और मलैया की अध्यक्षता में बनी उपसमिति ने चुनावी साल में रिपोर्ट सौंपी थी।
शिवराज सिंह चौहान ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी फरवरी 2012 में विधानसभा सत्र में पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू करने का ऐलान किया था। मगर तब भी मामला उससे आगे नहीं बढ़ा और घोषणा तक ही रह गया। उनके तीसरे कार्यकाल में भौंरी पुलिस अकादमी में भी शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन में इस पर विचार की बात कहकर पुलिस को उम्मीद जगाई थी। तब वहां गृह विभाग के आईएएस अधिकारी भी मौजूद थे और आईएएस लॉबी ने इस विचार को पंचर कर दिया था। पुलिस सुधार के नाम पर त्रिखा कमेटी बनाई गई थी तो पीएचक्यू में एक वरिष्ठ अधिकारी को ही पुलिस सुधार शाखा में बैठा दिया गया। पुलिस कमिश्नर प्रणाली के विचार आते ही पुलिस के कुछ अधिकारियों को प्रस्ताव बनाए जाने का काम भी समय-समय पर सौंपा गया था। रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी संजय राणा से लेकर मौजूदा एडीजी संजीव शमी तक ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली वाले शहरों का अध्ययन कर उनके बेहतर बिंदुओं के आधार पर प्रस्ताव बनाए लेकिन उनका हश्र रद्दी की कोठरी में ही हुआ।
दिग्विजय सिंह के दस साल के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी पुलिस कमिश्नर सिस्टम के प्रस्ताव दो बार आए और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते उनका हश्र अच्छा नहीं रहा। एक बार उनके कार्यकाल में केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जो वहां काफी समय तक लंबित रहा और आखिरकार निरस्त कर लौटा दिया था। सुभाषचंद्र त्रिपाठी के डीजी रहते उन्होंने पुलिस सुधार के लिए तब राजेंद्र चतुर्वेदी को काम सौंपा था जिसमें पांच लाख आबादी वाले शहरों में इस सिस्टम को लागू करने की रिपोर्ट दी थी। मगर उस रिपोर्ट पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। कमोबेश कमलनाथ सरकार के समय भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली की भ्रूण हत्या हो चुकी है। उस समय स्वतंत्रता दिवस में मुख्यमंत्री के संबोधन में इसका ऐलान होने की चर्चा थी लेकिन मुख्यमंत्री के भाषण में वह शामिल ही नहीं किया गया। आखिरकार शिवराज सिंह चौहान ने हिम्मत दिखाई और 40 साल का सूखा खत्म करते हुए कमिश्नर प्रणाली को लागू कर दिया।
अब पुलिस के पास कई अधिकार
अब जनता की चेष्टा रहेगी कि पुलिस कमिश्नर अपने अधिकारों का पूरी क्षमता और तेजी से उपयोग करें, पुलिस विभाग में डाउन-लाइन अर्थात् मैदानी अमले तक में उत्साह जगाएं और अपराध पर नियंत्रण की नई इबारत लिख दें। सनद रहे कि जनता के सामने इंदौर, भोपाल के कमिश्नरों के कामकाज की तुलना के लिए मुंबई, लखनऊ, वाराणसी सहित कुछ अन्य शहरों के उदाहरण सामने रहेंगे। एक बात और है, जिसकी जिम्मेदारी मकरंद देउस्कर और हरिनारायणचारी मिश्र पर होगी, और वह यह कि वे अपनी कमिश्नरी को जितना सफल साबित करेंगे, उतनी अधिक संभावना जबलपुर और ग्वालियर में भी इस प्रणाली को लागू करने की बनेगी। वैसे तो इन दोनों शहरों में भी इंदौर, भोपाल के साथ ही इस प्रणाली को लागू कर दिया जाना चाहिए था, किंतु अब शासन को ऐसा करने का साहस और बल देने का आधार इंदौर और भोपाल के कंधों पर होगा।
अगर मप्र की कमिश्नर प्रणाली की तुलना दूसरे राज्यों से करें तो हम पाते हैं कि राजस्थान में एसीपी को प्रतिबंधात्मक धाराओं से जुड़े केसों में सुनवाई करने का और फैसला करने का अधिकार दिया गया है। कमिश्नरेट में ही न्यायालय लगता है। इनमें से ज्यादातर धाराएं शांतिभंग या पब्लिक न्यूसेंस रोकने से जुड़ी हैं। इन मामलों में जमानत देने या न देने का फैसला पुलिस अधिकारी ही करते हैं। महाराष्ट्र के नागपुर में पुलिस कमिश्नर के पास अपराधियों को जिलाबदर करने, जुलूस और जलसों की अनुमति देने, किसी भी जगह को सार्वजनिक स्थल घोषित करने, आतिशबाजी करने की अनुमति के अधिकार हैं। संतान गोद लेने की अनुमति भी नागपुर में पुलिस कमिश्नर ही देता है। उप्र के लखनऊ, कानपुर, वाराणसी और नोएडा में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू है। वहां 14 एक्ट के अधिकार पुलिस को दिए गए हैं। सीआरपीसी की धारा 133 और 145 के तहत पब्लिक न्यूसेंस को काबू में करने के लिए एहतियाती कदम उठाना जैसे अधिकार भी प्रशासन से पुलिस को दे दिए गए हैं। लेकिन मप्र में कमिश्नर को सीआरपीसी की धारा 133 का अधिकार नहीं मिला है, लेकिन पुलिस एक्ट 34 उसके पास है।
कसौटी पर कमिश्नर प्रणाली
मप्र के दोनों शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली तो लागू कर दी गई है, लेकिन अब पुलिस की अग्निपरीक्षा होने वाली है। प्रदेश के इन दोनों महत्वपूर्ण शहरों में कमिश्नर प्रणाली की सफलता प्रदेश में भविष्य में कमिश्नर प्रणाली के विस्तार और लाभ की एक कसौटी भी साबित होगी। जानकारों का कहना है कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने से लोगों को त्वरित न्याय मिलना आसान हो जाएगा। ऐसे में शहर में मामले भी अधिक दर्ज होंगे। अपराधों के आंकड़े भले ही बढ़ें, लेकिन इस प्रणाली से लोगों का विश्वास पुलिस में मजबूत होगा। गौरतलब है कि पुलिस के पास ऐसे बहुत से कानून व्यवस्था के मामले आते हैं, जब जनहित में बहुत तेजी से फैसला लेने की जरूरत पड़ती है। तेजी से फैसला न ले पाने की स्थिति में कई बार वैसी घटनाएं घट जाती हैं जो ना घटे तो अच्छा हो। ऐसे में पुलिस कमिश्नर के पास अतिरिक्त अधिकार आ गए हैं, जो अब तक पुलिस कप्तान या डीआईजी के पास नहीं हुआ करते थे। प्रदेश की साख महिला अत्याचारों को लेकर बहुत अच्छी नहीं रही है और यहां कि हर सरकार इस बात का प्रयास करती रही है कि महिला अत्याचारों में कमी लाई जाए। महिला अत्याचार के बहुत से मामले बड़े शहरों से ही आते हैं। ऐसे में पुलिस कमिश्नर प्रणाली यदि महिला अत्याचार को कम करने में सफल होती है तो यह इसकी बहुत बड़ी कामयाबी होगी।
दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद जैसे देश के बड़े शहर पहले से ही पुलिस कमिश्नर प्रणाली के तहत काम कर रहे हैं। शहरों की पुलिस कमिश्नर प्रणाली का अनुभव भी मप्र के दोनों प्रमुख शहरों के लिए महत्वपूर्ण नजीर की तरह काम करेगा। भोपाल शहर का एक हिस्सा तो बहुत पुराना है, जिसे हम सिटी कहते हैं। इसके अलावा दूसरा बड़ा हिस्सा मंत्रियों, विधायकों, प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों से मिलकर बना है। यहां पर भी शांति व्यवस्था एक बहुत बड़ा मुद्दा रहती है। शहर का तीसरा हिस्सा कोलार रोड, इंदौर रोड, होशंगाबाद रोड के रूप में नए उपनगर के तौर पर विकसित हुआ है। शहर के इन तीनों इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की जरूरतें अलग-अलग तरह की हैं। हमें पूरा विश्वास है कि भोपाल के पुलिस कमिश्नर तीनों में सामंजस्य बनाकर बेहतर नतीजे देंगे। वहीं इंदौर शहर मप्र का सबसे बड़ा शहर है और सबसे प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र भी है। यहां के व्यस्त बाजार, चौड़ी सड़कें और खुशमिजाज लोग निश्चित तौर पर नई प्रणाली को अपना पूरा सहयोग देंगे। मप्र की कमिश्नर प्रणाली में सुनसान स्थलों पर ऐसी व्यावसायिक गतिविधियां शुरू करने की भी व्यवस्था की गई है, जहां हमेशा कुछ लोग उपस्थित रहें। इससे राहजनी, छीनाझपटी, छेड़छाड़ जैसी घटनाओं की कमी आएगी।
जनता को फायदा क्या?
जनता के मन में यह सवाल है कि कमिश्नर प्रणाली से उसे क्या लाभ होगा? तो विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रणाली से जहां पुलिस का पावर बढ़ा है, वहीं उस पर जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ा है। जनता की सहूलियतों पर अब पुलिस की निगरानी रहेगी। यदि जनता की दृष्टि से बात करें तो आम आदमी यही सोचता है कि उसके बच्चे स्कूल-कॉलेज सुरक्षा की भावना के बीच में जाएं। बाजारों में कारोबार करना सहज हो, सड़क की ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त हो और सार्वजनिक मार्गों और स्थानों पर अतिक्रमण न हो। जाहिर है कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली में इन बातों को लेकर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अगर आम आदमी पुलिस के पास तत्परता से अपनी शिकायत पहुंचा सके और उसकी शिकायतों का तेजी से निराकरण हो सके तो निश्चित तौर पर आम व्यक्ति भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली का स्वागत ही करेगा। वर्तमान में ट्रैफिक सिस्टम के लिए ट्रैफिक पुलिस को नगर निगम, रोड कंस्ट्रक्शन एजेंसियों के भरोसे रहना पड़ता था। लैटर कम्युनिकेशन और परमिशन में वक्त लगता था। अब पुलिस का ट्रैफिक डिपार्टमेंट यह व्यवस्थाएं करेगा। इससे शहर का ट्रैफिक बेहतर होगा। वाहनों की स्पीड लिमिट भी पुलिस तय करेगी। लोगों में खौफ पैदा करने वाले गुंडों, आदतन क्रिमिनल्स को पुलिस जिलाबदर कर सकेगी। इससे लोगों को गुंडों के खौफ से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान शहर में दो एसपी थे, अब आठ होंगे। साथ ही, अन्य लेवल के अफसरों की संख्या बढ़ गई है। इसका फायदा शहर की चौकसी में होगा। इससे शहर में क्राइम भी कम होगा।
पूर्व डीजीपी एसके दास का कहना है कि इससे ट्रैफिक में तो सुधार होगा ही। इसके साथ, आरोपियों पर कार्रवाई भी हो सकेगी। पहली चीज ट्रैफिक में भी सुधार आएगा। अभी इसके लिए कलेक्टर पर निर्भर रहना होता है, लेकिन अब सीधे पुलिस डिसीजन ले पाएगी। एसडीएम के पावर पुलिस के पास आ जाएंगे। इसमें माफिया में भी डर का माहौल पैदा होगा। उन्हें जेल में डालकर अपने हिसाब से निर्णय लिया जाएगा। लॉ एंड ऑर्डर में भी मौके पर फैसला लिया जाएगा। पूर्व डीजीपी दिनेश जुगरान का कहना है कि यह जनता के लिए तोहफा है। पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ेगी। इस सिस्टम से पावर एक जगह हो जाएगा। अभी तक लोगों को अनुमतियों के लिए पुलिस, राजस्व अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते थे। अब एक जगह ही जनता के काम हो जाएंगे। उन्हें भटकना नहीं पड़ेगा। गुंडे-बदमाशों पर पुलिस जिलाबदर जैसी कार्रवाई कर सकेगी। थानों में जल्द सुनवाई होगी। एक और पूर्व डीजीपी आरएलएस यादव बताते हैं कि पुलिस की खुद की आचार संहिता होगी। ट्रेनिंग होगी। दोनों शहरों में आईपीएस अधिकारियों की सख्या भी बढ़ेगी। सुपरविजन बेहतर होगा। क्राइम, साइबर अपराध, चोरी, डकैती, बैंक डकैती जैसे जितनी भी तरह के क्राइम हैं, उनके लिए अलग से आईपीएस होगा। छानबीन बेहतर होगी। दोनों शहरों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम की जरूरत थी।
पुलिस का सबसे बड़ा काम तो अपराध और अपराधियों पर लगाम कसना ही है। दोनों ही पुलिस कमिश्नर अपनी छवि के अनुसार सख्त और न्याय प्रिय स्वभाव के माने जाते हैं ऐसे में आम जनता यह उम्मीद कर सकती है कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी की पुलिस विभाग के दायरे में आने वाली तकलीफों पर काफी कुछ अंकुश लग जाएगा।
कुछ लोग पुलिस कमिश्नर प्रणाली को पुलिस प्रशासन और आईएएस बिरादरी में अधिकारों की लड़ाई के तौर पर देखते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह की दृष्टि न्याय संगत नहीं है। चाहे पुलिस अधिकारी हों या प्रशासनिक अधिकारी, अंतत: वे सभी राज्य व्यवस्था का अंग हैं और सबकी अपनी-अपनी जिम्मेदारियां हैं। कौन-सी जिम्मेदारी किसके हिस्से में आएगी, यह राज्य ही तय करता है। ऐसे में अगर प्रशासन की कुछ जिम्मेदारियां पुलिस के पास आ रही हैं तो उन्हें बहुत ज्यादा शक की निगाह से देखने की जरूरत नहीं है। यह एक बड़ा प्रयोग है, जिसका इंतजार मप्र पिछले चार दशक से कर रहा था और अब यह जब अमल में आ गया है तो इसे काम करने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए। अगर इसे प्रशासन और पुलिस के संघर्ष के तौर पर देखा गया तो मौजूदा पुलिस कमिश्नर प्रणाली के लिए काम करने में काफी चुनौतियां आएंगी। जाहिर है, यह सब बातें राजनीतिक नेतृत्व की निगाह में भी होंगी और इसका कोई सुगम रास्ता निकल ही जाएगा।
ऐसा होगा पुलिस कमिश्नर सिस्टम
पुलिस कमिश्नर प्रणाली के तहत पुलिस का सिस्टम बदल जाएगा। अब राजधानी भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर ही जिले का सर्वोच्च पुलिस अफसर होगा। इसे अब हम पुलिस कप्तान भी कह सकते हैं, जो पहले भोपाल-इंदौर जैसे शहरों में आईजी हुआ करते थे। यह एकमात्र पद होगा। वहीं 2 एसीपी यानी अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर होंगे। ये सीधे पुलिस कमिश्नर को रिपोर्ट करेंगे। इनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगी। ये डीआईजी रेंज के अफसर होंगे। एक एसीपी लॉ एंड ऑर्डर के साथ सिस्टम देखेंगे तो दूसरे क्राइम और हेडक्वार्टर का जिम्मा। शहर में आठ डीसीपी यानी आठ एसपी हो जाएंगे। अभी ये तीन हुआ करते थे लेकिन डायरेक्ट फील्ड में दो ही रहते थे। आठ एसपी होने पर यातायात, क्राइम, हेडक्वार्टर, इंफॉर्मेशन, सिक्योरिटी आदि की जिम्मेदारी अलग-अलग डीसीपी के पास होगी। शहर में एडिशनल एसपी लेवल के 12 अफसरों की पोस्टिंग एडिशनल डीसीपी के रूप में हो जाएगी। ये अलग-अलग मामलों को लेकर डीसीपी को रिपोर्ट करेंगे। इनसे यातायात, क्राइम, हेडक्वार्टर संबंधी काम, आम लोगों के लिए जागरुकता कार्यक्रम, सिक्योरिटी, एससी-एसटी महिलाओं से जुड़े अपराध देखने होंगे। सीएसपी लेवल के 29 सहायक पुलिस आयुक्त होंगे। ये एडिशनल एसपी को रिपोर्ट करेंगे। इनमें से 29 फील्ड ऑफिसर होंगे जबकि 1 रेडियो का जिम्मा संभालेंगे। इन अधिकारियों के साथ पुलिस कमिश्नर जिले की कानून व्यवस्था को संचालित करेंगे। फिलहाल कमिश्नर के सामने चुनौती होगी कि वे पुलिस बल को समन्वयकारी बनाएं। यानी पुलिस जनसहयोगी बने। हालांकि कोरोना संक्रमणकाल में पुलिस के जनसहयोगी रूप को सबने देखा है। अब कोशिश है कि पुलिस का यही रूप हमेशा कायम रहे, ताकि जनता अपनी समस्याएं लेकर पुलिस के पास आने से हिचके नहीं।
पुलिस को मिलेंगे यह अधिकार
कमिश्नर प्रणाली लागू होने के साथ ही पुलिस को कई अधिकार मिलेंगे। मेट्रोपोलिटिन में पुलिस कमिश्नर के अधीन पुलिस का प्रशासन रहेगा। वे डीजीपी के नियंत्रण व परिवेक्षण में रहेंगे। जेल में बंद कैदियों को पैरोल और आपातकाल में पैरोल बोर्ड की अनुशंसा पर सशर्त छोड़ा जाएगा। गैरकानूनी जहर या तेजाब रखने अथवा बेचने वालों की तलाशी पर से बरामद जहर या तेजाब जब्त किया जाएगा। वैश्यावृत्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इस पेशे में धकेली गई महिलाओं को मुक्त कराया जा सकेगा। संरक्षण गृह में भेजा जा सकेगा। केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित संगठनों की गैरकानूनी गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जा सकेगा। वाहनों की पार्किंग अथवा उनके रुकने के स्थान अधिकारियों से समन्वय कर निर्धारित किए जा सकेंगे। वाहनों की गति सीमा निर्धारित होगी। गुंडे-बदमाशों को और ऐसे अपराधी तत्वों के गैंग और आदतन अपराधियों को जिलाबदर किया जा सकेगा। सरकारी गोपनीय दस्तावेज रखने और इस अधिनियम के विरुद्ध की गई गतिविधियों पर कार्रवाई की जा सकेगी। इससे पुलिस अब तेजी से काम करेगी। किसी भी तरह की स्थिति में पुलिस अधिकारी त्वरित निर्णय ले सकेंगे।
रासुका लगाने के पावर अभी नहीं
रासुका के अधिकार पुलिस कमिश्नर को अभी नहीं दिए गए हैं। भोपाल और इंदौर के पुलिस कमिश्नर को भी 1 जनवरी 2022 राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के उपयोग का अधिकार मिल सकता है। इसी दिन इसकी अधिसूचना जारी होगी। इसके बाद प्रदेश के 52 कलेक्टरों और दो पुलिस कमिश्नरों के पास एनएसए के उपयोग का अधिकार होगा। अभी यह अधिकार कलेक्टरों के पास है। राज्यों को एनएसए के अधिकार केंद्र सरकार देती है। राज्य हर तीन माह के लिए यह अधिकार कलेक्टरों को देते हैं। अभी दिसंबर तक के अधिकार कलेक्टरों को मिले हैं।
पुलिस कमिश्नर का नया कुनबा
भोपाल में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होने के साथ ही अधिकारियों के ऑफिस की व्यवस्थाएं भी तेजी से की जा रही हैं। पुलिस की पुरानी और नई बिल्डिंग में अधिकारियों के ऑफिस को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस ऑफिस में अफसरों की कोर्ट भी होंगी, जहां वे प्रकरणों की सुनवाई करेंगे। नए पुलिस कंट्रोल रूम की बिल्डिंग में पुलिस कमिश्नर के अलावा दोनों एडिशनल पुलिस कमिश्नर के ऑफिस भी होंगे। पुराने डीआईजी ऑफिस में आईजी देहात और डीआईजी देहात के ऑफिस होंगे। यह ऑफिस अगले आठ से दस दिन में तैयार हो जाएंगे। भोपाल में पुलिस द्वारा अपने बजट से ही ऑफिस तैयार किए जा रहे हैं। पुलिस को अलग से बजट की व्यवस्था नहीं करनी पड़ी। कई ऑफिसों से सामान की शिफ्टिंग शुरू हो चुकी है। अफसरों का तर्क है कि उनके पास खुद की बिल्डिंग हैं, केवल उनका रिनोवेशन कर व्यवस्थित ऑफिस तैयार करना है। भोपाल में जिन अफसरों की पोस्टिंग होगी, उनके वाहनों की भी व्यवस्था नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि उन्हें पहले से ही पुलिस मुख्यालय से वाहन आवंटित हैं। पुराने डीआईजी ऑफिस में आईजी देहात और डीआईजी देहात के ऑफिस होंगे। अफसरों को वाहन पहले से आवंटित, पीएचक्यू को अलग व्यवस्था नहीं करना पड़ेगी।
पीपुल्स फें्रडली पुलिसिंग पर रहेगा फोकस
नवागत पुलिस कमिश्नर मकरंद देउस्कर ने तीन दिन पहले भोपाल पुलिस के तमाम अधिकारियों कर्मचारियों के साथ पहली मीटिंग की। इस दौरान उन्होंने भोपाल पुलिस के कप्तान होने के नाते एक बात साफ की। उन्होंने कहा कि आप मेरा स्वागत करें या में आपका स्वागत करूं सब को करना काम ही है। टीम वर्क पर फोकस करें, पीपुल्स फ्रेंडली पुलिसिंग पर ध्यान दें। थानों में आने वाले फरियादियों की इतमिनान के साथ फरियाद सुनें। पुरानी पुलिसिंग के तरीकों से बाहर निकलें। थानों में किसी के भी साथ बदसलूकी की खबरें नहीं आनी चाहिए, ऐसे कोई काम न हों जिससे नए सिस्टम पर उंगली उठाने का किसी को भी मौका मिले। पुलिस कमिश्नर मकरंद देऊस्कर ने बताया कि कमिश्नर सिस्टम भोपाल पुलिस के लिए नई चुनौती है। फील्ड पर मौजूद अधिकारी स्वयं को इस सिस्टम के अनुसार प्रशिक्षित कर तैयार करें। एग्जीक्युटिव मजिस्टे्रट के जो दायित्व पुलिस को मिले हैं, उन्हें इमानदारी से निभाने भोपाल पुलिस के अधिकारी स्वयं को प्रशिक्षित करने में जुट गए हैं। सीपी ने आगे कहा कि मफियाओं के खिलाफ प्रशासन की मदद लेकर प्रभावी कार्रवाई की जाएगी। चोरी नकबजनी से ज्यादा लोग सायबर ठगी के शिकार हो रहे हैं। सायबर क्राइम पर अंकुश लगाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। नए सिस्टम के तहत बचे हुए पदों पर जल्द नियुक्ति की जाएगी। नवागत कमिश्नर ने आमजनों से भी अपील की है कि बिना डरे शहर की पुलिसिंग मेें मौजूदा कमियों को सीधा उन्हें बताएं। पुलिसिंग को अधिक बेहतर बनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। गुंडे-बदमाश और माफियाओं को किसी हाल में नहीं बक्शा जाएगा। पुलिस सूत्रों की मानें तो नवागत सीपी शहर में मौजूद भू-माफिया, ड्रग माफिया, जुआ और सट्टा माफिया सहित अवैध रूप से बड़े पैमाने पर सूदखोरी करने वालों की सूची तैयार करा रहे हैं।
आजादी से पहले भी था कमिश्नर सिस्टम
पुलिस कमिश्नर प्रणाली कोई नई बात नहीं है। पुराने रिकॉर्ड्स देखें, तो आजादी से पहले अंग्रेजों के दौर में कमिश्नर प्रणाली लागू थी। इसे आजादी के बाद भारतीय पुलिस ने अपनाया। इस सिस्टम में पुलिस कमिश्नर का सर्वोच्च पद होता है। अंग्रेजों के जमाने में ये सिस्टम कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में हुआ करता था। इसमें ज्यूडिशियल पावर कमिश्नर के पास होता है। यह व्यवस्था पुलिस प्रणाली अधिनियम, 1861 पर आधारित है। अब यह प्रणाली भोपाल और इंदौर में लागू कर दी गई है। इससे जनता की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। इसको देखते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के योग्य आईपीएस अधिकारियों को दोनों शहरों की कमान सौंपी है। अब दोनों शहरों में निगरानीतंत्र भी मजबूत होगा। उधर, दोनों शहरों के कमिश्नर ने पदभार संभालने के साथ ही अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
- राजेंद्र आगाल