परशुराम पर राजनीति
21-Aug-2020 12:00 AM 3997

 

उत्तर प्रदेश में इन दिनों हर राजनीतिक दल को ब्राह्मणों की चिंता खूब सता रही है। खासतौर से विपक्षी दल सपा, बसपा और कांग्रेस आए दिन ब्राह्मणों को लेकर कई तरह के वादे करते दिख रहे हैं तो वहीं सत्तादल भाजपा भी अपने इस कोर वोट बैंक को खोना नहीं चाहती। ऐसे में ब्राह्मण वोट बैंक उप्र में एक नए 'हॉट केक की तरह हो गया है। पिछले दिनों पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी के तीन अहम ब्राह्मण नेता -अभिषेक मिश्र, मनोज पांडे व माता प्रसाद पांडे से मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद ही अभिषेक मिश्र की ओर से लखनऊ में 108 फीट की परशुराम की प्रतिमा लगाने की घोषणा की गई। इस घोषणा के कुछ घंटे बाद ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रेस कॉन्फे्रंस करके कहा कि अगर वह 2022 में सत्ता में आएंगी तो परशुराम की इससे भी ऊंची प्रतिमा लगाएंगी।

इसके बाद समाजवादी पार्टी के नेता मायावती के खिलाफ मुखर हो गए। पूर्व कैबिनेट मंत्री अभिषेक मिश्र ने कहा- 'बहन जी चार बार उप्र की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, तब उन्होंने परशुरामजी की मूर्ति क्यों नहीं लगाई। परशुरामजी की जयंती पर छुट्टी की घोषणा सपा सरकार में ही हुई थी जिसे भाजपा सरकार ने बाद में कैंसिल कर दिया। वहीं समाजवादी पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता पवन पांडे ने कहा- 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार का नारा देने वाली पार्टी की बहनजी को आज ब्राह्मणों की याद आ रही है, वो ब्राह्मणों के सम्मान की बात कर रही हैं, लेकिन परशुराम के वंशजों ने मन बना लिया है कि अब कृष्ण के वंशजों के साथ रहेंगे।  कांग्रेस ने तो इस मुद्दे पर सपा-बसपा दोनों को घेरा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद कहते हैं कि जबसे उन्होंने 'ब्राह्मण चेतना संवाद की घोषणा की है उसके बाद से ही सपा-बसपा को ब्राह्मणों की चिंता सताने लगी है। इससे पहले जब ब्राह्मणों पर लगातार अत्याचार हो रहे थे तब दोनों दल चुप थे। जितिन के मुताबिक, 'प्रतिमा लगाने से बेहतर ब्राह्मणों के असल मुद्दों की लड़ाई लड़ना है। इस सरकार में ब्राह्मणों पर खूब अत्याचार हुआ है। आए दिन हत्याओं की सूचनाएं आती हैं। ऐसे में समाज को एकजुट करने का समय है।

कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद ने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र के माध्यम से परशुराम जयंती पर रद्द अवकाश को फिर से बहाल करने की मांग की है। अपने पत्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने लिखा है, 'भगवान परशुराम विष्णु भगवान के छठे अवतार कहे जाते हैं। इसी कारण वह ब्राह्मण सामज की आस्था का प्रतीक हैं। प्रदेश में भगवान परशुराम जयंती का अवकाश रद्द होने से ब्राह्मण समाज में काफी आक्रोश है। वहीं कांग्रेस के ही पूर्व सांसद राजेश मिश्रा भी लगातार ब्राह्मणों पर हो रहे अत्याचार का मुद्दा उठाते हुए पीड़ित ब्राह्मण परिवारों से मुलाकात कर रहे हैं। इसी तरह लखनऊ से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले आचार्य प्रमोद कृष्णम, उप्र कांग्रेस के  मीडिया पैनलिस्ट अंशू अवस्थी मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे को धार दिए हुए हैं। उप्र में विपक्षी दलों का ब्राह्मणों के समर्थन में उतरने की अहम वजह ब्राह्मणों की सरकार से नाराजगी है। उप्र में पिछले तीन साल में जितने भी बड़े हत्याकांड हुए वे ब्राह्मण समाज से आने वाले लोगों के ही हैं। बीते दिनों कुख्यात अपराधी विकास दुबे और फिर मुख्तार अंसारी के करीबी शूटर राकेश पांडे के एनकाउंटर ने आग में घी का काम किया है। दोनों ही एनकाउंटर्स के तरीकों पर सवाल उठे जिससे उप्र पुलिस घिरती दिखी। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष राजेंद्रनाथ त्रिपाठी का कहना है कि उप्र में बीते दो साल में 500 से अधिक ब्राह्मणों की हत्याएं हुई हैं। उनके मुताबिक, उप्र की भाजपा सरकार ब्राह्मण विरोधी है। खासतौर से वह मुख्यमंत्री योगी पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस सरकार में ब्राह्मणों का दमन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

उप्र की राजनीति में ब्राह्मणों का वर्चस्व हमेशा से रहा है। आबादी के लिहाज से सूबे में लगभग 12 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। कई विधानसभा सीटों पर तो ब्राह्मण 20 फीसदी से भी अधिक हैं। ऐसे में हर पार्टी की नजर इस वोट बैंक पर टिकी है क्योंकि जिस तरह से ब्राह्मण नाराज हैं उनके भाजपा से छिटकने की संभावनाएं काफी अधिक हैं। उप्र के राजनीतिक गलियारों में कहा जाता है 2017 में भाजपा को ब्राह्मणों का जमकर वोट मिला लेकिन सरकार में उतनी हनक नहीं दिखी। 56 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में 8 ब्राह्मणों को जगह दी गई, लेकिन दिनेश शर्मा व श्रीकांत शर्मा को छोड़ किसी को अहम विभाग नहीं दिए गए। वहीं श्रीकांत शर्मा के बारे में कहा जाता है कि उन्हें शीर्ष नेतृत्व की ओर से दिल्ली से उप्र भेजा गया है। वहीं 8 क्षत्रियों को भी मंत्री बनाया गया उनके विभाग ब्राह्मणों से बेहतर दिए गए।

2007 में जब मायावती के नेतृत्व में बीएसपी ने ब्राह्मण+दलित+मुस्लिम समीकरण पर चुनाव लड़ा तो उनकी सरकार बन गई। बसपा ने इस चुनाव में 86 टिकट ब्राह्मणों को दिए थे। हालांकि बाद में ब्राह्मण छिटककर भाजपा की ओर आ गए लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए हर दल इसी तरह के समीकरण बनाने की तैयारी कर रहा है। सपा की नजर यादव+कुर्मी+मुस्लिम+ब्राह्मण समीकरण पर है तो कांग्रेस ब्राह्मण+दलित+मुस्लिम व ओबीसी का वो तबका जो भाजपा, सपा के साथ नहीं उसे अपनी ओर खींचने में जुटा है।

- लखनऊ से मधु आलोक निगम

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