03-Nov-2020 12:00 AM
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बिहार में तीन चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। सभी पार्टियों में टिकट वितरण का कार्य पूरा हो चुका है। प्रत्याशियों के नाम सामने आते ही लगभग सभी बड़ी पार्टियों में टिकट के दावेदार रहे नेता बगावत का झंडा उठा रहे हैं। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) हो या राजद की अगुवाई वाला महागठबंधन, सभी दलों के लिए बागी परेशानी का कारण बन गए हैं। कांग्रेस भी इस समस्या से दो-चार हो रही है। दरअसल, इस बार के चुनाव में एक तरह से विकल्पों की भरमार है। इस बार राज्य में चार गठबंधन प्रमुख भूमिका में हैं। एनडीए व महागठबंधन के अलावा पूर्व सांसद राजेश रंजन यादव व पप्पू यादव की अगुवाई वाला प्रगतिशील डेमोक्रेटिक एलायंस (पीडीए) व पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा वाला ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फं्रट भी चुनाव मैदान में है। इनके अलावा एनडीए से दोस्ताना लड़ाई की मुद्रा में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) भी वहां ताल ठोक रही है जहां जदयू के उम्मीदवार हैं। ऐसे तो कोई पार्टी किसी दल के बागी को टिकट देने से गुरेज नहीं कर रही, यदि उस व्यक्ति की जीत की संभावना किसी भी समीकरण के अनुरूप थोड़ी सी भी शेष रह गई हो। संभावनाओं के इस खेल में जिसे जहां टिकट की संभावना दिख रही है, वह वहां चला जा रहा है। लोजपा बागियों के लिए पनाहगार बन गई है। बागियों के लिए भी यह पहली पसंद है जिसकी वजह इस पार्टी के पास इसका अपना पांच प्रतिशत पुख्ता वोट बैंक का होना है।
ऐसे लोगों की तादाद काफी है जिन्होंने अपनी पार्टियों में टिकट नहीं मिलने की वजह से लोजपा का दामन थाम लिया है। लोजपा ने भी ऐसे विक्षुब्धों का दिल खोलकर स्वागत किया है। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी तक घोषित 95 सीटों में लोजपा ने भाजपा के 21, जदयू के 11, कांग्रेस तीन एवं राजद व रालोसपा के दो-दो असंतुष्टों को अपना उम्मीदवार बनाया है। अपनी बातों के उलट लोजपा ने पांच ऐसी जगहों पर भी प्रत्याशी दे दिया है जहां से जदयू नहीं, भाजपा के उम्मीदवार मैदान में हैं। लोजपा में आए बागियों में सबसे प्रमुख नाम भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे राजेंद्र सिंह व पूर्व विधायक रामेश्वर चौरसिया का है। सब्र की परीक्षा में आखिरकार ऐसे प्रमुख सिपाहसलारों की राजनीतिक आस्था भी जवाब दे गई। इनके अलावा राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) नीत गठबंधन ने जदयू के दो बागी नेताओं को, तो वहीं राजद ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) व रालोसपा के एक-एक बागी नेताओं को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। जदयू के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री श्रीभगवान सिंह कुशवाहा व चंद्रशेखर पासवान को लोजपा ने टिकट दिया है, तो वहीं रालोसपा ने जदयू के रणविजय सिंह तथा भाजपा के अजय प्रताप सिंह को उम्मीदवार बनाया है। इसी तरह राजद के अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के पूर्व महासचिव सुरेश निषाद को लोजपा ने टिकट दिया है।
जेपी आंदोलन की उपज व सामाजिक न्याय के पुरोधा लालू प्रसाद यादव 1990 से 97 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। उनकी पत्नी राबड़ी देवी के नेतृत्व में 2005 तक बिहार में उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने शासन किया। चारा घोटाले के मामले में फिलहाल लालू प्रसाद रांची जेल में बंद हैं। वे लोकसभा के पहले सांसद हैं जिन्हें सजा मिलने के कारण सदन की सदस्यता के अयोग्य ठहराया गया। दरअसल इस बार गठबंधन के बदले परिदृश्य के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है। हर हाल में जीत के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सभी पार्टियां अपने-अपने प्रत्याशी तय कर रही है। 2015 में भाजपा 157 सीटों पर लड़ी थी लेकिन इस बार महज 110 पर ही लड़ेगी। इस परिस्थिति में तो 47 नेताओं को टिकट से स्वाभाविक तौर पर वंचित होना ही था। जदयू के साथ भी कमोबेश यही स्थिति है। राजद ने भी अपने कोटे की 144 सीटों में 18 विधायकों को टिकट से वंचित कर दिया है। आंकड़ों में देखा जाए तो 2015 की तुलना में इस बार राजद में 29 नए चेहरे दिखेंगे। इसी चक्कर में सभी बड़े राजनीतिक दलों ने अच्छी-खासी संख्या में वर्तमान विधायकों का टिकट काट दिया है। किसी भी दल का दामन थामने के अलावा अच्छी-खासी संख्या उन उम्मीदवारों की भी है जो बतौर निर्दलीय मैदान में हैं। इनके अलावा भी कई पार्टियों के संगठन के लोग भी बगावत कर मैदान में कूद चुके हैं।
बदस्तूर जारी रहा पाला बदल का खेल
प्रदेश की सभी पार्टियां दल-बदल के खेल का शिकार हुईं। दरअसल ध्येय तो किसी भी कीमत पर टिकट पाने का होता है, इसलिए इसमें किसी भी तरह का संशय उन्हें पाला बदलने के लिए प्रेरित करता है। तब दलीय प्रतिबद्धता या राजनीतिक आस्था महज दिखावे की वस्तु रह जाती है। इस खेल में कई लोगों को तो मुकाम मिल जाता है जबकि कई दल बदलने के बाद भी उद्देश्य में कामयाब नहीं हो पाते और जिन्हें क्षेत्र में किए काम से अपनी जीत का पूरा भरोसा होता है वे बिना किसी दल के ही रणभूमि में उतर जाते हैं। चूंकि पार्टियों का लक्ष्य भी येन-केन-प्रकारेण चुनाव में विजयश्री हासिल करना होता है, इसलिए उन्हें भी दल-बदल के खेल से गुरेज नहीं होता। स्थिति तो यहां तक आ जाती है कि पिता किसी दल में होता है और पुत्र किसी और पार्टी में। खगड़िया के लोजपा सांसद चौधरी महबूब अली कैसर के पुत्र मो. युसूफ सलाउद्दीन ने राजद का दामन थाम लिया है। कांग्रेस को छोड़कर बाहुबली नेता आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद अपने पुत्र चेतन आनंद के साथ राजद में शामिल हो गईं। मां-बेटे, दोनों को राजद ने अपना प्रत्याशी भी बना दिया। देखा जाए तो 2015 में चुनाव जीत चुके एक दर्जन से अधिक विधायकों ने अपना घर बदल लिया। अब जो किसी न किसी वजह से पार्टी बदलकर चुनाव लड़ेंगे वे तो बागी की ही संज्ञा पाएंगे।
- विनोद बक्सरी