ओबीसी आरक्षण कार्ड
07-Oct-2020 12:00 AM 3678

 

छत्तीसगढ़ शासन ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की कवायद एक बार फिर से शुरू कर दी है। सरकार इस बार राशनकार्ड धारकों की संख्या को आधार बनाएगी। लेकिन जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार की कवायद को हाईकोर्ट से दोबारा झटका मिल सकता है। छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने अपने 19 सितंबर की बैठक में सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण को 14 से 27 प्रतिशत बढ़ाने का निर्णय एक बार फिर लिया है। कैबिनेट के निर्णय में कहा गया है, 'राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर 'सामान्य वर्गÓ के लोगों को शासकीय सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने संबंधित हाईकोर्ट में लंबित मामले के निराकरण के लिए सरकार नया डेटाबेस तैयार करेगी। इसके लिए ओबीसी जनसंख्या का निर्धारण राशनकार्ड की संख्या के आधार पर किया जाएगा।Ó लेकिन आरक्षण के लिए अंतिम डेटा 2019 में सरकार द्वारा गठित छबीलाल पटेल कमीशन के मार्गदर्शन में तैयार किया जाएगा।

कैबिनेट के निर्णय में यह नहीं बताया गया है की ओबीसी जनसंख्या का निर्धारण राशनकार्ड से कैसे किया जाएगा लेकिन सरकार के अनुसार इस डेटा का अनुमोदन ग्राम सभा तथा नगरीय निकायों से कराया जाएगा। खाद्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया, 'राशनकार्ड धारकों के नाम के आधार पर नगरीय और ग्रामीण निकाय स्तर पर उनकी जाति की गणना होगी और फिर जनसंख्या का डेटाबेस तैयार किया जाएगा। यही कारण है कि सरकार आने वाले दिनों में राशनकार्ड की संख्या भी बढ़ाएगी जिससे उसका ओबीसी जनसंख्या प्रतिशत का दावा और पुष्ट हो सके।Ó

बघेल सरकार ने सितंबर 2019 में एक अध्यादेश के माध्यम से प्रदेश में सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 से 27 प्रतिशत, एससी आरक्षण 12 से 13 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए 10 प्रतिशत निर्धारित किया था। एसटी आरक्षण पूर्ववत 32 प्रतिशत ही रखा गया। इस तरह बघेल सरकार ने राज्य की शासकीय नौकरियों में कुल 82 प्रतिशत आरक्षण कर दिया था। अध्यादेश जारी करने के बाद सरकार ने जनसंख्या का डेटाबेस बनाने के लिए पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश छबीलाल पटेल की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया। आयोग का मैंडेट राज्य की जनसंख्या में अन्य पिछड़े वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों का सर्वेक्षण कर एक 'क्वांटिफिएबल डेटाÓ तैयार करना था। राज्य सरकार का मानना है कि प्रदेश की ओबीसी जनसंख्या 47 प्रतिशत है। सरकार के निर्णय को हाईकोर्ट में कई याचिकाकर्ताओं ने चुनौती दी। उनके अनुसार सरकार का ओबीसी आरक्षण अध्यादेश नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ), आरबीआई और भारत सरकार के बीपीएल सर्वे के आंकड़ों पर आधारित था जो असंवैधानिक और गैरकानूनी था। हाइकोर्ट ने अक्टूबर 2019 में इन याचिकाकर्ताओं की दलील को स्वीकार करते हुए सरकार के आदेश पर स्टे लगा दिया था। बाद में सरकार द्वारा अध्यादेश को विधानसभा में नहीं लाए जाने से वह अमान्य हो गया।

सरकार द्वारा जारी एक वक्तव्य में भूपेश बघेल और उनके मंत्रियों ने खाद्य विभाग द्वारा तैयार किए गए राशनकार्ड आधारित डेटाबेस को विश्वसनीय बताया है। सरकार के अनुसार उच्च न्यायालय के स्टे के मद्देनजर ओबीसी वर्ग का एक पारदर्शी एवं विश्वसनीय डेटाबेस बनाया जाएगा। राशनकार्ड धारकों के परिवारों की सूची ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकायों के वार्डों में सार्वजनिक की जाएगी। इस संबंध में दावा-आपत्ति का निराकरण और छूटे हुए परिवारों का राशनकार्ड बनाने नए आवेदन भी लिए जाएंगे। कैबिनेट के निर्णय में कहा गया है कि सरकार नए डेटाबेस तैयार करने का काम पटेल कमीशन के मार्गदर्शन में नई गाईडलाइन जारी कर करेगी। बता दें कि पटेल कमीशन की समयावधि 6 माह थी लेकिन सरकार ने उसकी रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया।

खाद्य विभाग के सचिव कमलप्रीत सिंह द्वारा कैबिनेट को दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश में अभी 66,73, 133 राशनकार्ड धारक है, जिनकी कुल सदस्य संख्या 2,47,70,566 है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इनमें से 31,52,325 कार्ड धारक ओबीसी हैं जिनकी सदस्य संख्या 1,18,26,787 है। यह कुल लाभान्वित जनसंख्या का 47.75 प्रतिशत है। वहीं सामान्य वर्ग के राशनकार्डों की संख्या 5.89 लाख और सदस्य संख्या 20,25,42 बताया है जो राज्य में कुल लाभान्वित जनसंख्या का 8.18 प्रतिशत है। 'राशनकार्ड की संख्या को आधार मानकर जनसंख्या सर्वे कराना कई प्रश्नों को जन्म देता है। पहले तो राशनकार्डों की संख्या ही प्रदेश में एक घोटाला साबित हुई है।Ó

भाजपा के सवाल

प्रदेश में विपक्ष का कहना है कि सरकार का ओबीसी आरक्षण का निर्णय राजनीति से प्रेरित है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार अपनी असफलताओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए 'नए प्रपंचÓ गढ़ रही है। सदन में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने बताया, 'आरक्षण के मुद्दे पर सरकार जरा भी गंभीर नहीं है। मुख्यमंत्री पिछले एक साल से चुप बैठे थे और अब अचानक ऐलान किया गया ओबीसी आरक्षण का निर्धारण फिर से किया जाएगा। यदि यह सच है तो पहले वाले अध्यादेश को क्यों रद्द होने दिया गया।Ó कौशिक आगे कहते हैं, 'सरकार ने समय रहते अपना पक्ष क्यों नहीं रखा। प्रदेश में कोरोना संक्रमण के प्रबंधन में पूरी तरह असफल होने के बाद अब मुख्यमंत्री जनता को नए शगूफे से गुमराह कर हैं।Ó भाजपा के पूर्व विधायक और पार्टी के कद्दावर नेता देवजीभाई पटेल कहते हैं, 'सरकार को भी पता है कि उसके इस कदम का हश्र क्या होने वाला है। सरकार के पास आने वाले मरवाही विधानसभा उपचुनाव में उपलब्धि गिनाने के लिए कुछ नहीं है। इसीलिए मुख्यमंत्री ओबीसी राजनीति का सहारा ले रहे हैं। 

- रायपुर से टीपी सिंह

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