02-Jul-2020 12:00 AM
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इस समय बिहार की राजनीति में चुनावी रंग धीरे-धीरे घुल रहा है। हर राजनीतिक पार्टी की कोशिश यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वह मैदान मारे। लेकिन सबकी नजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर है। क्योंकि अगर सबकुछ ठीक रहा तो वे चौथी बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में करीब 100 दिन शेष हैं और मुख्यमंत्री ने खुद को वर्चुअल और फिजिकल दुनिया के अनुकूल बना लिया है। 12 जून तक नीतीश ने अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की 6 दिवसीय मैराथन वर्चुअल कांफे्रंस में शिरकत की। इस दौरान उन्होंने राज्य के 38 जिलों के 16,000 बूथ लेवल पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, हमने 2010 और 2015 के विधानसभा चुनाव अपने सुशासन की शक्ति के बल पर जीते। 2020 में भी हम यही करने जा रहे हैं।
जिन लोगों ने इस कांफे्रंस में भाग लिया उनके मुताबिक, नीतीश आत्मविश्वास से भरे थे और उनमें जरा भी आशंका नहीं थी। उन्होंने जरूरी तौर पर तीन काम किए हैं, जिनमें वापस लौटे प्रवासियों की मदद के लिए उठाए गए कदम, कोरोनावायरस से राज्य पर आ पड़ी इंसानी त्रासदी पर चर्चा और आने वाले विधानसभा चुनाव की चर्चा। उन्होंने कहा कि चुनाव तय वक्त पर ही होंगे। नीतीश चाहते हैं कि पार्टी के कार्यकर्ता लोगों को सरकार की उपलब्धियां बताएं कि किस नवंबर 2005 में सत्ता में आने के बाद से किस तरह बिहार में बदलाव की इबारत लिखी गई, किस तरह लॉकडाउन के दौरान 8,538 करोड़ रुपए बेहद जरूरतमंद लोगों पर खर्च हुए और विपक्ष के नकारात्मक प्रचार को तथ्यों के दम पर बेदम किया।
जल संसाधन राज्यमंत्री संजय झा कहते हैं, 'हमें याद रखना चाहिए कि जब नीतीश ने पहली बार सत्ता संभाली थी तब बिहार की दशा कैसी थी। ऐसा लगता था कि पूरी दुनिया ने बिहार से उम्मीद छोड़ दी है। अब लोगों में उम्मीदें जगी है क्योंकि वे जानते हैं कि मुख्यमंत्री कुछ कर सकने में सक्षम हैं। मुख्यमंत्री के करीबी सहयोगी, भवन और निर्माण मंत्री अशोक चौधरी ये समझाते हैं कि आखिर क्यों एनडीए सरकार की स्थिति मजबूत है। वे कहते हैं, 'जब कोरोना संकट बिहार पहुंचा तो सबसे पहला धक्का प्राइवेट हेल्थकेयर संस्थाओं से लगा कि उन्होंने अपनी सेवाएं बंद कीं। सोशल सेक्टर मोटे तौर पर मौन था और राजनेता भी लॉकडाउन की वजह से घरों के भीतर रहने को बाध्य थे। केवल राज्य सरकार थी जिसका प्रतिनिधित्व करते हुए- डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्यकर्मी और लोकसेवक फील्ड में थे और इनका साथ सक्रियता से मुख्यमंत्री दे रहे थे। हमने कोरोनावायरस से पहली बार मुकाबला किया है। अब लोगों को दोबारा भरोसा, स्थायित्व और विश्वसनीय नेतृत्व चाहिए और नीतीश कुमार के नेतृत्व में हम इस संकट से बाहर आ जाएंगे।
सचमुच 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल की जदयू के हाथों हार के बाद से नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के मुख्य बिंदु बन गए हैं। तब से 2019 के आम चुनाव तक बिहार ने चार विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव देखे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो नीतीश हमेशा जीतने वाले के पाले में ही रहे हैं। संयोगवश नीतीश ने बतौर मुख्यमंत्री अपना 5,000 दिनों का कार्यकाल पूरा कर लिया है और ऐसा करने वाले वे दूसरे मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा 5,419 दिनों तक मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठे थे।
नीतीश के विकास के अफसाने के अलावा जदयू की चुनावी रणनीति हमेशा ही विकास के साथ वंचित तबके के लिए लक्षित सामाजिक कल्याण की योजनाओं को साथ मिलाकर चलने की रही है। इसी वजह से वे लालू प्रसाद यादव के मुस्लिम-यादव-दलित वोट बेस के साथ भाजपा के शहरी मध्यवर्ग और ऊंची जातियों वाले क्षेत्रों में आगे निकल सके। ईबीसी (अति पिछड़े वर्ग) में 113 अधिसूचित जातियां हैं जो कि बिहार के वोटरों का 30 फीसदी हैं। इनमें बिंद, मल्लाह, निषाद, चंद्रवंशी और नोना प्रमुख जातियां हैं। करीब 25 अधिसूचित जातियां मुस्लिम समुदाय से हैं और वे हिंदुओं की तरह ही योजनाओं का लाभ लेने की हकदार हैं।
विडंबना है कि विपक्ष की सारी चुनौती 2020 में भी न दिखने वाली सत्ता विरोधी लहर पर निर्भर है। एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, 'अगर हम 2019 के लोकसभा चुनाव का परिणाम देखें तो एनडीए ने राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 225 में बढ़त हासिल की थी। वोटों के लिहाज से देखा जाए तो दोनों गठबंधनों के बीच 92 लाख वोटों का अंतर एनडीए के पक्ष में था। अगर हम इसमें से 100 सीटें भी हार जाएं, जो कि संभव नहीं है, तब भी अगली सरकार हमारी ही बनेगी।’
महागठबंधन की दरार सुशासन बाबू के लिए शुभ संकेत
विपक्ष के महागठबंधन में दरार दिखने लगी है। मांझी ने 15 जून को पटना में प्रेस कांफ्रेंस कर गठबंधन नेतृत्व को अल्टीमेटम दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने एक समन्वय समिति बनाने की मांग करते हुए तेजस्वी को बिहार में अपना नेता मानने से इंकार कर दिया है। वहीं महागठबंधन में शामिल अन्य पार्टियां भी अलग-थलग पड़ रही हैं। अगर नीतीश को ज्यादा चुनौती मिलने की उम्मीद नहीं है तो इसकी वजह सिर्फ जदयू-भाजपा का बिहार में मजबूत गठबंधन नहीं है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि राजद की यहां पर भाजपा की तरह धु्रवीकरण वाली मौजूदगी है। पार्टी अपने अतीत से पीछा नहीं छुड़ा पा रही जो कि अराजकता वाले युग की याद दिलाता है। पार्टी प्रमुख तेजस्वी यादव अक्टूबर में चुनाव में जाने से पहले अपनी छवि में कोई बदलाव नहीं कर सके हैं।
- विनोद बक्सरी