19-May-2020 12:00 AM
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कोरोना संक्रमण भले ही मानव के लिए महामारी है, लेकिन प्रकृति के लिए यह वरदान साबित हुआ है। शहरों में अरसे बाद लोगों ने कोयल की मधुर आवाज सुनी। पेड़ों पर चिड़ियों के घोंसले बनने लगे हैं। सड़क से लेकर आसमान तक कहीं धुंआ नहीं। नदियों का पानी भी इतना साफ कि आप उसमें अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं। डर के कारण नदी के बीच में रहने वाली मछलियां अब बेखौफ होकर किनारे तक आ रही हैं। पहले लोग ताजी हवा लेने के लिए घरों से निकलकर पार्कों में जाते थे, परंतु अब घर बैठे ही साफ व स्वच्छ हवा मिल रही है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) कम हो गया है।
देश की प्रसिद्ध नदियों गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी और नर्मदा का जल इतना स्वच्छ और निर्मल हो गया कि अब इसमें बेधड़क आचमन कर सकते हैं। लॉकडाउन के कारण पर्यावरण की शुद्धता का स्तर बढ़ गया है। हवा तो शुद्ध हुई ही है, नर्मदा नदी भी निर्मल हो रही है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अप्रैल में नर्मदा के जल की 13 स्थानों पर जांच की। इसके नतीजे बताते हैं कि नर्मदा 15-20 साल में इतनी शुद्ध और निर्मल हुई है। कई स्थानों पर नदी के जल में बीओडी (बॉयो केमिकल डिमांड) और टीडीएस (टोटल डिजॉल्व सॉलिड) का स्तर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है और नदी के जल की गुणवत्ता पहले से काफी बेहतर हो गई है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने पिछले दिनों बरगी, जबलपुर, तिलवारा घाट, पंचवटीघाट समेत मंडला से नरसिंहपुर तक मां नर्मदा के 13 पॉइंट के जल के सैंपल लेकर जांच की। जांच में नर्मदा इतनी शुद्ध पाई गई कि आचमन करने से भी कतराने वाले लोग अब नर्मदा के शुद्ध जल से आचमन कर सकते हैं। लॉकडाउन मां नर्मदा के लिए वरदान साबित हुआ है। बंद कारखानों, फूल-माला, दीपदान, लोगों द्वारा किए जाने वाले स्नान, घाटों पर कपड़ों की धुलाई और गंदगी का स्तर एक महीने में जीरो हो गया है। इस वजह से नर्मदा का जल स्वच्छ और निर्मल होकर बिल्कुल मिनरल वाटर जैसा हो गया है। नर्मदा जल की शुद्धता का स्तर ए ग्रेड में पहुंच गया है। टीडीएस (टोटल डिजॉल्व सॉलिड) पानी में घुले ठोस पदार्थ इसमें खनिज, धातु, अनाज या अन्य पदार्थ शामिल होता है। सामान्यत: नर्मदा जल में इसकी मात्रा 200 से 350 मिलीग्राम प्रति लीटर मिलती थी। लॉकडाउन में अप्रैल 2020 में ये 150 से 200 मिलीग्राम प्रति लीटर मिली है। ये जितना कम होता है पानी उतना ही शुद्घ माना जाता है। इसी वजह से नर्मदा का पानी ए ग्रेड में आ गया है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच के नतीजे बताते हैं कि वर्तमान में नर्मदा में टीडीएस की मात्रा लॉकडाउन के पहले के मुकाबले 30 फीसदी तक घट गई है। मतलब साफ है कि अब नर्मदा का पानी मिनरल वाटर जैसा पीने योग्य हो गया है।
नदियों में आर्गेनिक वेस्ट, सीवेज मिलने से बीओडी (बायोकैमिकल ऑक्सीजन डिमांड) का स्तर बढ़ता है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मंडला से जबलपुर के बीच 13 पॉइंट पर जांच की। मार्च 2020 तक इसका स्तर प्रति मिलीग्राम 1.8 या 1.9 प्रति मिलीग्राम प्रति लीटर तक रहा। वह अप्रैल 2020 की जांच में 0.7 से 1 प्रति मिलीग्राम तक आ गया। जैविक ऑक्सीजन की मांग की बात करें तो इसे पीने योग्य पानी में 3 मिलीलीटर प्रति ग्राम से कम होना चाहिए। वर्तमान में बीओडी कई स्थानों पर एक मिलीलीटर प्रति ग्राम से भी कम पाई गई है। इतने कम बीओडी ने नर्मदा जल में मछलियों की संख्या को भी अचानक से बढ़ा दिया है। इतने स्वच्छ पानी में मछलियां सहित मौजूद अन्य जलीय जंतु खुलकर सांस ले पा रहे हैं।
मध्यप्रदेश के अमरकंटक की पहाड़ी से निकली सोन नदी लगभग डेढ़ हजार किमी की दूरी तयकर बिहार के कोइलवर के आगे पथार के पास गंगा में मिलती है। इस लंबी यात्रा के दौरान सैकड़ों सीवरेज के साथ ही औद्योगिक अवशिष्ट को भी सोन में बहाया जाता था। इससे सोन नदी में प्रदूषण काफी बढ़ गया था। मगर लॉकडाउन के दिनों में स्थिति आह्लादित करने वाली दिखने लगी है। पानी एकदम स्वच्छ नजर आ रहा है। ऐसा सोन तटीय इलाकों के कारखानों के बंद होने और औद्योगिक अपशिष्ट नहीं बहाए जाने से हुआ है। यही हाल इंदौर की खान नदी और उज्जैन की क्षिप्रा का भी है। यानि देश-प्रदेश की जो भी छोटी-बड़ी नदियां हैं, सब निर्मल हो गई हैं। प्रकृति ने कोरोना के रूप में हमें सबक दिया है कि अगर हम प्रकृति का रक्षण नहीं करेंगे तो ऐसी महामारी फिर आ सकती है।
जो काम बड़े अभियान नहीं कर पाए कोरोनाकाल में हो गया
लॉकडाउन ने नदियों को सांस लेने की स्थिति में ला दिया है जो अब से पहले वेंटिलेटर पर थीं। इंदौर की खान नदी की बात हो या फिर उज्जैन की क्षिप्रा की या फिर बात करें गंगा-यमुना, नर्मदा की। सभी की हालत लॉकडाउन से पहले बहुत खराब थी। केंद्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन से पहले इनमें लैड, मैग्नीज और लोहे की मात्रा अत्यधिक थी। यह पानी किसी भी योग्य नहीं बचा था। कई नदियों के पानी में इतनी भी ऑक्सीजन नहीं बची थी कि इसमें जलीय जीव भी रह सकें। कहा तो यहां तक जाता है कि पहले इन नदियों के पानी में सिक्का डालने पर भी दिखाई देता था और हाथ में पानी लेने पर हाथ की रेखाएं भी नहीं दिखाई देती थीं। नदियों के जानकार कहते हैं कि हाल में नदियों की स्थिति 30 फीसदी तक सुधरी हंै। जो तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं सुधर रही थी। नदियों की दशा सुधरने के पीछे लॉकडाउन में इंडस्ट्री का बंद होना बताया जा रहा है। माना जा रहा है कि नदियों के किनारे लगे उद्योग अपना अपशिष्ट वहीं नदियों में गिरा रहे थे। जो अब बंद हो गया। यूं तो नदियों को ऑक्सीजन देने के लिए तमाम प्रयास किए गए, लेकिन नदियों को वेंटिलेटर से हटाने की स्थिति कभी नहीं बन पाई। वर्तमान सरकार ने भी गंगा को स्वच्छ करने के लिए नमामि गंगे योजना बनाई। इसके लिए 20 हजार करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए, पर गंगा निर्मल नहीं हुई। यमुना की सफाई पर भी 25 वर्ष में 1514 करोड़ रुपया खर्चा किया गया, लेकिन उसका कोई अधिक असर नहीं दिखा। लेकिन कोरोना के कारण किए गए लॉकडाउन में नदियों को नया जीवन मिल गया है।
- नवीन रघुवंशी