03-Nov-2020 12:00 AM
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राजस्थान में कांग्रेस की अंतर्कलह एक बार फिर कभी भी सतह पर आ सकती है। इस साल मई-जून में सचिन पायलट और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच हुआ मनमुटाव इस कदर दिक्कत दे गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा गहलोत और पायलट के बीच के खराब संबंधों को सुलझाने के लिए बनाई गई विशेष समिति की अब तक तीन दौर की बैठकें हो चुकी हैं लेकिन अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। कोविड-19 के चलते समिति का काम रुक गया क्योंकि अहमद पटेल और अजय माकन दोनों कोरोना संक्रमित हो गए हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एहतियात के तौर पर लोगों से ना मिलने का फैसला किया है। लेकिन हाल ही की दो घटनाओं से संकेत मिलता है कि परेशानी बढ़ सकती है। सबसे पहले सचिन पायलट के मीडिया मैनेजर लोकेंद्र सिंह के खिलाफ एफआईआर का मामला है, जिसमें उन्हें अदालत से राहत मिल गई है, लेकिन राज्य में राजनीतिक संकट के बीच जैसलमेर में एक होटल में रहने के दौरान 'कांग्रेस विधायकों के फोन टैपिंगÓ पर रिपोर्टिंग के लिए एफआईआर की गई थी।
आईपीसी की धारा 505 (1), 505 (2), 120 बी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 76 के तहत एफआईआर की गई है। दूसरा मुद्दा राजस्थान लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में मंजू शर्मा की नियुक्ति है। वह कुमार विश्वास की पत्नी हैं और विश्वास ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था और पायलट कैंप के कुछ लोग इसे गहलोत सरकार की ओर से असंवेदनशीलता बता रहे हैं। इसके अलावा आयोग के अन्य नए सदस्यों को गहलोत के करीबी लोगों को सौंप दिया गया। ना तो कांग्रेसियों को और न ही पार्टी नेताओं को समझ आ रहा है कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच आखिर रिश्ता क्या है ? केंद्र से आए प्रभारी अजय माकन भी कई दिनों की माथाफोड़ी के बाद भी रिश्तों की गहराई को समझ नहीं पाए। केंद्र द्वारा रचित नाटक का मंचन लंबा चलने वाला है। ऐसे में जिन्होंने मंत्री पद की शपथ के लिए नई पोशाक तैयार करवाई थी, उसको संदूक में बंद कर देना चाहिए।
दरअसल हकीकत यह है कि गहलोत और सचिन के आपस में हाथ मिलवाने के पीछे सभी का फौरी स्वार्थ था। जहां गहलोत बहुमत सिद्ध करने तक कोई कौतक से दूर रहना चाहते थे, वहीं सचिन ग्रुप की मजबूरी अपनी सदस्यता बचाना पहली प्राथमिकता थी। वैसे भी पायलट ग्रुप बुझा हुआ सुतली का बम था। इस गुट की असलियत जगजाहिर हो चुकी थी। इसलिए आलाकमान के सामने नाक रगड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। आलाकमान राजस्थान जैसे बड़े प्रदेश पर भाजपा के कब्जे से आतंकित था। इसलिए ना चाहते हुए भी सचिन के साथ समझौते की रस्म अदायगी की। सभी ने अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर हाथ मिलाने का असफल नाटक का मंचन किया जिसके क्लाइमेक्स में होगी पदों की जोरदार छीना-झपटी और तगड़ी वाली मारकाट। ऐसे में हाथ मिलाने तथा आत्मसम्मान की सारी बात स्वाहा होकर रह जाएगी। तय हुआ था कि दोनों अर्थात् अशोक गहलोत और सचिन पायलट पार्टी हित के लिए परस्पर मिलकर कार्य करेंगे। पार्टी गई तेल लेने। दोनों गुट आपस में शिकस्त देने के लिए एक-दूसरे के मोहरों को पीटने के लिए नित नई चाल रहे हैं। कोई विधानसभा में नहीं आता है तो किसी के द्वारा पीसीसी कार्यालय आने में आनाकानी की जाती है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि सचिन पायलट का इरादा गुरिल्ला युद्ध के जरिए अशोक गहलोत को परेशान कर परास्त करना है। राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर पायलट पीसीसी दफ्तर गए तो गहलोत ने अपना पूर्व घोषित कार्यक्रम रद्द कर दिया। इसी तरह नीट आदि की परीक्षा निरस्ती के लिए आयोजित धरने पर अचानक सचिन के पहुंचने से गहलोत खेमे में जबरदस्त मायूसी छा गई। धरनास्थल पर ही सचिन पायलट जिंदाबाद के नारे लगने से स्थिति बड़ी विचित्र हो गई। प्रताप सिंह खाचरियावास की तो बोलती ही बंद हो गई। जो कल तक सचिन को नसीहत दे रहे थे, सामने देखकर उस खाचरियावास की घिग्घी बंध गई। मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा तो धरना स्थल पर आने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाए। क्या इसी को मन मिलना कहते हैं? जिस कांग्रेस को भाजपा से लड़ना चाहिए, वह आपस में ही लड़कर लहूलुहान हो रही है। यह लड़ाई थम जाएगी, इसकी संभावना फिलहाल तो दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। लड़ाई किसी हद तक तभी थम सकती है जब अशोक गहलोत और सचिन पायलट में से किसी एक को दिल्ली नहीं भेजा जाता। गहलोत मुख्यमंत्री का पद छोड़कर दिल्ली जाने से रहे। ऐसे में सचिन को दिल्ली भेजकर युद्ध पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगले विधानसभा चुनाव में विज्ञापन देने के बाद भी कांग्रेस को प्रत्याशी नहीं मिलेंगे।
विरोधियों को ऐसे साध सकते थे गहलोत!
अशोक गहलोत के विरोधी एक नेता ने कहा कि इसके जरिए विरोधी नेताओं को विश्वास में लिया जा सकता था। दूसरी ओर गहलोत खेमे के लोगों का कहना है कि पायलट की चुप्पी को नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि वह सरकार के साथ सहयोग कर रहे हैं। एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, 'वह यात्रा कर रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं और ट्विटर पर भारी भीड़ की तस्वीरें ट्वीट की जा रही हैं। यह स्पष्ट रूप से अशोक गहलोत के खिलाफ खुद को प्रोजेक्ट करने की कोशिश है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं है कि उनकी महत्वाकांक्षा है और चीजें फिर से खराब हो सकती हैं। केंद्र में कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार, सचिन पायलट को आश्वासन दिया गया था, लेकिन बदले में उन्हें गहलोत के खिलाफ नहीं बोलने के लिए कहा गया। अब तक केंद्रीय नेतृत्व को कोई शिकायत नहीं है लेकिन यह अच्छी तरह से पता है कि राजस्थान एक लाक्षागृह पर बैठा है और उसमें कभी भी आग लग सकती है।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी