नाराजगी के सुर तेज
20-Nov-2020 12:00 AM 3707

 

2014 तक भाजपा की महाराष्ट्र इकाई पर काफी हद तक दो गुटों का नियंत्रण था- एक का नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे करते थे और दूसरे का नितिन गडकरी। वर्चस्व की जद्दोजहद में अक्सर दोनों खेमों में टकराव भी होता रहता था। हालांकि, 2014 के बाद इसकी प्रासंगिकता खत्म हो गई क्योंकि उसी वर्ष मुंडे का निधन हो गया और गडकरी केंद्रीय मंत्री के रूप में केंद्र में चले गए। यही वह वर्ष भी था जब भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने, इसके साथ ही 'फडणवीस कैंप’ के तौर पर पार्टी की महाराष्ट्र इकाई के भीतर एक नए नेतृत्व के बीज पड़े। इसे भाजपा के 'मोदी-शाह’ वाले केंद्रीय नेतृत्व का आशीर्वाद हासिल था।

6 साल बाद मुंडे और गडकरी दोनों खेमे कमजोर पड़ चुके हैं और पार्टी में मोटे तौर पर दो खेमों के बीच एक हल्की रेखा खिंच चुकी है, एक वे जो 'फडणवीस खेमे’ में हैं और दूसरे जो इसमें नहीं हैं, दूसरे वाले खेमे में ज्यादातर पार्टी के बुजुर्ग नेता शामिल हैं। मुंडे और गडकरी शिविरों के बीच टकराव के विपरीत इन दो नए गुटों के बीच बहुत ज्यादा मतभेद नहीं हैं। लेकिन कभी-कभार ऐसी घटनाएं होती हैं जिसे लेकर नाराजगी के सुर तेज हो जाते हैं- हाल में भाजपा के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे का इस्तीफा एक ऐसी ही घटना है। 2016 में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद एक सशक्त राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने को मजबूर हुए खडसे ने भाजपा छोड़ने के लिए पूरी तौर पर फडणवीस को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, फडणवीस के खिलाफ कोई खुली बगावत नहीं हुई है लेकिन पार्टी के ऐसे वरिष्ठ नेताओं के बीच असंतोष की सुगबुगाहट तेज हो गई है जिनकी महत्वाकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए फडणवीस को आगे बढ़ाया गया था। राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वालों का कहना है कि फडणवीस ने 2014 में मुख्यमंत्री के तौर पर पदभार संभालने के बाद ही सुव्यवस्थित तरीके से अपने लिए चुनौती बनने वाले वरिष्ठ पार्टी नेताओं के पर कतरने शुरू कर दिए थे। मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले खडसे इसी का उदाहरण हैं। पिछले सप्ताह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल होने वाले इस नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण इस्तीफा देना पड़ा था।

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, 'जब वे मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने (फडणवीस) अपनी पार्टी या शिवसेना के मंत्रियों को कोई अधिकार दिए बिना हर बड़ा फैसला खुद ही लिया। यह मोदी मॉडल था, जिसमें औद्योगिक नीति से लेकर कृषि और कर्जमाफी तक की नीतियां शामिल थीं। विनोद तावड़े के पर तब कतरे गए जब उन्होंने ऐसे बयान देने शुरू किए कि वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रमुख नेता रहे हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन हासिल है। सुधीर मुंगंटीवार को भी दरकिनार किया गया।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने एक तरफ जहां खडसे से इस्तीफा देने के लिए कहा था, वहीं उन्होंने तावड़े और गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे जैसे मंत्रियों से कुछ विभाग छीन लिए थे। तावड़े और चंद्रशेखर बावनकुले जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी दरकिनार किया गया क्योंकि उन्हें 2019 के विधानसभा चुनावों के लिए टिकट नहीं मिला था। मुख्यमंत्री पद संभालने वाले राज्य के पहले पार्टी अध्यक्ष बने फडणवीस ने उसी समय गिरीश महाजन, पूर्व एनसीपी नेता प्रसाद लाड और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण दारेकर और राम कदम जैसे विश्वासपात्रों की अपनी टीम बनाई। केवल राज्य भाजपा प्रमुख चंद्रकांत पाटिल, जो खडसे के इस्तीफे के बाद तत्कालीन सरकार के मंत्रिमंडल में फडणवीस के बाद नंबर-2 की हैसियत रखते थे, ही अपनी जमीन बचाने में सफल रहे। पाटिल को अमित शाह का करीबी माना जाता है।

जब खडसे ने भाजपा छोड़ी तो गडकरी के करीबी रहे मुंगंटीवार ने बताया, 'वह (खडसे) एक कद्दावर नेता थे, जिन्होंने दशकों तक पार्टी के लिए काम किया और महाराष्ट्र में पार्टी को आगे बढ़ाने में अहम जिम्मेदारी निभाई। अगर ऐसे किसी नेता को इस तरह की परेशानी हो रही हो कि वह इसे छोड़ने की हद तक चला जाए तो जरूर कुछ गंभीर मसला है जिसके बारे में पार्टी को निश्चित रूप से सोचने की जरूरत है।’ उन्होंने यह भी कहा कि 2014 के बाद से महाराष्ट्र भाजपा की चिंतन बैठक यानी राज्य के वरिष्ठ नेताओं के बीच होने वाला मंथन भी पूरी तरह बंद हो गया है। पंकजा मुंडे के करीबी एक भाजपा पदाधिकारी ने कहा, 'बीड में भाजपा कार्यकर्ता और जिला नेतृत्व पंकजा ताई को दरकिनार किए जाने से नाराज थे। वह राज्य विधान परिषद में जगह मिलने की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसने पार्टी के अंदर उनके समर्थकों को नाराज कर दिया, लेकिन जबसे केंद्रीय नेतृत्व की टीम में उन्हें जगह मिली सबकुछ ठीक हो गया है।

मोदी-शाह का आशीर्वाद

अपना नाम न बताने की शर्त पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'पिछले शासनकाल में राज्य में मुंडे, प्रमोद महाजन और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के साथ निर्णय लेने का तरीका ज्यादा लोकतांत्रिक था। अगर सोशल इंजीनियरिंग की गणना के कारण कोई सीट किसी को दी जानी थी, और वहां एक और मजबूत विश्वस्त पार्टी नेता है तो उस नेता को कहीं और समायोजित किया जाता था। उन्होंने आगे कहा, 'उन्हें या तो राज्य विधान परिषद या राज्यसभा का उम्मीदवार बना दिया जाता था। अब ये निर्णय इस आधार पर भी किए जाते हैं कि कौन नेतृत्व की विचारधारा का प्रतिनिधित्व बेहतर ढंग से कर सकता है।’ हालांकि, नेता ने ऐसे संकेत भी दिए कि फडणवीस राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के लिए निर्णयों को लागू करने के लिए सिर्फ एक चेहरा भर थे। नेता ने कहा, 'इससे पहले कोई फैसला लेने में राज्य की भागीदारी 70 प्रतिशत और केंद्र की 30 प्रतिशत होती थी। अब पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पहले से ही जानता है कि पार्टी में क्या चल रहा है। यह राज्य में किसी विशेष शिविर की बात ही नहीं है। नाम न बताने के इच्छुक मुंबई के एक भाजपा पदाधिकारी ने बताया कि केंद्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस के संबंध में भाजपा के भीतर किसी भी तरह की गुटबाजी के बारे में बात न करने का अलिखित आदेश दे रखा है।

- बिन्दु माथुर

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