नाना पुराण निगमागम सम्मतं
03-Mar-2020 12:00 AM 8423

श्रीरामचरित मानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है। उत्तर भारत में रामायण के रूप में कई लोगों द्वारा प्रतिदिन पढ़ा जाता है। श्रीरामचरित मानस में इस ग्रन्थ के नायक को एक महाशक्ति के रूप में दर्शाया गया है जबकि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में श्रीराम को एक मानव के रूप में दिखाया गया है। तुलसी के प्रभु राम सर्वशक्तिमान होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। रामचरित मानस के बारे में कहा जाता है...

नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोह्यपि।

अत: यह विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने अपनी मौलिकता में और अपनी कल्पना शीलता में सृजन धर्मिता का निर्वहन किया है। हृदयस्थ श्रीराम भक्ति के आश्रय में तथा भूतभावन भगवान शिव की कृपा से तत्कालीन उपलब्ध भारतीय पारम्परिक संस्कृत साहित्य का आधार लेकर श्रीरामचरितमानस को भाषा बद्ध किया है। रामायण के सृजन में उन्हें शोध की सामग्री महर्षि वेदव्यास प्रणीत पुराण, गीता, उपनिषद् आदि साहित्य से प्राप्त हुई है। अस्तु:- श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी का बहुमूल्य 'शोध-ग्रन्थÓ है, जिसकी संरचना देश, काल, परिस्थिति आधारित होते हुए भी कालजयी, सार्वभौमिक मृत्युञ्जयी साहित्य है।

इस ग्रंथ में रामायण को अच्छी तरह से चौपाईयों के माध्यम से बताया गया है किस तरह राम का जीवन रहा, कैसे महापुरुष बने। इसीलिए रामचरित मानस की हर एक चौपाई का मंत्र सिद्ध है जिन्हें सच्चे मन से पढऩे से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। आपके अशुभ दिन चल रहे है। जिसके कारण आपको कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो इन मंत्रों के प्रभाव से आपके घर समृद्धि बनी रहेगी। यह मंत्र सिर्फ सुख के लिए ही नहीं है बल्कि बारिश न होने पर, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए हो या फिर ज्ञान प्राप्ति के लिए हो। इन मंत्रों का मनन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। रामायण के यह चौपाई मंत्र आपको रामायण कामधेनु की तरह मनोवांछित फल देते है।

विश्व में आज जितना साहित्य उपलब्ध है वह प्राचीन साहित्य के अनुक्रम में नूतन सृजन कहा जा सकता है। साहित्य का एक अर्थ यह भी है कि- 'वह विचारों का शब्दश: (शाब्दिक) संग्रह है।Ó मानव मस्तिष्क में विचार शताब्दियों से आकार ग्रहण करते रहे हैं क्योंकि मनुष्य चिंतनशील प्राणी है विचार शून्यता उसका स्वभाव (गुण) नहीं है। मानव मस्तिष्क में पारम्परिक विचारों की अनुगूंज बनी रहती है। देश, काल और परिस्थितिजन्य वह पारम्परिक वैचारिक अनुगूंज युगानुकल नए संदर्भ में प्रस्फुटित होकर नवीन साहित्य का आकार ग्रहणकर मनुष्यमात्र का मार्गदर्शक हो, मानवता के कल्याण में सहायक तत्व बनता है।

महात्मा कबीर एक अध्यात्म साधक थे, वे अपनी आध्यात्मिक साधना की अनुभूतियों के माध्यम से तर्क पूर्ण शैली में अपनी छोटी-छोटी क्षणिकाओं में भी गंभीर बात कह देते थे। भक्त हृदय सूरदासजी श्रीकृष्ण के सौन्दर्य, माधुर्य और वात्सल्यभाव के निरूपण में निरंतर निमग्न रहते थे। श्रीकृष्ण की रूप माधुरी का अनुभव भक्तों के हृदयों में करा देने में सूरदासजी सिद्धहस्त महापुरुष हैं। गुरुनानक देवजी ज्ञानी संत के साथ-साथ सामाजिक संघर्ष के दौर के अनुभवी संत होने के कारण परिस्थितिजन्य कत्र्तव्यबोध जागरण कराने वाले महापुरुष सिद्ध हुए। श्रीकृष्ण भक्ति में निरंतर निमग्ना श्रीकृष्णोपासिका मीराबाई तो भक्तिरस की रसधार में ऐसी डूबी कि 'मैं तो प्रेम दिवाणी मेरो दरद न जाणै कोयÓ, 'मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।Ó इतना ही नहीं जित देखूं तित श्याममयी है की रसानुभूति से श्रीकृष्णमयी ही हो गई।

उपर्युक्त भक्तों ने जो कुछ भी कहा-गाया अथवा लिखा या इनके मुख से निकला वह कहीं किसी के द्वारा संगृहीत किया गया। वह एक विपुल व समृद्ध साहित्य के रूप में अक्षय निधि, विश्व धरोहर 'भक्ति साहित्यÓ हो गया। इसी क्रम में श्री गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस तो अनुपम साहित्य सिद्ध हुआ। उन्होंने 'श्रीरामचरितमानसÓ के विभिन्न स्थलों में अपने हृदयस्थ रामकथा रूपी बीज के पड़े रहने का भी उल्लेख किया है और श्रीराम कृपा के माध्यम से उसके अंकुरित होने का उल्लेख भी किया है। श्रीरामचरितमानस की रचना शैली में उन्होंने श्रीरामकथा सरिता के मूलोद्गम का भी संकेत करते हुए श्रीरामकथा परम्परा का भी स्मरण किया है। श्रीराम अनंत हैं तो श्रीराम कथा भी अनंत है 'हरि अनंत हरि कथा अनंता -कहहिं सुनहिं बहु विध सब संता।Ó श्रीरामचरितमानस में कथा का शुभारंभ भी जिज्ञासा से हुआ है 'श्रीराम कौन हैं?Ó यह प्रश्न शाश्वत तथा इस प्रश्न का उत्तर भी पारम्परिक है।

उपर्युक्त प्रश्नजन्य शाश्वत और उत्तरजन्य परम्परा अपने आरंभिक काल से अद्यावधि अक्षुण्ण और प्रासंगिक है। इसीलिए साहित्य मनीषी साहित्य को विचारों का, चिंतन का और जिज्ञासा का अनुगामी मानते आए हैं।

श्री गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस के मंगलाचरण एवं मानस की आरंभिक भूमिका में तथा रामायणजी की आरती और अपनी अन्य साहित्यिक रचनाओं (जिसे हम तुलसी साहित्य के नाम से जानते हैं) में इस तथ्य का उल्लेख किया है कि श्रीरामचरितमानस मेरी परम्परा से प्राप्त धार्मिक, पौराणिक साहित्य पर आधारित श्रीरामकथा के रूप में शोध ग्रंथ है। मंगलाचरण का एक पद देखने से यह बहुत स्पष्ट हो जाता है।

रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के चरित्र का चित्रण जितने प्रभावशाली तरीके से किया गया है, उतने ही प्रभावशाली तरीके से भगवान राम के माध्यम से जीवन को जीने का तरीका भी बताया गया है। रामचरितमानस में मनुष्य को बताया गया है कि जीवन को सफल और सुखी बनाना है तो राम को भजने के साथ ही सांसारिक व्यवहार का भी ध्यान रखना होगा। यानि रामचरितमानस में विभिन्न पहलुओं पर भी गौर किया गया है।

- ओम

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