नहीं चलेगी चीन की दादागीरी
02-Jul-2020 12:00 AM 3884

 

कोरोना महामारी के बीच चीन ने लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर भारतीय सैनिकों को जिस तरह छल से निशाना बनाया उससे यह साफ है कि उसके इरादे खतरनाक हैं। बीते कुछ दिनों में चीनी सेना ने लद्दाख के साथ सिक्किम में भी भारतीय सीमा में छेड़छाड़ की जो कोशिश की वह महज दुर्योग नहीं हो सकती। चीन भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण करने की कोशिश जानबूझकर कर रहा है, यह इससे पता चलता है कि उसने एलएसी पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए बनी सहमति का उल्लंघन किया। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि चीनी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय सैनिकों पर हमला किया।

चीन के हमलावर रुख के पीछे कई कारण नजर आते हैं। एक तो यह कि वह कोरोना वायरस फैलाने में अपनी संदिग्ध भूमिका से दुनिया का ध्यान हटाना चाहता है। इस वायरस के संक्रमण से न केवल लाखों लोग मारे गए हैं, बल्कि दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में भी आ गई है। कई विकसित देश उसे आड़े हाथ ले रहे हैं। चीन को लगता है कि भारत उसके खिलाफ विकसित देशों संग खड़ा हो रहा है। ध्यान रहे अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल में जहां चीन को कठघरे में खड़ा किया वहीं भारतीय प्रधानमंत्री को जी-7 सम्मेलन में निमंत्रित किया।

चीन से त्रस्त ऑस्ट्रेलिया भी भारत से अपनी निकटता बढ़ा रहा है। चीन की दादागीरी से परेशान जापान पहले से ही भारत के साथ है। चीन इससे भी सहमा है कि क्वॉड के जरिए भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर उसकी घेरेबंदी कर रहा है, लेकिन गलवान में उसकी हरकत से तो भारत इस गठबंधन को मजबूती देना ही पसंद करेगा। अब यह किसी से छिपा नहीं कि विकसित देशों की कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेट रही हैं और इन कंपनियों के लिए भारत नया ठिकाना बन सकता है। जाहिर है चीन को यह रास नहीं आ रहा है। वह अपनी आदत के मुताबिक विवादों को बातचीत से सुलझाने के बजाय आक्रामकता दिखा रहा है, लेकिन आज के युग में उसका यह रवैया काम आने वाला नहीं है।

चीन इसे लेकर भी परेशान दिख रहा कि भारत दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में अपने आधारभूत ढांचे को मजबूत कर रहा है। बीते छह साल में मोदी सरकार ने चीन से लगती सीमा पर आधारभूत ढांचे के निर्माण में न केवल खासी तेजी दिखाई है, बल्कि यह भी साफ किया है कि यह काम उसकी प्राथमिकता में शामिल है। चीन भारत के साथ अपने अन्य पड़ोसी देशों को जिस तरह तंग कर रहा उससे यही लगता है कि वह विश्व को यह बताना चाह रहा है कि कोविड-19 महामारी को लेकर वह कठघरे में खड़ा होना स्वीकार नहीं करेगा। वह भारत को तंग करके विकसित देशों को यह संदेश भी देना चाह रहा है कि इस देश में निवेश करना ठीक नहीं होगा।

अगर भारत भी अन्य सीमा क्षेत्रों में वैसा ही करे जैसा चीन ने किया है तो चीन को भी अपनी सेनाएं लाकर उसी तरह बैठानी पड़ेंगी जैसे आज गलवान में भारतीय सेना बैठ गई है। युद्ध से चीन को कोई लाभ नहीं होना है, क्योंकि जो अक्साई चिन और वहां से होकर जा रही सिंकियांग-तिब्बत रोड उसे चाहिए थी वह तो उसके कब्जे में 1962 से ही है। चीन की प्रतिक्रिया का एक और महत्वपूर्ण कारण है पीओके से गुजरती हुई बेल्ट रोड इनीशिएटिव योजना के तहत बनी काशगर ग्वादर रोड की असुरक्षा। गुलाम कश्मीर पर भारत की आक्रामक नीति के परिणामस्वरूप उसे इसकी आशंका हो सकती है कि भारत अपने इस क्षेत्र को वापस लेने की सैन्य तैयारियां कर रहा है। इससे चीन का यह महत्वपूर्ण रणनीतिक मार्ग बाधित ही नहीं, निष्प्रयोज्य हो जाएगा। इसी कारण चीन ने सुरक्षा परिषद में अनुच्छेद-370 के समापन को मुद्दा बनाने की असफल कोशिश की। चीनी इससे सशंकित भी है कि भारत अमेरिकी योजना का हिस्सा बन रहा है।

भारत को अमेरिका के साथ जाने के क्या परिणाम होंगे, यह बताने के लिए ही शायद चीन ने लद्दाख में सीमा विवाद को आधार बनाया है। चीन भारत पर वुहान भावना के विरूद्ध जाने का आरोप लगाता है, लेकिन वुहान भावना का प्रदर्शन एकतरफा नहीं हो सकता। चीन अनुच्छेद-370 और पीओके पर भारत के पक्ष को समझने को तैयार नहीं है। जब भी सीमाओं के चिन्हीकरण की बात आई है वह लगातार टालता ही रहा है। व्यापार में असंतुलन को दूर करने के प्रति भी उसका कोई सकारात्मक रुख नहीं रहा। चीनी-पाकिस्तानी रणनीतिक साझेदारी में कोई कमी नहीं है। भारत को घेरने की चीन की समुद्री नीति भी कहीं से ढीली नहीं पड़ी है। भारत के लिए यह निर्णायक समय है। हिमालय की सरहदों की रक्षा अब भारत की अकेली लड़ाई नहीं रह गई है। आज विश्व चीन की यह असलियत जान चुका है कि वह अपने वर्चस्व के लिए कुछ भी कर सकता है। निरंकुशता की ओर बढ़ रही चीनी शक्ति को नियंत्रित करने के वैश्विक दायित्व का निर्वहन आवश्यक हो गया है।

भारत की बदल रही रणनीतिक धारणा

सीमा पर समस्या खड़ी कर देने के बाद चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया कि प्रश्नगत क्षेत्र में भारत द्वारा किए जा रहे रक्षा निर्माण कार्यों के विरूद्ध सीमा नियंत्रण की कार्रवाई की गई है, लेकिन वहां सड़कों-पुलों का निर्माण तो पहले से ही चल रहा है। दरअसल विवाद का लक्ष्य लद्दाख की सड़कें नहीं, बल्कि भारत की बदल रही रणनीतिक धारणा है। 1993 और उसके बाद के समझौतों में सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति हुई थी, लेकिन भारतीय प्रयासों के बावजूद चीन युद्धविराम रेखा के चिन्हीकरण पर सहमत नहीं हुआ। सीमा रेखा पर एक चौड़े से क्षेत्र को आभासी सीमा क्षेत्र मान लिया गया जिसमें दोनों पक्ष गश्त करते हैं। इस क्षेत्र में आगे अधिक बढ़ने पर दूसरा पक्ष विरोध करता है, लेकिन अपनी ताजा हरकत से चीन ने सैन्य पेट्रोलिंग के क्षेत्र बाधित कर दिए हैं। इस तरह चीन ने 1993 के समझौते से विकसित हुई आपसी समझ को तिलांजलि दे दी है। चीन सीमाओं के चिन्हांकन से इसीलिए बचता है ताकि विवाद की स्थितियां पैदा कर सके, लेकिन पाकिस्तान को भारत के समानांतर ला खड़े करने वाला चीन अब यह देख रहा है कि डोकलाम के बाद नए भारत की सोच बदल चुकी है।

- कुमार विनोद

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