मुफ्त की रेवड़ियों पर लगाम कब...?
01-Aug-2022 12:00 AM 5556
  • प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट भी मुफ्तखोरी के खिलाफ
  • चुनावी सौगातों के कारण कंगाली के कगार पर देश के आधे राज्य

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का सिलसिला अब विकराल रूप ले चुका है। इससे लोकतंत्र की गरिमा को आघात पहुंच रहा है। ऐसे में खुद प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी मुफ्त की बंदरबाट पर सवाल खड़े किए हैं। लेकिन भारत में ऐसी कोई प्रमुख पार्टी नहीं है, जिसने चुनावों के दौरान मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की सियासत न की हो। इसी प्रचार पर फोकस रखा जाता है-'मुफ्त ले लो, पर वोट हमें दे दो।Ó

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहां लोकतंत्र की जड़ें काफी मजबूत हैं। तभी तो यहां जब भी लोकतंत्र का महापर्व यानी चुनाव आता है तो देश की पूरी आबादी उसके रंग में रंग जाती है। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक से देश में लोगों को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का सिलसिला इस तेजी से बढ़ा है कि लोकतंत्र का महापर्व मुफ्त की घोषणाओं का बाजार बनकर रह जाता है। हर राजनीतिक पार्टी इस दौरान लोगों को आकर्षित करने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं करती हैं। दक्षिण भारत से शुरू हुआ मुफ्त की रेवड़ी बांटने का सिलसिला आज पूरे देश में पसर चुका है। अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ्त की रेवड़ियां बांटने पर आपत्ति दर्ज कराई है। वहीं चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का सिलसिला बंद होगा और कब?

अभी हाल ही में बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे के शुभारंभ अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने मुफ्त रेवड़ियां बांटने की राजनीति का मुद्दा उठाया था। मुफ्तखोरी के जरिए वोट बटोरने की संस्कृति पर सख्त टिप्पणी की थी और ऐसी रेवड़ियों को देश के विकास के लिए घातक भी करार दिया था। प्रधानमंत्री ने खासकर युवाओं को सावधान करते हुए आव्हान किया था कि हमें इस सोच को हराना और राजनीति से हटाना है। प्रधानमंत्री के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से चुनाव प्रचार के दौरान सार्वजनिक धन से तर्कहीन मुफ्त उपहार देने का वादा करने वाले राजनीतिक दलों के मुद्दे को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर एक स्टैंड लेने के लिए कहा। भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने केंद्र से इस बात पर विचार करने को कहा कि क्या समाधान के लिए वित्त आयोग के सुझाव मांगे जा सकते हैं। इससे देश में सवाल उठने लगे हैं कि क्या मुफ्त की रेवड़ियां बांटने पर अंकुश लगेगा?

सभी रेवड़ी की श्रेणी में नहीं

बहरहाल भारत में ऐसी कोई प्रमुख पार्टी नहीं है, जिसने चुनावों के दौरान मुफ्त रेवड़ियां बांटने की सियासत न की हो। इसी प्रचार पर फोकस रखा जाता है-'मुफ्त ले लो, पर वोट हमें दे दो।Ó  दरअसल रेवड़ियां, जन कल्याणकारी योजनाओं और लोक लुभावन नीतियों के बीच एक पतली-सी लकीर है। यदि आम नागरिक की जिंदगी, आजीविका, अस्तित्व से जुड़ी कोई परियोजना है और उसे सरकार नि:शुल्क ही मुहैया करा रही है, तो उसे रेवड़ी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। भारत एक सामाजिक कल्याण की सोच वाला देश है, लोकतंत्र है, जनता के प्रति सरकार के दायित्व हैं। अर्थव्यवस्था, राजकोषीय घाटा, राष्ट्रीय कर्ज, जीडीपी और कर-संग्रह बेहद महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन उनके मद्देनजर सरकार जनता को गरीबी और भुखमरी की तरफ नहीं धकेल सकती। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज लगातार बांट रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सस्ता अनाज अलग से उपलब्ध कराया जाता रहा है। देश में खाद्य सुरक्षा का कानून है। इसके अलावा, कोरोना-रोधी टीकों की 200 करोड़ से अधिक खुराकें भी नि:शुल्क दी गई हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। आयुष्मान भारत, उज्ज्वला गैस योजना, पक्के घर, नल में जल, शौचालय, किसान सम्मान राशि आदि योजनाएं लगभग नि:शुल्क हैं। उन्हें रेवड़ियां नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे राष्ट्रीय स्तर पर, हर राज्य और हर पात्र नागरिक को मुहैया कराई जा रही हैं। देश में 6-14 साल के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा भी मुफ्त है। हालांकि शीर्ष अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी को सचेत सलाह दी थी कि सितंबर, 2022 तक मुफ्त अनाज वाली योजना जारी न रखी जाए, क्योंकि उससे हजारों करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। अर्थव्यवस्था असंतुलित भी हो सकती है, लेकिन कोरोना महामारी के दुष्प्रभावों के मद्देनजर प्रधानमंत्री ने योजना को जारी रखने का फैसला किया। मकसद था कि इस दौर में देश का कोई भी नागरिक भूखा नहीं सोना चाहिए।

ये हैं मुफ्त रेवड़ियां

दरअसल 'मुफ्त रेवड़ियोंÓ में नि:शुल्क बिजली-पानी, इलाज, टीवी, साइकिल, लैपटॉप, स्मार्टफोन, बाइक, साड़ी, मंगलसूत्र, वाशिंग मशीन, प्रेशर कुकर, मुफ्त परिवहन आदि को गिना जा सकता है, जो विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के मौके पर परोसते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने सिर्फ दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को निशाना बनाते हुए रेवड़ियों की बात नहीं की थी, लेकिन त्वरित प्रतिक्रिया केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आप) की तरफ से ही आई है। राजधानी दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 4.01 लाख रुपए है। यह खुद दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने विधानसभा में कहा है। दिल्ली अर्द्धराज्य है। उसके तमाम मोटे खर्च केंद्र सरकार करती है। दिल्ली सरकार एक बड़ी नगरपालिका है। उसे करीब 70,000 करोड़ रुपए का बजट दिया गया है, लेकिन उसके अलावा 9500 करोड़ रुपए अनुदान के तौर पर केंद्र सरकार से लिए जाते हैं। ऐसे कथित राज्य को मुफ्त रेवड़ियां बांटने की जरूरत क्या है? शिक्षा, इलाज आदि केंद्र सरकार मुहैया करवा रही है। दरअसल आने वाले वक़्त में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक केजरीवाल सरकार की अनियमितताओं के खुलासे करेगा। आप की पंजाब में सरकार बने चार महीने हुए हैं। पंजाब पर करीब 4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है, फिर भी राज्य सरकार मुफ्त बिजली, राशन, महिलाओं को 1000 रुपए प्रतिमाह आदि की रेवड़ियों में जुटी है। पैसा मांगने मुख्यमंत्री दिल्ली में प्रधानमंत्री के पास चले आते हैं। ऐसी मुफ्तखोरी से जनकल्याण कैसे होगा? राज्य ही दिवालिया हो जाएंगे। सर्वोच्च अदालत ने भी 'रेवड़ियोंÓ की सियासत पर अपनी चिंता और सरोकार जताए हैं, लेकिन फिलहाल दखल देने से इंकार कर दिया है। रेवड़ियों की संस्कृति ज्यादातर दक्षिण भारत के राज्यों में दिखी है। तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में मुफ्तखोरी के कई चुनावी वायदे किए गए हैं। उनकी बजटीय स्थितियां हमें ज्यादा नहीं पता हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था तो देशभर की प्रभावित होती है।

कंगाली के कगार पर आधे राज्य

देश में कोरोना महामारी के बाद कई राज्यों ने जनता को सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं की रेवड़ियां बांटकर खुद को कंगाली के कगार पर खड़ा कर दिया है। बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई के बीच अब इन वोट बटोरने वाली योजनाओं पर नई बहस छिड़ गई है। पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, गुजरात, बिहार, उप्र जैसे कई राज्य कर्ज के मकड़ जाल में फंसे हैं। अगर इन राज्यों को केंद्र मदद न करे तो हालात श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे हो सकते हैं। आर्थिक विशेषज्ञ लगातार केंद्र को कृषि और स्वास्थ्य योजनाओं में सब्सिडी धीरे-धीरे कम करने और मुफ्त की योजनाओं पर प्रतिबंध की सलाह दे रहे हैं, क्योंकि कंठ तक कर्ज में डूबे ये राज्य आय का आधे से ज्यादा हिस्सा कर्ज चुकाने में खर्च कर रहे हैं।

रिजर्व बैंक के मुताबिक पंजाब ने पिछले कुछ साल में केवल 5 फीसदी रकम आर्थिक संसाधन बनाने में खर्च की जबकि 45 फीसदी से अधिक रकम कर्ज की किस्तों में जमा की। आंध्र प्रदेश ने 10 फीसदी रकम आर्थिक संसाधनों पर जबकि 25 फीसदी कर्ज अदायगी में खर्च की। बाकी राज्यों का भी यही हाल है। राज्यों पर औसतन राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 31.3 फीसदी कर्ज है। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर पर उसकी जीएसडीपी का 56.6 फीसदी तो पंजाब पर रिकॉर्ड 53.3 फीसदी कर्ज है। इसके बाद राजस्थान 39.8 फीसदी, पश्चिम बंगाल 38.8 फीसदी, केरल 38.3 फीसदी, आंध्रप्रदेश 37.6 फीसदी कर्ज है। बड़े राज्यों में सिर्फ गुजरात 23 फीसदी और महाराष्ट्र 20 फीसदी कर्ज के साथ राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) लक्ष्य 20 फीसदी के करीब हैं।

वोटरों को लुभाने से बढ़ा कर्ज

पंजाब में आप ने चुनावी वायदे में हर महिला को 1,000 रुपए महीने और हर महीने 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने को कहा था। इससे भगवंत मान सरकार पर 17500 करोड़ रुपए अतिरिक्त भार पड़ेगा। बिजली पर हर साल 5,500 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा। इसी तरह उप्र में भी मुफ्त एलपीजी सिलेंडर योजना पर हजारों करोड़ खर्च होंगे। बिहार, राजस्थान, मप्र और आंध्र प्रदेश का भी यही हाल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बेहतर टैक्स व्यवस्था ही खुशहाली ला सकती है। जरूरतमंदों तक योजनाएं पहुंचे मगर दुरुपयोग न हो। अमेरिका और यूरोप समेत तमाम देशों में सामाजिक सुरक्षा टैक्स लिया जाता है। चीन में यह 10 तो रूस में 11 फीसदी है। इस रकम से गरीबों की मदद होती है। भारत में भी इससे गरीबों को मदद मिल सकती है। राजस्थान में अब तक की सरकारों ने जितना कर्ज लिया उसका 25 फीसदी गहलोत ने तीन साल में लिया। राज्य पर कुल कर्ज 4 लाख 34 हजार करोड़ से ज्यादा हो चुका है। सरकार सालाना 25 हजार करोड़ रुपए का ब्याज अदा कर रही है। पुरानी पेंशन योजना और मुफ्त बिजली राज्य को और भी भयंकर कर्ज में फंसा सकती है।

उप्र सहित हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा सहित अन्य राजनीतिक दलों ने अपना चुनावी अभियान मुख्य रूप से इन्हीं मुफ्त की रेवड़ियों के इर्दगिर्द तक सीमित रखा था। सभी हालिया चुनावी अभियानों में मोदी सरकार ने अपना पूरा ध्यान गरीब कल्याण पर केंद्रित रखा था। गरीब कल्याण के लिए हर उपाय को इस प्रकार बेचा गया कि वह या तो ऐतिहासिक बन गया या दुनिया में सबसे बड़ा। मई में जब सरकार के 8 साल पूरे हो गए, तब मोदी ने एक गरीब कल्याण सम्मेलन में इस पर बात की और एक के बाद एक कल्याणकारी योजनाएं गिनाईं, जो निश्चित रूप से मुफ्त की रेवड़ी की श्रेणी में आती हैं। उनकी सरकार पहले इस शब्दावली का न के बराबर इस्तेमाल करती थी। अपने पहले कार्यकाल (2014-19) के दौरान मोदी ने बदलाव की राजनीति की बात की थी। उन्होंने महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (मनरेगा) की जमकर आलोचना की थी। इसकी आलोचना में उन्होंने कहा था कि भारत के नागरिक गड्ढ़ा खोदने में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। उनके लंबे चौड़े भाषणों में गरीब और गरीबी शब्द मुश्किल से जगह बना पाते थे। लेकिन बाद में हर राज्य में विधानसभा चुनावों और 2019 में आम चुनावों से पहले उन्होंने एलपीजी में सब्सिडी और किसानों के लिए नगद भुगतान के लिए योजना की घोषणा कर दी। महामारी के दौरान उन्होंने मुफ्त राशन की योजना लागू की और कोविड-19 के टीकाकरण को मुख्य कल्याणकारी कदम बताया और इसे विश्व के सबसे बड़े मुफ्त टीकाकरण अभियान की संज्ञा दी। मोदी को कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए धन्यवाद देने के लिए केंद्र सरकार ने कई कार्यक्रम भी चलाए।

पहले तमिलनाडु तक सीमित

एक समय ऐसा था जब लोक लुभावन घोषणाएं कर मुफ्त चीजें देने के वादे तमिलनाडु तक ही सीमित थे, लेकिन अब यही काम देशभर में राजनीतिक दल करने में लग गए हैं। जब एक दल मुफ्त चीजें देने की घोषणा करता है तो दूसरे दल भी ऐसा करने से नहीं चूकते और वे भी ऐसी घोषणाएं करने के लिए विवश हो जाते हैं। चुनावों की तारीख आते ही राजनीतिक दल पूरी तरह से सक्रिय हो जाते हैं। इन दलों की ओर से जनता के सामने लोक लुभावन वादे किए जाते हैं। ऐसे वादों पर सरकार को संज्ञान लेना चाहिए ताकि मुफ्तखोरी पर अंकुश लगे। ऐसा करने की अनुमति राजनीतिक दलों को नहीं दी जानी चाहिए। एक समय वो था जब लोक लुभावन घोषणाओं के तहत मुफ्त चीजें देने के वादे तमिलनाडु तक सीमित थे। देश में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। हाल ही में गोवा, पंजाब, मणिपुर से लेकर उप्र और उत्तराखंड में कोई दल मुफ्त बिजली देने का वादा कर रहा था तो कोई मोबाइल-लैपटाप बांटने की बातें कर रहा था। किसानों का मामला इन दिनों काफी चर्चा में है। इसलिए राजनीतिक दलों की ओर से उनके कर्ज माफ करने की भी घोषणाएं की जाती हैं। ऐसे में लोक लुभावन वादे करने की राजनीति बेलगाम होती जा रही है। हालात तो यहां तक आ गए हैं कि अब नकद राशि देने के भी वादे किए जा रहे हैं। यह एक तरह से मतदाताओं के वोट खरीदने की कोशिश है। चुनावों के दौरान पैसे और शराब बांटने का सिलसिला पहले से ही कायम है। यह तथ्य है कि चुनावों के दौरान उस पैसे की बड़े पैमाने पर बरामदगी होने लगी है, जो मतदाताओं के बीच चोरी-छिपे बांटने के लिए एकत्र किया जाता है। चुनावों में राजनीतिक दलों की ओर से की जाने वाली घोषणाओं का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो उसने यह पाया था कि साड़ी, मिक्सी, मोबाइल, टीवी आदि मुफ्त देने की घोषणाओं से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद ही ध्वस्त हो जाती है। सच तो यह है कि ऐेसी घोषणाएं अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने का काम करती हैं। जब कोविड महामारी के चलते राज्यों की आर्थिक स्थिति पहले से ही खस्ताहाल है तब फिर राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना आवश्यक हो जाता है। बेहतर होगा कि निर्वाचन आयोग ऐसे कोई दिशा-निर्देश जारी करे, जिससे राजनीतिक दलों की मनमानी घोषणाओं पर लगाम लगे। क्योंकि इससे मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है। यह समझा जाना चाहिए कि इस संस्कृति को बढ़ावा देकर कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकता।

न टिकाऊ न जिताऊ

यदि मतदाता बुद्धिमान और शिक्षित हैं, तो वे इस तरह की चालों के झांसे में नहीं आएंगे। मुफ्त उपहार स्वीकार करने के बाद भी, वे सरकार के प्रदर्शन या उसकी कमी के अनुसार मतदान करना चुन सकते हैं। यदि वे मुफ्त उपहारों और वादों को अस्वीकार करते हैं, तो राजनीतिक दल अधिक रचनात्मक कार्यक्रमों के लिए आगे बढ़ेंगे। अस्वीकृति की शुरुआत पंचायत राज और राज्य विधानसभा चुनावों से होनी चाहिए। मतदाताओं के केवल एक निश्चित वर्ग के लिए किसी विशेष क्षेत्र में सब्सिडी चुनाव में जीत का आश्वासन नहीं दे सकती है। श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था के पतन की हालिया खबरों ने राज्य की भूमिका पर एक नई बहस को जन्म दिया है। श्रीलंका की सरकार ने बोर्ड भर में करों में कटौती की और कई मुफ्त सामान और सेवाएं प्रदान कीं। नतीजतन, अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई और सरकार गिर गई। संभावित मतदाताओं को मुफ्त उपहार देने या देने का वादा करने वाली राजनीतिक पार्टियां न तो बहुत पुरानी हैं और न ही बहुत नई घटना हैं। लेकिन, पिछले 10 वर्षों में इस प्रथा का विस्तार होता दिख रहा है। आमतौर पर वितरित किए जाने वाले मुफ्त में साइकिल, स्मार्टफोन, टीवी, लैपटॉप और बिलों पर छूट (पानी, बिजली, आदि) जैसे सामान शामिल हैं। सत्ता में पार्टियों द्वारा मुफ्त में बांटे जाते हैं और विपक्षी दलों द्वारा वादा किया जाता है।

प्रधानमंत्री मोदी के मुफ्त की रेवड़ी भाषण के बाद ये गंभीर विषय जोर-शोर से चर्चा में है, आजकल हमारे देश में हर पार्टी के द्वारा मुफ्त की रेवड़ी बांटकर वोट बटोरने का कल्चर है। ये रेवड़ी कल्चर देश के विकास के लिए बहुत घातक है। इस रेवड़ी कल्चर से देश के लोगों को और खासकर युवाओं को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। वर्षों से मुफ्त उपहार भारत में राजनीति का एक अभिन्न अंग बन गए हैं, चाहे चुनावी लड़ाई में वादे करने के लिए हो या सत्ता में बने रहने के लिए मुफ्त सुविधाएं प्रदान करने के लिए।

रेवड़ी की राजनीति कैसे खत्म होगी?

भारतीय राजनीति की कुछ बीमारियां लाइलाज हैं। रेवड़ी बांटने की राजनीति उन्हीं में से एक है। यह बीमारी तभी से है, जब से चुनाव होते हैं और सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि किसी न किसी रूप में दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में है। भारत में जब इस पर बहस शुरू हुई है तो कुछ विद्वान लोग बताने लगे हैं कि विचारधारात्मक राजनीति के कमजोर होने के बाद रेवड़ी बांटने की राजनीति बढ़ी है। असल में ऐसा नहीं है। जब कथित तौर पर विचाराधारात्मक राजनीति बहुत मजबूत थी और पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर राजनीति करती व चुनाव लड़ती थीं तब भी रेवड़ी बांटने की राजनीति होती थी। फर्क यह है कि तब रेवड़ी बांटने की राजनीति को एक मजबूत सैद्धांतिक आधार दिया जाता था और आज सीधे मतदाता को रिश्वत देने के अंदाज में रेवड़ी बांटी जा रही है। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि सैद्धांतिक आधार के साथ रेवड़ी बांटना ठीक हो और रिश्वत देने के अंदाज में रेवड़ी बांटना गलत हो?

सवाल है कि रेवड़ी बांटने की राजनीति क्यों शुरू हुई और क्यों अभी तक जारी है? इस सवाल के जवाब में ही यह निष्कर्ष छिपा है कि भारत में रेवड़ी की राजनीति कभी खत्म नहीं होगी। आजादी के बाद रेवड़ी बांटने की शुरुआत देश के सामाजिक और ऐतिहासिक हालातों की वजह से हुई। सदियों तक गुलाम रहे देश में बड़ी आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थी। इसलिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था करने से लेकर मुफ्त राशन बांटने तक की शुरुआत हुई। तब भारत में अन्न का अकाल था। भारत 'शिप टू माउथÓ वाला देश था। दुनिया के दूसरे देशों से जहाज पर लद कर अनाज आता था तब लोगों का पेट भरता था। ऐसे देश में अगर सरकार कमजोर व वंचित वर्गों के लिए एफरमेटिव एक्शन नहीं लेती तो अराजकता के हालात बन सकते थे। अफसोस की बात है कि समय के साथ खत्म होने की बजाय एफरमेटिव एक्शन वाली राजनीति मजबूत होती चली गई। भारत अन्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया और दुनिया की पांचवीं-छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया फिर भी एफरमेटिव एक्शन की जरूरत बनी रही या बनाए रखी गई।

आजादी के बाद जितने भी समय आधारित कानून बनाए गए या एफरमेटिव एक्शन लिए गए वे सब आज भी जस के तस चल रहे हैं। आजादी के 75 साल बाद भी आरक्षण की व्यवस्था न सिर्फ कायम है, बल्कि इसकी मांग और बढ़ गई है। अनाज के मामले में देश के आत्मनिर्भर हो जाने के पांच दशक बाद भी देश की 70 फीसदी के करीब आबादी सरकार की ओर से दिए जा रहे मुफ्त अनाज पर निर्भर है।

इसलिए देश में ऐसी व्यवस्था लागू होनी चाहिए जिससे जरूरतमंदों को सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ मिले। अगर सरकार यह सुनिश्चित कर दे कि सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्ति को मिल जाएगा, तो मुफ्त की रेवड़ियां बांटने वालों पर भी लगाम लग जाएगी। दरअसल, देश की बड़ी आबादी अभी भी सुविधाविहीन है। बेरोजगारी और गरीबी के कारण लोग मुफ्त की चीजों की ओर तेजी से आकर्षित होते हैं। इसलिए राजनीतिक पार्टियां इसका फायदा उठाती हैं और अपनी ओर आकर्षित करने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटती हैं। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और सरकार को इस दिशा में एकीकृत होकर काम करने की जरूरत है। तभी मुफ्त की रेवड़ियों पर अंकुश लग पाएगा। वरना सरकारें वोट के लिए इसी तरह खजाना उड़ाती रहेंगी और उसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

बिजली लिस्ट में सबसे पहले

मुफ्त सामान की लिस्ट में बिजली पहले नंबर पर आती है। हाल फिलहाल में कई राज्यों में बिजली कटौती बढ़ गई थी। इसके पीछे एक बड़ा कारण था राज्यों पर बिजली उत्पादन और वितरण कंपनियों का बकाया पैसा। जब राजनीतिक पार्टियां मुफ्त बिजली का वादा करती हैं तो उसका सीधा मतलब है मुफ्त में कुछ यूनिट बिजली मिलना। ज्यादातर लोग ऐसे वादों से खुश हो जाते हैं और उस नेता के फैन हो जाते हैं जो मुफ्त में बिजली देने की घोषणा करता है। हालांकि जमीनी हकीकत ये है कि राज्य सरकारों पर इस तरह की घोषणा का उल्टा असर पड़ता है। मुफ्त बिजली का मतलब है राज्य सरकारों को बिजली वितरण कंपनियों को ज्यादा पैसा चुकाना होगा। ये वो पैसा होता है, जिसे सरकार को अपने खजाने से देना होता है। राज्य इस बढ़े खर्च को चुका पाने में नाकाम हो जाते हैं, जिससे बिजली वितरण कंपनियों का राज्यों पर बकाया बढ़ जाता है। इस पैसे को चुकाने के लिए राज्य सरकारें, केंद्र से और ज्यादा कर्ज लेती हैं। ये खतरनाक साइकिल लगातार चलती रहती है, और बिजली संकट बढ़ता रहता है। मुफ्त बिजली का वादा किसी राज्य पर कितना भारी पड़ रहा है, ये भी आपको जानना चाहिए। राज्यों पर बिजली वितरण कंपनियों का बकाया 1 लाख 39 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है। ये एक बड़ी रकम है और ये बताती है मुफ्त बिजली का वादा कितना खोखला है। अब आप सोचिए कि अगर किसी राज्य के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां फ्री बिजली की घोषणा कर देती हैं, जबकि उस राज्य का बिजली वितरण कंपनियों का करोड़ों रुपए का बकाया है तो इसका नतीजा क्या होगा। कोरोनाकाल में सभी राज्यों पर आर्थिक बोझ पड़ा, सबका बजट बिगड़ा, अब रिकवरी भी हो रही है। जरा सोचिए कि ऐसे हालात में अगर मुफ्त सामान देने के वादे किए जाएंगे तो उसका राज्यों की आर्थिक सेहत पर कितना बुरा असर होगा।

दक्षिण भारत से शुरू होकर पूरे देश में फैला रेवड़ी कल्चर

देश के दक्षिण राज्यों खासकर तमिलनाडु में सबसे पहले मुफ्त बांटने की सियासत शुरू हुई। यहां चुनाव जीतने के लिए मंगलसूत्र, टीवी, प्रेशर कुकर और साड़ी फ्री में बांटी जाने लगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के कार्यकाल में अम्मा कैंटीन खूब फली-फूली। दक्षिण भारत के बाद अब यह उत्तर भारत के साथ-साथ पूरे देश में वोट पाने का एक शॉर्टकट जरिया बन चुका है। वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों ने मुफ्त बिजली-पानी, अनाज, लैपटॉप, मोबाइल, स्कूटी और बेरोजगारी भत्ता को हथियार बनाया। इसका नतीजा ये हुआ कि आज कई राज्यों की अर्थव्यवस्था कर्ज के बोझ तले दबने लगी है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भी रेवड़ी कल्चर से देश को होने वाले नुकसान को लेकर आगाह कर चुका है। उधर कैग के डेटा के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी पर राज्य सरकारों के खर्च में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जिससे कर्ज बढ़ता जा रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में सब्सिडी पर राज्यों ने कुल खर्च का 11.2 प्रतिशत खर्च किया था। जो 2021-22 में बढ़कर 12.9 प्रतिशत हो गया। सब्सिडी पर सबसे ज्यादा खर्च उप्र, ओडिशा, झारखंड, केरल और तेलंगाना ने किया। वहीं पंजाब, गुजरात और छत्तीसगढ़ सरकार ने सब्सिडी पर अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर का 10 प्रतिशत से ज्यादा खर्च किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त दे रहीं हैं। जिससे फ्री पानी, फ्री बिजली, बिल माफी और कर्जमाफी से सरकारों को कोई कमाई नहीं हो रही है। उल्टे सरकार को इस पर खर्च करना पड़ रहा है।

अमीरों को सबसे अधिक मिलती हैं मुफ्त की रेवड़ियां

देश में इन दिनों आम जनता को दी जाने वाली मुफ्त की रेवडियां चर्चा में हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अमीरों यानी औद्योगिक घरानों को मिलने वाली रेवड़ियों की किसी को चिंता नहीं है। भारत की 20 बड़ी कंपनियों के पास भारत की अर्थव्यवस्था में होने वाले कुल मुनाफे का 70 फीसदी हिस्सा है। साल 1990 में मुनाफे में हिस्सेदारी का यह आंकड़ा महज 14 फीसदी हुआ करता था। यानी 1990 के बाद बड़ी कंपनियों ने संसाधन के हिसाब से उनका हक खूब मारा है, जिनकी संसाधनों तक पहुंच हमेशा से कम ही रही है। इन सबका मतलब यही है कि देश में बड़ी परेशानी मुफ्त में रेवड़ियां बांटना नहीं है, बल्कि बड़ी परेशानी यह है कि आर्थिक नीतियां ऐसी हैं कि संसाधनों का बंटवारा समतामूलक नहीं है। साल 2019 में सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की। कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दी गई थी। जबकि यहां पर भयंकर कमाई होती है। यहां से सरकार को ज्यादा टैक्स वसूलना चाहिए। क्या इस छूट को सरकार द्वारा कॉर्पोरेट को दी जाने वाली रेवड़ी कही जाएगी या नहीं? 2014-15 और 2020-21 के बीच मोदी सरकार ने कॉरपोरेट करदाताओं को 6.15 लाख करोड़ रुपए की विभिन्न छूट, रियायतें और छूट दी। इसे कर प्रोत्साहन कहा जाता है। इसी तरह बैंकों द्वारा कॉर्पोरेट सेक्टर को दिए गए 10.72 लाख करोड़ रुपए के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया गया है। एक मिसाल और लीजिए, बुजुर्गों के रेल टिकट पर उन्हें छूट मिलती थी। सरकार को इस छूट की वजह से 1500 करोड़ के आसपास नहीं मिलता था। सरकार ने इस छूट को बंद कर दिया है। जबकि कोविड महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया का कामकाज बंद था तब सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक बीएसई (जिसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के नाम से जाना जाता है) में सूचीबद्ध कंपनियों ने 2021-22 में 9.3 लाख करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया। यह पिछले वर्ष की तुलना में 70 प्रतिशत ज्यादा था। महामारी से पहले यानी 2010-11 और 2019-20 के बीच हर साल के औसत मुनाफे से तकरीबन तीन गुना ज्यादा था। सोचिये इतना मुनाफा इन्होंने कैसे कमाया? क्या सरकारी नीतियों के जरिये रेवड़ियां बांटे बिना यह संभव है? अगर सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर पर ढंग से नियंत्रित करती तो उसे 1500 करोड़ रुपए से कई गुना राजस्व इकट्ठा होता।

रेवड़ी कल्चर के साइड इफेक्ट

रेवड़ी कल्चर से जहां राज्यों की आर्थिक सेहत पर बुरा असर हो रहा है। तो वहीं दूसरे स्तर पर भी साइड इफेक्ट्स देखने को मिल रहे हैं। पंजाब में साल 1971 में सिर्फ 1,92,000 ट्यूबवेल थे। लेकिन बिजली बिल में माफी और सब्सिडी मिलने से इसकी संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। आज यहां ट्यूबवेल की संख्या 14.1 लाख तक पहुंच गई है। इससे भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। आलम यह है कि अधिक दोहन के चलते भूजल 20 से 30 मीटर नीचे चला गया है। जिससे पंजाब बहुत बड़े जलसंकट की ओर बढ़ रहा है। आरबीआई के मुताबिक सभी राज्य सरकारों पर मार्च 2021 तक करीब 69.47 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है। फिलहाल तमिलनाडु पर 6.59 लाख करोड़, उप्र पर 6.53 लाख करोड़, महाराष्ट्र पर 6.08 लाख करोड़, पश्चिम बंगाल पर 5.62 लाख करोड़, राजस्थान पर 4.77 लाख करोड़, गुजरात पर 4.02 लाख करोड़ और आंध्र प्रदेश पर 3.98 लाख करोड़ का कर्ज है। पंजाब और राजस्थान में चुनावी साल में सियासी दलों की ओर से जमकर रेवड़ियां बांटी गईं। जिससे दोनों ही राज्य आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़े हो गए हैं।

- राजेंद्र आगाल

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