21-Jul-2020 12:00 AM
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सबका अपना एक मौसम होता है। बिना मौसम के कुछ भी अच्छा नहीं लगता। आज पर्यावरण दिवस से पर्यावरण मित्रों का भी मौसम शुरू हो गया है। बाकायदा हवन में खुशबूदार समिधा की गिनी हुई आहुतियां देने के बाद श्रीगणेश हो गया। वैसे साल भर गाहे-ब-गाहे कार्यक्रम चलते रहते हैं। लेकिन जैसे ही पांच जून का आगमन होता है, पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ इस मौसम का उद्घाटन हो जाता है। सबसे पहले कवि, शायर, बुद्धिजीवी और विचारकों के माध्यम से पर्यावरण पर कविताएं, शायरी और बड़े-बड़े लेख प्रकाशित किए जाते हैं। स्वयं को छोड़कर दूसरों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे अधिक से अधिक पौधरोपण करें, ताकि वर्षा अधिक हो। धरती की प्यास बुझे। ज्यादा अन्न, फल, सब्जी, दुग्ध का उत्पादन हो। क्या अखबार, क्या टीवी, क्या सोशल मीडिया सब पर मानो बाढ़ ही आ जाती है। सोए हुए भी खड़े हो जाते हैं। जिनकी अस्थियां जकड़ गई हैं, उनमें भी नए-नए कल्ले प्रस्फुटित होने लगते हैं।
फिर क्या! कार्यक्रमों पर कार्यक्रम चलने लगते हैं। गड्ढे खोदने वाले गड्ढे खोदते हैं। पौधे लाने वाले पौधे लाते हैं और माननीय महोदय अपने सफेद चमचमाते सूट में एक पौधा ऐसे पकड़ते हैं कि हाथ से मिट्टी न छू जाए। वे झुक कर उस पौधे को उठाने का कष्ट भी नहीं करते, क्योंकि उनकी कमर को बल खाने का खतरा है। जिसे वे किसी भी कीमत पर नहीं उठाना चाहते। इसलिए पहले से ही तैनात एक स्फूर्तिवान युवक चटपट उनके कर कमलों में पॉलीथिन आवृत पौधे को थमा देता है। उन्हें तो इसकी पॉलीथिन को हटाने का कष्ट गवारा नहीं होता, इसलिए इशारा होता है कि इसकी पॉलीथिन हटाई जाए। तुरंत पॉलीथिन हटाई जाती है। इसके बाद मोबाइलों और कैमरों की फ्लैश पर फ्लैश चमकने लगती हैं। माननीय मुस्कराते हुए फोटो खिंचवाते हैं। पौधा तो एक ही लगता है, पर पोज बदल-बदल कर अनगिनत फोटो की एलबम तैयार हो जाती है। तब कहीं जाकर एक पौधा लगाने के लिए वे गड्ढे की ओर झुकते हैं। यद्यपि झुकना तो उन्होंने कभी सीखा ही नहीं, लेकिन यहां उन्हें विवश होकर झुकना ही पड़ता है। देते समय देने वाले का झुकना प्राकृतिक ही है। जब तक आप किसी को कुछ देते हैं, तो झुकना ही पड़ेगा। एक नन्हा सा पौधा माननीय को आखिर झुका ही लेता है। तने हुए खड़े रहने पर आप किसी को कुछ दे नहीं सकते और लेने वाला ले नहीं सकता, क्योंकि लेने की प्रक्रिया में झुकना एक अनिवार्य कृत्य है। लेने वाले के हाथ सदैव नीचे ही रहते हैं। यहां पर जो देने वाला दिखता है, वह मांगने वाला है। उसे यश चाहिए एक पौधा लगाकर, खुशी चाहिए एक पौधा लगाकर, सराहना चाहिए एक नवांकुर सजाकर।
सबको देने वाली धरती को कोई क्या देगा? वह तो जननी है। जीवन, अन्न, जल, फल, दुग्ध, ईंधन, वसन, घर, सोना, चांदी, धन धान्य सब कुछ वही तो देती है। और मूढ़ समझता है कि वह एक पेड़ रोपकर धरती को दे रहा है। भिखारी अपने को दाता मान बैठा है।
तो माननीयजी पौधा लगा रहे थे। उन्होंने पौधे को पूर्वनिर्मित गड्ढे में रख दिया है। पुन: फोटोबाजी और वीडियोबाजी की होड़ लग गई है। वे कैमरे की ओर मुंह उठाए हुए दंत दर्शन कराते हुए से फोटो खिंचवा रहे हैं। पौधे के तने को हाथ से स्पर्श किया हुआ है। बस इतने जागरूक अवश्य हैं कि कहीं हाथों से मिट्टी न छू जाए! फोटो बराबर खिंच रहे हैं। और चेला गण गड्ढे में मिट्टी डाल रहे हैं। माननीय कमर पर हाथ टेककर उठकर खड़े हो रहे हैं। पौधारोपण का कार्य 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है। उधर देखें वह एक चेला बाल्टी में पानी लेकर हाथ में मग थामे हुए तेज कदमों से चला आ रहा है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इसका क्या होना है। इतना तो तय है कि पहले माननीय के हाथ धुलवाए जाएंगे। उन्हें नहलाया नहीं जाएगा। यदि बच गया तो पौधे के हवाले कर दिया जाएगा। लो जी, हो गया पौधारोपण: एक राष्ट्रीय कार्यक्रम।
अगले दिन अखबार में मुस्कराते हुए माननीय के साथ एक लंबा चौड़ा समाचार छापा गया कि उनके द्वारा 501 पौधे लगाए गए। साथ में किसी बुद्धिजीवी द्वारा लिखा गया भाषण भी सुर्खियां बटोर रहा था। यदि देश में सभी माननीयों के द्वारा पौधे लगाने की यही गति रही तो वह दिन दूर नहीं जब देश का हर गांव, खेत, शहर, ऊसर, बंजर, वन, उपवन सब जगह पेड़ों के झुरमुट होंगे। हरित क्रांति ही हो जाएगी। सारा प्रदूषण दूर होगा। नदियां कलकल निनाद से सागर की ओर अवगाहन करेंगीं। खूब वर्षा होगी। आंकड़े सच साबित होंगे। फिर ऊपर से नीचे तक सबके आंकड़ों में कोई भेद नहीं होगा। जो ऊपर वाला कहेगा, उसे ही नीचे वाला भी दोहराएगा। सर्वत्र समानता का बोलबाला होगा। एक सच्ची हरित क्रांति होगी। हरित का अर्थ चोरी की हुई नहीं, हरी-हरी क्रांति।
देश के कर्णधारों के कर कमलों से कृत पर्यावरण मित्र बनाने और उसे अंगीकृत कराने करने का काम एक अनिवार्य महत्वाकांक्षी आयोजन है। जो जेठ-जून की पांच तारीख से आगाज करते हुए शरद के शुभारंभ तक चलता है। यह माननीयों का वसंत है। वे संत और इधर ये वसंत। वैसे होता है यह अनन्त। परन्तु इसका भी है कुछ किन्तु परंतु। पावस की बहार। धरती को उपहार।
- डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम’