मौके पर चौका
17-Mar-2021 12:00 AM 3800

 

मौके को परख कर जो चाल चले वह सफल राजनेता बनता है। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। किस मौके पर कौन सा कदम उठाना है वे बेहतर जानते हैं। इसलिए उनके दांव कारगर होते हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का घमासान चरम पर है। भाजपा और टीएमसी के लिए मैदानी और जुबानी जंग चरम पर है। भाजपा राज्य में भगवा फहराने के लिए टीएमसी में लगातार तोड़-फोड़ कर रही है। 8 मार्च को 5 और टीएमसी विधायक भाजपा में शामिल हुए। इसके बावजूद टीएमसी का दावा है कि वह प्रदेश में सबसे अधिक सीटें जीतकर सरकार बनाएगी। जबकि भाजपा 200 सीटों का टारगेट लेकर काम कर रही है। भाजपा की ओर से अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मोर्चा संभााल लिया है। 7 मार्च को कोलकाता के ब्रिगेड परेश मैदान पर प्रधानमंत्री ने रैली को संबोंधित करते हुए बंगाल की परंपरा, संस्कृति की जमकर तारीफ की। कोलकाता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि बंगाल में परिवर्तन के लिए लोगों ने ममता दीदी पर भरोसा किया था। लेकिन दीदी ने ये भरोसा तोड़ दिया। इन लोगों ने बंगाल का विश्वास तोड़ा। इन लोगों ने बंगाल को अपमानित किया। यहां की बहन-बेटियों पर अत्याचार किया लेकिन ये लोग बंगाल की उम्मीद कभी नहीं तोड़ पाए। उधर उसी दिन ममता बनर्जी ने सिलीगुड़ी में रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ पैदल मार्च निकालकर मोदी सरकार को करारा जवाब दिया।

दरअसल, भाजपा की कोशिश है कि वह किसी भी तरह बंगाल में अपनी सरकार बनाए। इसके लिए भाजपा वह हर काम कर रही है जिससे प्रदेश का हिंदू मतदाता ममता बनर्जी से कट जाए। पश्चिम बंगाल में भाजपा हिंदुत्व के आधार पर हिंदू ध्रुवीकरण का दांव चलकर तृणमूल कांग्रेस के किले को फतह करना चाहती है। इसके लिए पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विकास, सुशासन और हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उतारने की योजना बना रही है। इसके जवाब में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नेता और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हिंदी प्रेम का प्रचार करना शुरू कर दिया है। यह इसलिए कि राज्य में हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों की एक बड़ी तादाद है, और भाजपा का सबसे बड़ा फोकस इस समूह को एकमुश्त अपने साथ जोड़ना है। मोदी के हिंदुत्व के जवाब में ममता का हिंदी कार्ड कितना कामयाब होगा इसका पता विधानसभा चुनावों के नतीजों से ही चलेगा।

भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए बंगाली अस्मिता के साथ-साथ ममता के रणनीतिकारों ने उत्तर भारतीय हिंदी भाषियों के बीच हिंदी कार्ड का दांव भी चला है। ममता बनर्जी की कविताओं के संग्रह 'मां माटी मानुषÓ का हिंदी अनुवाद इन दिनों उत्तर भारतीयों के बीच बंट रहा है। ममता बनर्जी ने इस पुस्तक को हिंदी भाषियों को समर्पित करते हुए इसके प्रारंभ में लिखा है समर्पित मेरे हिंदी भाषी भाई-बहनों को। कवि की कलम के शीर्षक से लिखी किताब की भूमिका की शुरुआत करते हुए ममता लिखती हैं कि कई भाषाओं की जन्मभूमि भारतवर्ष से जितना मुझे प्रेम है उतना ही प्रेम है इस पुण्यभूमि की सारी भाषाओं से भी। इन भाषाओं में हिंदी मुझे विशेष प्रिय है। संसदीय राजनीति में मेरे कदम रखने के वर्षों पहले ही इस भाषा का मेरा परिचय और संबंध दोनों स्थापित हो चुका था। केवल किसी विशेष प्रयोजन से यह भाषा सीखने के लिए मैं बाध्य नहीं हुई बल्कि बिना किसी प्रयोजन के विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह से यह भाषा मेरे काम आई, इसी कारण ये भाषा मेरी प्रिय भाषा बन गई।

इस तरह ममता बनर्जी अपने हिंदी प्रेम के जरिए पश्चिम बंगाल के हिंदी भाषी उत्तर भारतीयों के बीच अपनी पैठ बना रही हैं। इस पर तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता और पूर्व सांसद विवेक गुप्ता कहते हैं कि यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है बल्कि हिंदी और हिंदी भाषियों के प्रति दीदी का लगाव भी बहुत पुराना है। गुप्ता बताते हैं कि बंगाल में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना और छठ पर्व पर राज्य में दो दिन की सरकारी छुट्टी इसका एक उदाहरण है।

इसी साल अप्रैल में संभावित पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह, प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय समेत भाजपा के सभी शीर्ष नेता इन दिनों सबसे ज्यादा ध्यान पश्चिम बंगाल पर ही दे रहे हैं। लोकसभा चुनावों में जिस तरह राज्य की कुल 42 में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने न सिर्फ सबको चौंकाया बल्कि ममता बनर्जी के किले को भी हिला दिया, उससे राज्य में भाजपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल आसमान पर है। उसके बाद से ही एक-एक करके कई तृणमूल नेता पाला बदलकर भाजपा की छतरी के नीचे जा रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के नेता और ममता बनर्जी के करीबी लोग यह दावा कर रहे हैं कि भाजपा कुछ भी कर ले, ममता दीदी अपनी सरकार की हैट्रिक लगाने जा रही हैं।

ममता के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने तो भाजपा को दहाई संख्या से ज्यादा पार करने की खुली चुनौती देते हुए यहां तक कह दिया कि अगर भाजपा विधानसभा चुनावों में दहाई का आंकड़े से ज्यादा सीटें जीत जाए यानी 99 से ज्यादा सीटें जीत ले तो वह चुनाव रणनीतिकार का अपना काम छोड़ देंगे। उनकी इस चुनौती के दो मायने हैं। पहला ये कि प्रशांत किशोर को पूरा आत्मविश्वास है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी और तृणमूल कांग्रेस फिर अपनी सरकार बनाएगी भले ही उसकी सीटें पिछली बार से कुछ कम रह जाएं। साथ ही, इसके दूसरे मायने ये भी हैं कि पिछले चुनाव में महज 5 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार भले ही सरकार न बना पाए लेकिन अगर 100 से कुछ कम सीटें भी जीत लेती है, तो वह तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी। इससे एक बात तो साबित है कि ममता बनर्जी के रणनीतिकार भी मानते हैं कि भाजपा की चुनौती को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

तृणमूल के ही एक अन्य नेता ने अनौपचारिक बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर माना कि भले ही इस बार भी तृणमूल कांग्रेस की सरकार राज्य में बन जाएगी, लेकिन भाजपा भी 75 से 100 के बीच सीटें अगर जीतती है तो अगली सरकार का सहजता से काम करना मुमकिन नहीं होगा। इस तृणमूल नेता के मुताबिक जो भाजपा अभी पैसे और भय के बल पर तृणमूल कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं को तोड़कर ममता सरकार को परेशान करने और असहज करने की कोशिश लगातार कर रही है, अगर चुनाव बाद विधानसभा में उसकी तादाद सैकड़े के आसपास पहुंच गई तो अपने धन और केंद्रीय सत्ता के बल पर भाजपा ममता सरकार को अस्थिर करने की पूरी कोशिश करेगी।

इस तृणमूल नेता के मुताबिक अगर भाजपा 100 के आसपास सीटें जीत जाती है तो फिर कर्नाटक और मप्र मॉडल पर पश्चिम बंगाल में कुछ भी हो सकता है। इसलिए इस बार भी पश्चिम बंगाल की जनता को यह तय करना है कि अगर उसे राज्य की अस्मिता और हित में ममता बनर्जी की मजबूत सरकार चाहिए तो वह तृणमूल कांग्रेस को पिछली बार की ही तरह सवा दो सौ सीटों से ज्यादा का बहुमत दे।

भाजपा ने 2014 के बाद से ही ममता बनर्जी के खिलाफ पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व के मुद्दे को गरम करके हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू कर रखी है। यहां तक कि ममता बनर्जी को मुस्लिम परस्त साबित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई है। अपने प्रचार तंत्र के जरिए भाजपा ने लगातार ममता के खिलाफ हिंदू विरोधी होने का माहौल लगातार बनाया है। दुर्गा पूजा के बाद मूर्ति विसर्जन का मुद्दा हो या ममता को चिढ़ाने के लिए लगातार उनके सामने जय श्रीराम का नारा अपने कार्यकर्ताओं से लगवाना और फिर उसे मीडिया में मुद्दा बनाकर ममता को घेरना, भाजपा हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।

इसके साथ ही भाजपा ने ममता के खिलाफ अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का मुद्दा भी गरम किया है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर कथित रूप से ममता समर्थकों के हमले को भी भाजपा ने बेहद धारदार मुद्दा बनाया है। हिंदुत्व के जरिए भाजपा सबसे ज्यादा उन उत्तर भारतीयों को अपने साथ लेना चाहती है जो उसे अपनी पार्टी मानते हैं और जिन्हें अयोध्या के राम मंदिर और जय श्रीराम का नारा बेहद आत्मीय लगता है। लेकिन महज उनसे बात नहीं बनेगी और बंगाल में देवी की पूजा घर-घर होती है, इसलिए दुर्गा पूजा के अवसर पर मूर्ति विसर्जन की राजनीति उसे आम बंगाली को हिंदुत्व के छाते के नीचे लाने के लिए जरूरी लगती है। जबकि सुशासन और कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाकर भाजपा चाहती है कि विकास और सुशासन के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस और ममता सरकार को घेर सके। वहीं एक सधी हुई रणनीति के तहत किश्तों में तृणमूल मंत्रियों, विधायकों एवं अन्य नेताओं को भाजपा में पाला बदल करवाकर भाजपा राज्य के भीतर-बाहर ममता खेमें में भगदड़ का माहौल भी बना रही है।

भाजपा के इन सारे तीरों की काट के लिए ममता बनर्जी ने भी अपने तरकश से बाण चलाने शुरू कर दिए हैं। भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए उन्होंने बेहद आक्रामक तरीके से बंगाली अस्मिता का दांव चल दिया है। तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि आजादी के बाद से ही पश्चिम बंगाल की जनता ने राष्ट्रीय दलों की और उनके नेताओं की तुलना में बंगाल के नेतृत्व को ही चुना है। कांग्रेस के जमाने में विधान चंद्र राय, फिर वाम मोर्चे के ज्योति बसु और अब ममता बनर्जी इसके उदाहरण हैं। करीब 34 सालों तक पहले ज्योति बसु और फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में माकपा नेतृत्व वाली वाम मोर्चे की सरकार रही और पिछले दस साल से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की सरकार है। भाजपा बहुत कोशिश के बावजूद अभी तक ममता से बड़ा क्या उनके बराबर का भी कोई बंगाली नेतृत्व विकसित नहीं कर पाई है। इसलिए ममता बनर्जी ने न सिर्फ बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे को गरम किया है बल्कि अब वह बंगाली अस्मिता से जुड़े हर मुद्दे को उठा रही हैं।

मुख्यमंत्री के चेहरे का ऐलान करने से डरी भाजपा

एक तरफ भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वह मुख्यमंत्री के चेहरे का ऐलान करने से डरी हुई है। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन का कहना है कि भाजपा अगर मुख्यमंत्री के चेहरे का ऐलान करेगी तो भगदड़ मच जाएगी। भाजपा पार्टी में असंतोष बढ़ने से डरती है। वह कहते हैं कि 'मैं अमित शाह और मोदी को चुनौती देना चाहता हूं कि वे मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करें। वे ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि यदि आप ए को घोषित करते हैं तो बी, सी, डी नाराज हो जाएंगे। यदि आप सी कहते हैं तो ए, बी और डी नाराज हो जाएंगे। वह कहते हैं कि चुनाव बाद भाजपा में बड़ी टूट देखने को मिलेगी। क्योंकि भाजपा नेता सत्ता का ख्वाब दिखाकर दूसरी पार्टियों में सेंध लगा रहे हैं।

ममता और शुभेंदु के लिए नाक का सवाल है नंदीग्राम

कहा जाता है कि 35 साल तक वाम दलों का अजेय किला रहे पश्चिम बंगाल को ममता बनर्जी ने नंदीग्राम के सहारे ही ढहाया था। पश्चिम बंगाल के उस चुनावी संग्राम में ममता के सारथी शुभेंदु अधिकारी थे। महाभारत के कृष्ण की तरह शुभेंदु अधिकारी ने वाम दलों के खिलाफ अर्जुन बनी ममता की राह में आने वाले हर रोड़े को हटाया। साथ ही उन्हें पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज भी कराया। अब पश्चिम बंगाल के सियासी रण में योद्धाओं के नाम सामने आने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने एक साथ 291 उम्मीदवारों की सूची जारी करते हुए साफ कर दिया है कि वह केवल नंदीग्राम विधानसभा सीट से ही चुनाव लड़ेंगी। भाजपा ने भी पहले और दूसरे चरण के लिए 57 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा करते हुए नंदीग्राम विधानसभा सीट से शुभेंदु अधिकारी के नाम पर मुहर लगाई है। इस स्थिति में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि नंदीग्राम की सीट पश्चिम बंगाल के सियासी रण का कुरुक्षेत्र बन गई है। नंदीग्राम ने ही ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचाया था। इस वजह से यह उनके लिए काफी भाग्यशाली रहा है। लेकिन, नंदीग्राम के जरिए ममता को सत्ता दिलाने में शुभेंदु अधिकारी की अहम भूमिका थी। 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों में अधिकारी परिवार ने बड़ी भूमिका निभाई थी। इस अधिग्रहण के खिलाफ बनी भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी में शुभेंदु अधिकारी का किरदार अहम था।

 - दिल्ली से रेणु आगाल

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