18-Feb-2020 12:00 AM
4364
देश में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं ने महिला सुरक्षा के सवाल की उपेक्षा को एक बार फिर उग्र आंदोलन का रूप दे दिया है। ऐसा लगता है कि अब इस तरह की घटनाएं हमें विचलित नहीं करतीं, अपितु ये सामान्य-सी घटना लगने लगती हैं। कभी चार महीने की बच्ची के साथ तो कभी सत्तर साल की बुजुर्ग के साथ इन घटनाओं की पुनरावृत्ति हमारे सभ्य समाज के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। हैदराबाद में एक महिला चिकित्सक के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना ने देश को हिला कर रख दिया। पुलिस ने समय पर शिकायत दर्ज नहीं की, महिला को न्याय दिलाने के लिए लोग सोशल मीडिया पर अभियान छिड़ा, नेताओं-मंत्रियों ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे, हमारी संवेदनाएं पीडि़ता के परिवार के साथ हैं, नागरिक समाज देश के विभिन्न हिस्सों में कैंडल मार्च करता है, और फिर इस मामले के आरोपियों को पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया। लेकिन सवाल है इससे क्या पीडि़ता को न्याय मिला? क्या ऐसा करने से बलात्कार की घटनाओं को रोका जा सकता है?
किसी भी देश में पुलिस मुठभेड़ को वैधता प्रदान नहीं की जा सकती, क्योंकि अगर जनता की चेतना में मुठभेड़ की वैधता को स्थापित होने का मौका मिल रहा है तो यह समग्र देश के लिए और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। कहा जाता है कि न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी इसलिए बंधी है, ताकि सबके साथ समान न्याय हो सके, किसी के भी साथ लैंगिक, जाति, वर्ग, भाषा, राजनीति या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव न हो सके। फिर यह भेदभाव क्यों? न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी संभवत: शक्तिशाली लोगों ने ही बांधी है, ताकि न्याय की समूची प्रक्रिया अन्याय को देख न सके। निर्भया, कठुआ और उन्नाव कांड क्या कम दर्दनाक थे कि संभल (उत्तर प्रदेश) में एक किशोरी को उसके पड़ोसी ने बलात्कार के बाद जिंदा जला दिया। राजधानी दिल्ली में चाय की दुकान चलाने वाली पचपन साल की महिला से बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई, रांची में कानून की छात्रा का अपहरण कर सामूहिक बलात्कार किया गया और राजस्थान में एक महिला को पति ने पहले तलाक दिया और उसके बाद ससुर समेत सभी रिश्तेदारों ने उसके साथ मुंह काला किया, यह कहते हुए कि अब वह उनके परिवार की बहू नहीं है। सुना था मनुष्य पहले एक जानवर था, लेकिन इस तरह की वीभत्स घटनाएं बता रही हैं कि मनुष्य आज भी एक जानवर ही है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर पंद्रह मिनट में एक लड़की या महिला बलात्कार का शिकार हो जाती है। हाल में एक तमिल फिल्म निर्देशक ने यह कह डाला कि महिलाओं के विरुद्ध जो अपराध हो रहे हैं, उनके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं, वे ऐसी स्थिति बनाती हैं कि घटना घटे। अगर वे सही तरह से व्यवहार करें तो सब ठीक रहेगा। उनका कहना है कि पहले महिलाओं पर बंदिशें थीं जो मोबाइल के आने के बाद खत्म हो गई। उन्होंने महिलाओं पर लगने वाली बंदिशों को सही ठहराया। जिस देश में ऐसी सोच रखने वाले लोग हों उस देश में संभवत: ऐसी घटनाएं चौंकाती नहीं हैं। खेत से लेकर घर, बाजार, दफ्तर, क्लब, स्कूल, कॉलेज, सड़क, बस, ट्रेन, कैब और शौचालय शायद ही कोई जगह ऐसी बची हो, जहां महिला सुरक्षित अनुभव करती हों। यह हमारे समाज की भयावह तस्वीर है।
अब तक की ज्यादातर घटनाओं से यही तथ्य सामने आते हैं कि कानून की लचर व्यवस्था और पुलिस प्रणाली इस तरह के मामलों में संवेदनहीनता का परिचय देती रही है। पीडि़ता के परिवारीजनों को एक थाने से दूसरे थाने तक चक्कर लगवाना, लड़कियों को ही दोषी ठहराना, ज्यादातर मामलों में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज न करना पुलिस के अमानवीय व्यवहार का ही परिचायक है। फिर जो मामले थानों और अदालतों तक पहुंचते भी हैं, वे कानूनी पेचीदगियों का शिकार हो जाते हैं। निर्भया का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। क्या इसे तात्कालिक न्याय कहा जा सकता है। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों को सरकार और कानून के रखवाले इतने हलके में कैसे ले सकते हैं, यह गंभीर सवाल है।
मानसिकता बदलने की जरूरत
आश्चर्य तो तब होता है जब पुरुष समाज यह कहता है कि लड़कियों को रात को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए या उन्हें आधुनिक शैली के कपड़े नहीं पहनने चाहिए, उन्हें मोबाइल नहीं देना चाहिए। उनसे पूछिए जरा कि घर के अंदर भी लड़कियां कहां सुरक्षित हैं? न पिता से, न भाई से, न दादा से, न मामा से, किसी के साथ भी तो सुरक्षित नहीं है। क्या परंपरागत परिधान पहनने वाली महिलाओं या लड़कियों का बलात्कार नहीं हुआ, क्या मोबाइल का प्रयोग नहीं करने वाली लड़कियों के साथ हिंसा नहीं होती? इस तरह के कथन या विचार पुरुष समाज की विकृत मानसिकता के द्योतक हैं। संविधान में पुरुष और महिला को समानता का दर्जा दिया गया है, समान अधिकार दिए गए हैं, यहां तक कि यह भी लिखा है कि कानून की नजर में सब समान हैं। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर क्यों बलात्कार के मामले, घरेलू हिंसा के मामले सालों लंबित रहते हैं और आरोपी खुले घूमते रहते हैं। यही वह वजह है कि अपराधियों में कानून का कोई भय नहीं होता क्योंकि वे जानते हैं कि कानून केवल कागजी हैं। ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं जहां तेजाब फेंकने, दहेज हत्या या बलात्कार के मामले में पीडि़ता के परिवारजनों को अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते सालों बीत गए, पर इंसाफ नहीं मिला।
- ज्योत्सना अनूप यादव