महाराजा की घर वापसी
07-Jan-2021 12:00 AM 3587

 

आजादी के तुरंत बाद 1948 में भारत के अग्रणी उद्यमी समूह टाटा ने एक एयरलाइंस की शुरुआत की थी, नाम था एयरइंडिया इंटरनेशनल। हालांकि उसके पहले 1932 में उसने टाटा एयरलाइंस की स्थापना की थी और जेआरडी टाटा ने इसकी पहली उड़ान खुद भरी और यह सफलता के आकाश में उड़ने लगी। लेकिन पंडित नेहरू की नजर इस पर थी और 1953 में इसका पूर्ण राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, हालांकि जेआरडी टाटा इसके चेयरमैन 1977 तक बने रहे। ऐसा नहीं है कि एयर इंडिया ने सरकार के हाथों में जाने के बाद तरक्की नहीं की, यह दुनिया के आकाश में छा गई। दुनिया के हर महत्वपूर्ण देश में इसकी उड़ानें जाने लगीं और इसका विस्तार होता रहा। और एक समय आया कि यह घाटे में चलने लगी। विशालकाय स्टाफ, नौकरशाही और भ्रष्ट राजनेताओं ने मिलकर इसकी आर्थिक स्थिति बिगाड़ दी। 2018 आते-आते यह हर दिन 20 से 26 करोड़ रुपए का घाटा देने लगी। 2018-19 में कुल घाटा 8,556 करोड़ रुपए का था और उस पर 80,000 करोड़ रुपए का कर्ज भी चढ़ गया। और तब से सरकार ने इसे बेचने की तमाम कोशिशें शुरू कर दीं।

यूपीए सरकार के एक मंत्री पर तो खुला आरोप है कि उन्होंने अपने आर्थिक हितों के लिए तमाम तरह की हेराफेरी करवाई। इसके लाभ वाले रूट की सीटों को अरब देशों की एयरलाइंस को औने-पौने दामों में दे दिया, कई विमान खरीदने के ऑर्डर दे दिए और अन्य तरह की गड़बड़ियां की। इससे इसका लाभ कम हुआ और घाटा बढ़ा। इसके अलावा एयर इंडिया में राजनीतिक आधार पर हमेशा नियुक्तियां होती रहती थीं, जिससे स्टाफ की संख्या बेशुमार हो गई। आज इस समय इसके पास 125 विमान हैं और 20 हजार से भी ज्यादा कर्मचारी। एक समय इसकी प्रति विमान स्टाफ संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा थी।

बहरहाल अब इसे खरीदने के इच्छुकों की तादाद कम है और टाटा समूह के अलावा अमेरिका की एक कंपनी तथा एक भारतीय निजी एयरलाइन ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है। कोरोना के कारण देश-विदेश के आर्थिक हालात ऐसे हैं कि इसे खरीदने में बहुत कम ही पार्टियां इच्छुक हैं। टाटा समूह के पास एयरलाइन का पर्याप्त अनुभव है। दरअसल जब टाटा समूह से एयर इंडिया छिना, तो उसके बाद से समूह ने हमेशा कोशिश की कि वह भारत के आकाश में अपना नाम फिर से लिखे। उदारीकरण के बाद जब बहुत-सी निजी एयरलाइनों ने भारत में अपने कदम रखे, तो टाटा ने भी अपनी एयरलाइंस शुरू करने की इच्छा जताई। लेकिन उस समय के नागरिक उड्डयन मंत्री ने यह कहा कि टाटा को इसलिए अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि वह विदेशी धन से निवेश कर रहा है।

टाटा ने भारत में अपनी एयरलाइंस शुरू करने के लिए दुनिया की सबसे बढ़िया एयरलाइनों में से एक सिंगापुर एयरलाइन से हाथ मिलाया था। टाटा समूह के प्रतिद्वंद्वियों ने एक भ्रष्ट राजनेता से मिलकर देशभक्ति की आड़ में उसका प्रस्ताव रद्द करवा दिया। लेकिन टाटा का प्रयास जारी रहा और बाद में समूह ने एयर एशिया और फिर सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर विस्तारा को जन्म दिया। ये दोनों विमान सेवाएं तमाम कठिनाइयों के बावजूद अब भी काम कर रही हैं। लेकिन अब समूह ने बड़े पैमाने पर इसमें कदम रखने का इरादा बनाया है और इसलिए उसने एयर इंडिया में दांव लगाने का फैसला किया है। एयर इंडिया भारत की दो सरकारी एयरलाइनों-इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के विलय से बनी है। घरेलू विमान सेवा इंडियन एयरलाइंस इस विलय के पहले घाटे में नहीं थी और उसका काम ठीक ही चल रहा था, लेकिन विलय के बाद उसका अस्तित्व खत्म हो गया। विलय के समय यह तर्क दिया गया था कि इससे एक मजबूत एयरलाइंस खड़ी होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और नई कंपनी का घाटा बढ़ता ही रहा। वह एक मूर्खतापूर्ण कदम था और क्यों उठाया गया, यह जानना मुश्किल है। आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे भी निहित स्वार्थी तत्व थे।

एयर इंडिया का घाटा भले ही बड़ा हो, लेकिन इसके पास परिसंपत्तियां काफी हैं, जो नए ऑपरेटर के काम आ सकती हैं। मुंबई के शानदार इलाके नरीमन प्वाइंट में इसका मुख्यालय आज भी बहुत शान से खड़ा है। इसके अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सों में इसके अपने दर्जनों ऑफिस हैं, जो इसका बहुत बड़ा आधार हैं। लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों के हवाई अड्डों पर उसके अपने स्लॉट हैं, जो उसका खर्च कम करते हैं और नए खरीदार को फायदा पहुंचाएंगे। इसके पास अनुभवी पायलट और अन्य कर्मी भी हैं और 100 से भी ज्यादा विमान हैं, जिनमें आधुनिकतम विमान ड्रीम लाइनर भी है। यह सही है कि इतनी बड़ी तादाद में कर्मचारियों को रखकर कोई भी एयरलाइंस चल नहीं सकती और इसमें सरकार को वीआरएस के जरिए कटौती करनी ही होगी। फिलहाल कुछ सौ कर्मियों ने इसके लिए आवेदन किया है। अब भी प्रति विमान कर्मियों की संख्या 100 के आसपास है, जो ज्यादा है।

टाटा समूह के पास अनुभव

सरकार ने खर्च कम करने के लिए कई कदम भी उठाए हैं, जिनमें न्यूयॉर्क, पेरिस, टोक्यो जैसे महंगे शहरों में किराए के ऑफिस बंद करना महत्वपूर्ण है। सरकार ने इसे कर्ज कम करके बेचने का विचार किया है, जो खरीदार को काफी सहारा देगा। साथ ही पहले की तरह 25 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास रखने का इरादा भी त्याग दिया है। यह एक ऐसी शर्त थी, जो किसी भी खरीदार को पसंद नहीं थी, क्योंकि उससे सरकारी हस्तक्षेप का खतरा हमेशा बना रहता। अब यह राजनेताओं और अड़ियल नौकरशाहों से दूर रहेगी। अब एयर इंडिया की बिक्री की शर्तें भी आसान हो गई हैं और खरीदार को बोली के मूल्य का कुल 15 प्रतिशत ही देना होगा, इससे खरीदार पर तुरंत बोझ नहीं पड़ेगा। टाटा समूह के पास न केवल एयरलाइंस चलाने का अनुभव है, बल्कि यह पूरी तरह से एक पेशेवर कंपनी है, जो कर्मचारियों के हितों को भी ध्यान में रखती है। एयर इंडिया आगे भी चले, इसके विमान उड़ते रहें, क्योंकि यह सिर्फ बिजनेस ही नहीं, सत्कार की हमारी एक परंपरा भी है और इसके साथ देश की प्रतिष्ठा भी जुड़ी हुई है। इस बिक्री पर जल्दी से जल्दी मुहर लगना जनता के हित में भी है, जिसके टैक्स के पैसे से यह चलती है।

-  राजेश बोरकर

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