21-Jul-2020 12:00 AM
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किसी भी सरकार का आईना होता है उसका मंत्रिमंडल। शिवराज मंत्रिमंडल का स्वरूप देखकर हर कोई कह सकता है कि यह चुनावी बिसात है। कांग्रेस इस मंत्रिमंडल को विडंबना, अवसरवाद और अंदरूनी खींचतान का पुतला मान रही है। वहीं भाजपा इसे संतुलित जमावट बता रही है। असल में मंत्रिमंडल विस्तार और विभागों का बंटवारा कुछ नए समीकरण और संदेश लेकर आया है। अब देखना यह है कि यह नया समीकरण क्या गुल खिलाता है।
मंथन पर मंथन और फिर महामंथन के बाद आखिरकार शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में एक ऐसी सरकार ने मोर्चा संभाल लिया है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह दो विचारधाराओं के संगम का अनूठा उदाहरण है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि प्रदेश के इतिहास में पहली बार एक ऐसी कैबिनेट का गठन हुआ है जिसके लगभग 42 फीसदी मंत्री पूर्व में कांग्रेसी विचारधारा के थे, और 58 फीसदी भाजपा के। प्रारंभिक तौर पर तो दोनों दूध और पानी की तरह मिल गए हैं। इस मिलन के कारण स्वाद थोड़ा फीका हुआ है, लेकिन रंग जैसा का तैसा है। इसकी वजह यह है कि इनका मकसद उपचुनाव में कांग्रेस को पूरी तरह धूल चटाना है। यानी कैबिनेट की इस जमावट (मंत्रिमंडल गठन और विभागों का बंटवारा) चुनावी है। इनका एक ही मकसद है कि 25 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में 100 फीसदी जीत हासिल की जाए। इसलिए 14 ऐसे लोगों को मंत्री बनाया गया है जो वर्तमान में विधायक नहीं हैं।
मंत्रिमंडल की पूरी गणित देखें तो कांग्रेस से आए 22 में से 14 यानी आधे से भी अधिक बाजी मार ले गए। वहीं भाजपा के 107 विधायकों में से केवल 19 ही मंत्री बन पाए। अगर प्रतिशत की दृष्टि से देखें तो कांग्रेस से आए 60 प्रतिशत विधायक मंत्री बने। वहीं भाजपा के 18 प्रतिशत विधायक ही मंत्री बने हैं। ऐसे में यह कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगा कि मध्यप्रदेश भाजपा में महाराज यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया का पूरा रुतबा जम चुका है। शिवराज मंत्रिमंडल के मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता पर नजर डालें तो 33 में से 7 मंत्री पांचवीं और बारहवीं पास हैं, जबकि 25 मंत्रियों की शैक्षिक योग्यता स्नातक और इससे ज्यादा हैं। दो मंत्रियों ने अपनी शैक्षिक योग्यता सिर्फ साक्षर घोषित की है। मंत्रिमंडल में शामिल इमरती देवी, प्रद्युम्न सिंह तोमर, भारत सिंह कुशवाह और महेंद्र सिंह सिसोदिया 12वीं पास हैं। बृजेंद्र सिंह यादव पांचवीं और ऐंदल सिंह कंसाना आठवीं पास हैं। अटेर के अरविंद सिंह भदौरिया और उज्जैन के मोहन यादव पीएचडी हैं। वहीं, 9 मंत्री पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उम्र के मामले में भी जो रिपोर्ट आई है, उसमें 12 मंत्रियों की आयु 41 से 50 साल के बीच घोषित है। जबकि 22 मंत्रियों की उम्र 51 से लेकर 70 साल तक है। शिवराज मंत्रिमंडल में महिलाओं का प्रतिशत 12 फीसदी है, यानी मंत्रिमंडल में कुल 4 महिला मंत्री हैं।
असंतुलित या मजबूरी का मंत्रिमंडल
राजनीतिक जानकार इसे पूरी तरह असंतुलित फॉर्मूला बता रहे हैं। वो भी तब, जब मध्यप्रदेश में 25 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। ऐसे में भाजपा में घमासान होना तय माना जा रहा है। मंत्रिमंडल से वरिष्ठ विधायकों को दरकिनार किया गया है। शिवराज सिंह द्वारा सुझाए गए नामों को केंद्रीय नेतृत्व ने रिजेक्ट कर दिया। वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया के द्वारा दिए गए सभी नामों पर मुहर लगा दी गई। मंत्रिमंडल विस्तार से पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने क्या गजब बात कही। मंथन से अमृत निकलता है, विष तो शिव पीते हैं। मध्यप्रदेश के सियासी खेल को जमाकर उसी में उलझी भाजपा की दिक्कतें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। यहां दो सवाल खड़े हैं। अगर मंथन से अमृत के रूप में मंत्रिमंडल निकला है तो विष कौन है। या ये समझा जाए कि कहीं मंत्रिमंडल ही तो विष नहीं। जिस तरह मंथन में शिवराज सिंह चौहान पर ज्योतिरादित्य भारी पड़े हैं, उसे देखते हुए तो कहा जा सकता है कि मंत्रिमंडल में सिंधिया का दबदबा शिवराज से ज्यादा हो गया है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक दिन पहले मुख्यमंत्री शिवराज ने ट्वीट कर अपना दर्द बयां नहीं किया होता। शिवराज ने ट्वीट में कहा था, 'आए थे आप हमदर्द बनकर, रह गए केवल राहजन बनकर। पल-पल राहजनी की इस कदर आपने, कि आपकी यादें रह गईं दिलों में जख्म बनकर।’ क्या शेर के रूप में व्यक्त किया गया यह दर्द ही शिवराज सिंह के लिए जख्म है। राजनीतिक हलकों से जुड़े लोग इसे सिंधिया से जोड़कर देख रहे हैं।
मंथन से क्या-क्या निकला
28 मंत्रियों के कैबिनेट विस्तार के लिए हुए मंथन में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान की अधिकतर पसंद को दरकिनार कर दिया। वहीं सिंधिया द्वारा दिए गए सभी नामों को मंत्रिमंडल में जगह दे दी। मंत्रिमंडल में सिंधिया के 12 विश्वासपात्र शामिल हो गए। शिवराज सरकार के पुराने मंत्रिमंडल में भी सिंधिया खेमे के दो लोगों को पहले ही मंत्री बनाया हुआ है। ऐसे में अगर सारे कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं की संख्या देखें तो शिवराज मंत्रिमंडल में 14 ऐसे मंत्री होंगे जो कांग्रेस से भाजपा में आए हैं जबकि भाजपा से 16 मंत्री बनाए गए। वहीं पुराने मंत्रिमंडल में भाजपा से 3 मंत्री बनाए गए थे। इस तरह शिवराज मंत्रिमंडल में भाजपा के कुल 19 विधायक मंत्री हैं।
एक बार फिर मानना पड़ेगा शिवराज सिंह चौहान को। विभागों के बंटवारे में गजब का संतुलन दिखाया। हर किसी को खुश रखने का बंदोबस्त। कोई भी नाराजगी वाला स्वर नहीं। भाजपाइयों को अचानक विभागों के लिए मलाईदार शब्द से शिकायत होने लगी है। इसलिए चाहे तो उसकी जगह 'मालदार’ का प्रयोग कर सकते हैं। चाहे तो मालदार भी छोड़ दें, लेकिन कम से कम दिलदार का प्रयोग तो करने में कोई बुराई नहीं है। तो शिवराज सिंह चौहान ने जमकर दिलदारी दिखाई। आज की सियासी पंगत में बैठे अपने हर वजीर के लिए यह फिक्र रखीं कि उसकी प्लेट में कम से कम एक स्वीट डिश जरूर चली जाए। यानी हर मंत्री को कम से कम एक दमदार या कह सकते हैं काम करने वाला महकमा भी जरूर दिया गया है।
युवा तुर्क विश्वास सारंग को यदि सहकारिता की सेवा करने का फिर मौका नहीं मिला तो उन्हें चिकित्सा शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण विभाग दे दिया गया। कोरोना काल में सारंग के लिए इस विभाग के जरिए काम कर अपनी छवि चमकाने का पूरा अवसर रहेगा। नरोत्तम मिश्रा से यदि स्वास्थ्य विभाग लिया गया तो उसके बदले उन्हें उनकी क्षमताओं के अनुरूप ही गृह के साथ जेल और संसदीय कार्य और विधि विभाग फिर सौंप कर उनका दर्जा नंबर दो का रखा गया है। जगदीश देवड़ा के ग्रह भी बदले हैं और वित्त के साथ वाणिज्यिकर और योजना एवं आर्थिक सांख्यिकी जैसा एक तगड़ा विभाग उनकी झोली में गिरा है।
राजपूत का बढ़ा कद
गोविन्द राजपूत को आज महाराजा के अनुसरण वाले अपने निर्णय पर यकीनन और गर्व हुआ होगा, जब परिवहन जैसा कुबेरनुमा महकमा उनके पास आ गया। यह विभाग किसी भी सरकार के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से कम महत्व वाला नहीं होता है। हां, इसे दुहने के अपने-अपने तरीके होते हैं। इस काम में भाजपा और कांग्रेस की पद्धति के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। तो ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि कांग्रेस से आए राजपूत किस तरह भाजपाई मंत्री की हैसियत से विभाग का अपने और सरकार के पक्ष में संचालन कर सकेंगे। भाजपा के एक डॉक्टर की सियासी तबीयत खराब कर देने वाले प्रभुराम चौधरी अब स्वास्थ्य विभाग भी देखेंगे। सांची में शेजवार परिवार का सियासी बंटाधार कर देने वाले प्रभुराम को परिवार कल्याण का भी काम मिला है। इन तरीकों से चौधरी का वजन बढ़ाया तो गया, लेकिन उसमें से कुछ तोला निकालकर रामकिशोर कांवरे को राज्यमंत्री के हैसियत से आयुष का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया गया है।
तुलसी सिलावट मछुआरे और मछलियों की चिंता तो चलते-फिरते कर ही लेंगे, लेकिन जल संसाधन जैसा विभाग उनके पास बरकरार रखकर उन्हें भी पर्याप्त काम और मौका उपलब्ध करा दिया गया है। कुटीर और ग्रामोद्योग जैसी शाकाहारी सब्जी के साथ ही गोपाल भार्गव को लोक निर्माण विभाग वाला बड़ा विभाग थमाकर शिवराज ने उनका महत्व बरकरार रखा है। इमरती देवी तो यूं ही महज मंत्री बनाए जाने की संभावनाओं से ही चहक उठी थीं, तिस पर उन्हें पिछली सरकार की ही तरह अपनी क्षमताओं के अनुरूप महिला और बाल विकास का काम मिल गया है। राज्य में भाजपा की सियासी संभावनाओं को उजाला बनाए रखने में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका रही है। अब वे सहकारिता जैसे दमदार महकमे को भी संभालेंगे।
वीवीआईपी विभाग सीएम के पास
तो शिवराज ने जनसंपर्क और सामान्य प्रशासन जैसे वीवीआईपी विभाग अपने पास ही रखे हैं। यह सरकार पर नियंत्रण बनाए रखने का उनका महत्वपूर्ण जतन माना जा सकता है। शिवराज के सामने अपार चुनौतियां हैं। 25 सीटों के उपचुनाव में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। फिर अगले विधानसभा चुनाव की तेजी से नजदीक आती घड़ी भी उनसे बहुत अधिक और बहुत ही उत्कृष्ट काम की अपेक्षा बढ़ा देती है। इसलिए सरकार के मुखिया के तौर पर खुद को भविष्य की चुनौतियों के लिए अपनी ही दम पर तैयार करने का प्रयास किया है। यह वह विभाग वितरण है, जिससे किसी के भी नाखुश होने की कोई संभावना नहीं रह गई है। ऐसा संतुलन कायम करना आसान नहीं था। शायद यही वजह रही कि महकमों के आवंटन की यह प्रक्रिया कुछ ज्यादा ही लंबी खिंच गई। अब अंत भला तो सब भला जैसी स्थिति दिख रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया खुश और शिवराज भी संतुष्ट। एक साथ दो ध्रुवों को लाकर उनके बीच ऐसा सामंजस्य कायम करना कठिन प्रक्रिया थी। इसकी सफलता के लिए निश्चित ही शिवराज बधाई के पात्र हैं।
सिंधिया की ताकत बढ़ी
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वो कमाल किया है, जो उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया पूरी ताकत लगाकर भी कभी नहीं कर पाए। सफल केंद्रीय मंत्री और सांसद रहे माधवराव की हसरत मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की थी या फिर सुपर सीएम। यह हो न सका जयविलास पैलेस इस बात पर गर्व कर सकता है कि माधव महाराज के पुत्र ज्योतिरादित्य ने वह रसूख अर्जित कर लिया, जिसकी तमन्ना उनके पिता को थी और जो सुख उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया आज से 53 साल पहले भोग चुकी हैं। कमलनाथ सरकार का तख्तापलट कर महाराज मुख्यमंत्री न बन सके तो कोई गम नहीं वे किंगमेकर बन गए हैं और अपनी इस नई पारी में वे उसी अंदाज में बल्लेबाजी कर रहे हैं, जैसा खेल पांच दशक पहले उनकी दादी ने खेला था। महाराज की महिमा से फिर सत्ता में आई भाजपा और मुख्यमंत्री पर महाराज की मर्जी का चाबुक कुछ इस तरह चल रहा है कि 15 साल तक लगातार मंत्री रहे गोपाल भार्गव अथवा अपने खास सखा भूपेंद्र सिंह को उनके अनुभव और योग्यता के मुताबित विभाग देना मुश्किल हो रहा है। महाराज की महिमा ही है कि भाजपा को दूसरी, तीसरी और चौथी बार के अनुभवी विधायकों की जगह फर्स्ट टाइमर को भी मंत्री बनाना पड़ा है। महाराज के पराक्रम के संकेत हाल ही में अपनी वर्चुअल रैली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने यह कह कर दे दिए थे कि सिंधिया की हर बात को पूरा किया जाएगा। वचनपत्र वाली पार्टी से संकल्प वाली भाजपा में आए ज्योतिरादित्य के वचन और पसंद का मान रखना अब भाजपा और शिवराज के लिए कमलनाथ सरकार के वचन से भी वजनदार काम हो गया है।
राजमाता की दिलाई याद
यानी मुख्यमंत्री भले ही उनकी पसंद का हो, लेकिन वो मुख्यमंत्री अपनी पसंद से कुछ काम न कर सके। संविद सरकार में राजमाता द्वारा मुख्यमंत्री बनाए गए गोविंद नारायण सिंह ने भी महल के इतने दबाव झेले कि एक दिन उन्होंने संविद सरकार से ही किनारा कर लिया था। 1969 वाला वापसी का वह रास्ता भाजपा या शिवराज के पास फिलहाल नहीं है।
सिंधिया ने समन्वय बनाए रखा
ज्योतिरादित्य के जुझारू तेवर रंग लाए लेकिन समन्वय उन्होंने टूटने नहीं दिया। लंबी एक्सरसाइज कई दौर के विचार मंथन के बीच कंप्रोमाइज उन्होंने भी किया तो भाजपा ने उन्हें यह भी संदेश दे दिया कि मध्य प्रदेश की राजनीति में भाजपा संगठन को विश्वास में लेकर ही उन्हें आगे बढ़ना होगा। कुल मिलाकर ज्योतिरादित्य-शिवराज की केमिस्ट्री कमजोर साबित नहीं हो पाई। जो उन्होंने सामूहिक इस्तीफे के साथ ऑपरेशन लोटस के दौरान बनाई थी। केंद्र का महाराज प्रेम रंग लाया। सिंधिया ने खुद को मजबूत साबित किया और संकेत दिया कि भविष्य की भाजपा में यदि उनकी दिलचस्पी मध्यप्रदेश में बनी रहेगी। तो केंद्रीय राजनीति में वह बड़ा किरदार निभाने की सामर्थ रखते हैं। जिस तरह प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेताओं ने सिंधिया को सम्मान के साथ सरकार बनाने का श्रेय दिया। इससे उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सिंधिया का दबदबा इसलिए और गौर करने लायक है कि सिर्फ शिवराज ही नहीं बल्कि कई दूसरे नेताओं चाहे फिर वह नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय हों, उनके लिए इस कैबिनेट विस्तार में ज्यादा गुंजाइश नजर नहीं आई।
चुनौतियों का समाधान
मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद लगातार चौतरफा चुनौतियों से जूझ रहे शिवराज ने भी विभाग वितरण के बाद बड़ा सकारात्मक संदेश दिया कि उन्हें या उनकी पसंद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चौहान का धैर्य और संयम बेकार नहीं गया। अपने समर्थक और पसंद के कुछ नेताओं को कैबिनेट में वह शामिल नहीं करा पाए। लेकिन विभाग वितरण के बाद समर्थकों को कमजोर भी साबित नहीं होने दिया। चाहे फिर वह नंबर दो सरकार में माने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा जिन्हें गृहमंत्री बनाए रखा गया या फिर पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव जिन्हें लोक निर्माण विभाग का जिम्मा सौंपा, तो साथ में कुटीर और ग्राम उद्योग भी दे दिया। यदि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग सिंधिया समर्थक महेंद्र सिंह सिसोदिया के खाते में गया तो अपने सबसे भरोसेमंद भूपेंद्र सिंह के हवाले नगरीय विकास एवं आवास कर दिया। सिंधिया यानी ज्योतिरादित्य का भाजपा में दबदबा है लेकिन शिवराज ने अपने सिंधिया यानी यशोधरा के पुराने सम्मान को बरकरार रखा। आदिवासी चेहरा विजय शाह को निराश नहीं होना पड़ा जिन्हें वन विभाग तो प्रोटेम स्पीकर रह चुके जगदीश देवड़ा को वाणिज्य कर वित्त योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी की जिम्मेदारी सौंप दी गई। कमल पटेल को यथावत किसान कल्याण एवं कृषि विकास बिना काट-छांट के बरकरार रखा। बुंदेलखंड के बृजेंद्र प्रताप सिंह को भी खनिज साधन और श्रम जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया गया। जो नरेंद्र सिंह से लेकर विष्णु दत्त शर्मा की पसंद माने जाते हैं। गोपाल, भूपेंद्र, बृजेंद्र के साथ गोविंद ने उस बुंदेलखंड का पलड़ा भारी साबित किया, जहां प्रद्युम्न के साथ भाजपा नई संभावनाओं पर नजर लगाए हुए है। राजधानी का प्रतिनिधित्व करने वाले विश्वास सारंग नई जिम्मेदारी चिकित्सा शिक्षा के साथ भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास संभालेंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा को सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग सौंपा गया। इंदौर मालवा की राजनीति में संघ की पसंद बनकर उभरी उषा ठाकुर को पर्यटन संस्कृति एवं आध्यात्म तो संघ की अपेक्षाओं पर खरा उतरकर दिखाने की जिम्मेदारी मोहन यादव को सौंपी जिन्हें उच्च शिक्षा विभाग का जिम्मा दिया गया। ऑपरेशन लोटस के फाइटर अरविंद भदौरिया को सहकारिता एवं लोक सेवा प्रबंधन सौंपकर ग्रामीण क्षेत्रों की राजनीति में पार्टी का एक नया कैडर खड़ा करने की लाइन खोल दी। अरविंद की गिनती संगठन के प्रति शत-प्रतिशत समर्पित नेताओं में होती है। शिवराज और ज्योतिरादित्य खेमे से अलग ऑपरेशन लोटस के पहले चरण से जुड़े ऐंदल सिंह कंसाना को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपकर बड़ा संदेश दिया गया। भाजपा जिनका उपयोग उनके प्रभाव वाले क्षेत्र जहां उपचुनाव होना है वहां अपनी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने की मंशा रखती है। ऐंदल जो कांग्रेस से भले ही भाजपा में शामिल हुए। लेकिन इससे पहले ग्वालियर-चंबल की राजनीति में तीसरा बड़ा फैक्टर निभाने वाली बीएसपी से जुड़े रहे। कुछ इसी तरह कांग्रेस से पहला इस्तीफा देने वाले हरदीप सिंह डंग को महत्वपूर्ण पर्यावरण विभाग के साथ नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यानी संदेश उन नेताओं के लिए जिनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ और भविष्य में हो सकता हैं उनके लिए कि भाजपा जो वादा करती है वह निभाती है।
- राजेंद्र आगाल