माननीयों को पेंशन क्यों?
04-Apr-2022 12:00 AM 5397

 

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में राजनीति को सेवा का माध्यम माना जाता है। लेकिन आज भारत में राजनीति लाभ का धंधा बन गया है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जनता की सेवा करने वाले माननीय राष्ट्रपति के वेतन से भी अधिक पेंशन पा रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि एक दिन का विधायक या सांसद बनने के बाद भी माननीय पेंशन के हकदार हो जाते हैं, जबकि यही हक एक शासकीय अधिकारी-कर्मचारी को 33 साल की सेवा के बाद मिलता है।

मप्र सहित देशभर में लाखों अधिकारी-कर्मचारी नई पेंशन स्कीम को हटाकर पुरानी पेंशन स्कीम लागू करवाने के लिए महीनों से आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 'माननीय’ पेंशन से ही निहाल हो रहे हैं। हालांकि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए वर्तमान व पूर्व विधायकों की पेंशन पर कटौती का ऐलान किया है। इससे मप्र सहित देशभर में 'माननीय’ की पेंशन पर सवाल उठने लगे हैं। लोग सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर माननीयों को पेंशन क्यों दी जा रही है? सवाल वाजिब भी है। एक तरफ देश में करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए मुहाल हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीति में रहकर सारी सुख-सुविधाएं भोगने और संपत्ति जुटाने के बाद माननीय जब चुनाव हार जाते हैं या राजनीति से रिटायर हो जाते हैं तब भी उन्हें मोटी पेंशन के साथ ही बहुत सारी सुविधाएं दी जाती हैं। जबकि कहने को जनता मालिक और माननीय सेवक होते हैं।

भारत में सांसद या विधायक रहते वेतन और सुविधाएं मिलने का प्रावधान तो है ही, चुनावी हार या दूसरे कारणों से भूतपूर्व हो जाने पर भी उन्हें पेंशन और कई सुविधाएं आजीवन मिलती हैं। निधन हो जाने के बाद उनके आश्रित को भी आजीवन पारिवारिक पेंशन मिलती है। विश्व के अनेक देशों में जनप्रतिनिधियों को वेतन और सुविधाएं मिलती हैं जिसे निर्धारित करने का अधिकार अलग संस्थाओं को रहता है। इसके लिए उम्र और सेवा की सीमा निर्धारित है। ब्रिटेन जैसे देश में इसके लिए आयोग का गठन किया गया है, किंतु भारत में सांसद व विधायकों की सुविधाओं के संबंध में क्रमश: संसद व विधानसभाएं ही निर्णय लेतीं हैं।

एक से अधिक पेंशन के हकदार

देश में चपरासी से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक को केवल एक पेंशन मिलती है, लेकिन सांसद, विधायक और मंत्रियों पर यह नियम लागू नहीं है। यानी, विधायक से यदि कोई सांसद बन जाए तो उसे विधायक की पेंशन के साथ ही लोकसभा सांसद का वेतन और भत्ता भी मिलता है। इसी तरह राज्यसभा सांसद चुने जाने और केंद्रीय मंत्री बन जाने पर मंत्री का वेतन-भत्ता और विधायक-सांसद की पेंशन भी मिलती है, जबकि सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों को एक ही पेंशन मिलती है। वह भी 33 साल की नौकरी पूरी करने के बाद। वहीं, नेताओं को एक दिन का विधायक या सांसद बनने पर भी पेंशन की पात्रता होती है। यह जानकारी सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई सूचना से मिली है। यह जानकारी हासिल करने के बाद एडवोकेट पूर्वा जैन हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करेंगी। उनकी मांग है कि संविधान के मुताबिक समानता के अधिकार के कानून का पालन हो। जनप्रतिनिधियों की पेंशन के लिए भी शासकीय सेवकों की तरह गाइडलाइन बनाई जाए। कम से कम पांच साल का कार्यकाल अनिवार्य किया जाए। साथ ही वे अंत में जिस पद पर रहे, उसी की पेंशन उन्हें मिले। मंत्री या निगम-मंडल में अन्य सरकारी पदों पर रहते हुए वेतन के साथ पुराने पदों की पेंशन नहीं दी जाए, क्योंकि सरकार ने जहां एक तरफ मार्च 2005 के बाद नियुक्त होने वाले सरकारी कर्मचारियों की पेंशन ही बंद कर दी है। वहीं, लोगों से गैस सब्सिडी तक छोड़ने की अपील की। ऐसे में देश के माननीयों के लिए भी नियम-कायदे बनाए जाना चाहिए। उप्र में विधायकों को पेंशन के साथ भत्ता भी मिलता है। वहीं बिहार में एमएलए या एमएलसी को भी कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं।

पूर्व विधायकों की पेंशन लाखों में

26 अक्टूबर 2016 में पंजाब में पूर्व विधायकों को मिलने वाली पेंशन में संशोधन किया गया था। इसके तहत पूर्व विधायकों को उनके पहले कार्यकाल के लिए पेंशन के रूप में 15 हजार रुपए और इसके बाद अगले हर कार्यकाल के लिए 10 हजार रुपए देने का प्रावधान किया गया। इस रकम में पहले 50 फीसदी डीए मर्ज होगा और उसके बाद बनने वाली कुल रकम में फिर से 234 प्रतिशत महंगाई भत्ता जुड़ जाएगा। इस तरह पूर्व विधायकों को काफी फायदा हुआ, क्योंकि इससे 15000 पेंशन में 50 प्रतिशत डीए यानी 7,500 रुपए जुड़ने से 22500 रुपए बने। अब 22,500 में 234 फीसदी डीए यानी 52,650 रुपए और जुड़ने से कुल पेंशन 75,150 रुपए बन जाती है। इसी नियम के चलते कई नेताओं को 5 लाख रुपए तक की पेंशन मिलती थी। अकाली दल के प्रमुख प्रकाश सिंह बादल 11 बार विधायक रह चुके हैं। ऐसे में उन्हें 5.76 लाख रुपए की पेंशन मिलती थी। हालांकि, उन्होंने इस बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद अपनी पेंशन नहीं लेने का ऐलान किया था। 

ऐसा ही हाल हरियाणा का भी है। चार साल पहले तक हरियाणा में 262 पूर्व विधायकों को पेंशन मिलती रही है। इसके बाद पेंशन में बढ़ोतरी भी हुई है। पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चौटाला को लगभग सवा दो लाख रुपए पेंशन मिलती है। कांग्रेस नेता एवं पूर्व विधायक कैप्टन अजय सिंह यादव की मासिक पेंशन 2.38 लाख रुपए है। आरटीआई कार्यकर्ता पीपी कपूर ने हरियाणा सरकार से 2018 में यह जानकारी मांगी थी। पूर्व विधायक चंद्रावती को 2,22,525 रुपए, एलनाबाद के पूर्व विधायक भागीराम 1,91,475 रुपए, शमशेर सिंह सुरजेवाला 1,75,950 रुपए, अशोक अरोड़ा 1,60,425 रुपए, प्रो. सम्पत सिंह 2,14,763 रुपए, हरमोहिंद्र सिंह चट्ठा 1,60,425 रुपए, और पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भजनलाल के पुत्र चन्द्रमोहन को 1,52,663 रुपए बतौर मासिक पेंशन मिलती है। इनके अलावा धर्मवीर गाबा को 1,52,663 रुपए, खुर्शीद अहमद 1,52,663 रुपए, फूलचंद मुलाना 1,68,188 रुपए, मांगेराम गुप्ता 1,68,188 रुपए, शकुंतला भगवाडिया 1,68,188 रुपए, बलबीरपाल शाह 2,07,000 रुपए, सतबीर कादियान 1,29,375 रुपए, स्वामी अग्रिवेश 51,750 रुपए तत्कालीन अवधि के दौरान अब उनका देहांत हो चुका है। शारदा रानी को 1,37,138 रुपए, देवीदास सोनीपत 1,21,613 रुपए, दिल्लू राम कैथल 1,13,850 रुपए, कमला वर्मा 1,13,850 रुपए, निर्मल सिंह अंबाला 1,52,663 रुपए, मोहम्मद इलयास 1,37,138 रुपए और कंवल सिंह हिसार को 1,21,613 रुपए मासिक पेंशन मिलती रही है। इस पेंशन में करीब 200 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। तब प्रदेश में न्यूनतम मासिक पेंशन 51,750 रुपए रही है। 39 पूर्व विधायकों को 90,543 रुपए प्रति माह पेंशन मिल रही है। इनमें अजय चौटाला भी शामिल हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की विधवा जसमा देवी को दोगुनी पेंशन मिल रही है। खुद पूर्व विधायक होने के नाते जसमा देवी को 51,750 रुपए प्रतिमाह तथा पूर्व मुख्यमंत्री की विधवा होने के नाते 99,619 रुपए प्रतिमाह पारिवारिक पेंशन मिल रही है।

मप्र में कई सुविधाएं

मप्र में विधायक बने नेता वेतन-भत्ते और दूसरी सुविधाओं के नाम पर 2 लाख 10 हजार रुपए तो पाते ही हैं, हार जाने या दोबारा नहीं चुने जाने पर भी कई सुविधाओं के अलावा बतौर पेंशन वे या उनके आश्रित आजीवन अच्छी-खासी रकम के हकदार हो जाते हैं। मप्र विधानसभा के सेक्शन 6ए के तहत, मप्र में पूर्व विधायकों को हर महीने 20 हजार रुपए की पेंशन मिलती है। ये सुविधा हर पूर्व विधायक को मिलती है, फिर चाहे उसने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया हो या नहीं। उपचुनाव जीतकर कार्यकाल पूरा न कर पाने वालों को भी 20 हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन मिलती है। पांच साल से ज्यादा विधायक रहने वालों की पेंशन में हर साल 800 रुपए हर महीने के हिसाब से पेंशन जुड़ती जाती है। इसका मतलब ये है कि अगर कोई दोबारा विधायक बना और उस दौरान जितने साल विधायक रहा, तो 20 हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन के अलावा हर साल उसकी पेंशन में 800 रुपए महीने और मिलते हैं, यानी सालाना 9,600 रुपए और उसकी पेंशन में जुड़ जाते हैं। इसका मतलब है कि अगर उसने दो कार्यकाल पूरे किए हैं, तो उसे 24 हजार रुपए मासिक पेंशन मिलेगी। पूर्व विधायक की मृत्यु की तारीख से उसके पति/पत्नी, या मृतक आश्रित को हर महीने 18 हजार रुपए की फैमिली पेंशन मिलती है। हर साल फैमिली पेंशन में 500 रुपए जुड़ जाते हैं। पूर्व विधायकों को हर महीने 15 हजार रुपए का मेडिकल भत्ता और राज्य सरकार द्वारा संचालित अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है। पेंशन के हकदार सभी पूर्व विधायकों को अपनी पति/पत्नी या एक अटेंटडेंट के साथ रेलवे के फर्स्ट एसी या सेकेंड एसी कोच में यात्रा के लिए रेलवे के कूपन मिलते हैं। इस रेलवे कूपन से वे राज्य भर में बिना रोक-टोक कहीं भी यात्रा करने को स्वतंत्र होते हैं। राज्य के बाहर हर फाइनेंशियल ईयर में चार हजार किलोमीटर तक की यात्रा मुफ्त होती है।

मप्र में 1.70 लाख रुपए प्रतिमाह के वेतन के बावजूद मप्र सरकार ने मंत्रियों के इनकम टैक्स भरने का फैसला लिया है। लगभग 43 करोड़ रुपए मंत्रियों के इनकम टैक्स पर राज्य सरकार खर्च करेगी। 1990 में मप्र के विधायकों का मासिक वेतन 1000 था, जो अब 35000 हो गया है। एक आंकड़े के मुताबिक, पिछले वर्षों में विधायकों के वेतन के मुकाबले उनके भत्तों पर साढ़े चार गुना से ज्यादा भुगतान किया गया है। पिछले 5 सालों में 230 विधानसभा सदस्यों के वेतन पर 35.03 करोड़ रुपए खर्च हुए। जबकि उन्हें मिलने वाले अलग-अलग भत्तों पर सरकारी खजाने से लगभग 121 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है। इसमें यात्रा भत्ता के रूप में 38.03 करोड़ रुपए की बड़ी अदायगी शामिल है। मप्र के विधायकों को हर महीने 1.10 लाख रुपए सैलरी, 35 हजार निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 10 हजार टेलीफोन भत्ता, 10 हजार चिकित्सा भत्ता, 15 हजार अर्दली-ऑपरेटर के, 10 हजार लेखन-डाक भत्ता और उसके बाद पेंशन 35 हजार महीना मिलता है। मप्र शासन की सर्विस कंडिका 6-ख के मुताबिक किसी ऐसे मृतक सदस्य या भूतपूर्व सदस्य के पति या पत्नी को, यदि कोई आश्रित हो, को, धारा 6-क की उपधारा (1) के अधीन पेंशन का हकदार था, उसकी मृत्यु की तारीख से ऐसी कालावधि के लिए 18,000/- रुपए प्रतिमाह कुटुंब पेंशन दी जाती है।

राजस्थान में विधायकों की पेंशन

राजस्थान में यदि किसी विधायक ने 5 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है तो उसे हर महीने 35 हजार रुपए पेंशन के रूप में मिलते हैं। वहीं अगर कोई दूसरी बार विधायक बनता है और अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा करता है तो इन पांच साल के दौरान हर महीने के हिसाब से 1,600 रुपए और मिलेंगे यानी दो कार्यकाल पूरा करने के बाद उसे हर महीने 43 हजार रुपए मिलने लगेंगे। वहीं 70 वर्ष की उम्र होने पर इसमें 20 प्रतिशत की वृद्धि होगी और 80 वर्ष का होने पर यह 30 प्रतिशत बढ़ जाएगी। उपचुनाव में जीते विधायकों को उनकी शपथ लेने की तारीख से विधानसभा खत्म होने के पीरियड को 5 साल मानकर पेंशन दी जाएगी। विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने से पहले यदि किसी विधायक की मौत हो जाती है तो ऐसे में उसके आश्रितों को हर माह वही पेंशन मिलेगी, जो पूर्व विधायक को मिलती है। वहीं, पूर्व विधायक के निधन के बाद उनकी पत्नी या पति को 17,500 रुपए या उन्हें मिली लास्ट पेंशन का 50 प्रतिशत, जो भी ज्यादा हो वह पेंशन के रूप में मिलता है। सभी पूर्व विधायकों को राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम यानी आरजीएचएस के तहत कैशलेस मेडिकल सुविधा मिलती है।

इसके अलावा पूर्व विधायकों को दो फ्री पास मिलते हैं। इससे वे और उनके साथ कोई और व्यक्ति राजस्थान की सरकारी बसों में फ्री यात्रा कर सकते हैं। इसके साथ ही पूर्व विधायक अपने साथ एक व्यक्ति को लेकर किसी फाइनेंशियल ईयर में 1 लाख रुपए तक रेल, फ्लाइट या शिप से किसी भी कैटेगरी में यात्रा कर सकते हैं। यदि पूर्व विधायक एक साल में 70 हजार रुपए ही ट्रैवल पर खर्च कर पाते हैं तो ऐसे बचा हुआ पैसा अगले साल के ट्रैवल भत्ते में जुड़ जाएगा। इसके अलावा भी पूर्व विधायकों को कई और सुविधाएं मिलती हैं।

उप्र में स्थिति

उप्र में 2000 से ज्यादा पूर्व विधायक हैं। उप्र में पूर्व विधायकों को हर महीने 25 हजार रुपए पेंशन मिलती है। 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले विधायकों की पेंशन में हर साल 2 हजार रुपए की बढ़ोतरी होती जाती है। यानी 10 साल विधायक रहने वालों को हर महीने 35 हजार रुपए की पेंशन मिलती है। इसी तरह 15 साल विधायक रहने वालों को हर महीने 45 हजार रुपए की पेंशन मिलती है। 20 साल विधायक रहने वालों को हर महीने 55 हजार रुपए की पेंशन मिलती है। विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके लोगों, यानी एमएलए और एमएलसी को मिलने वाले पेंशन और सुविधाएं एक ही होती हैं। पूर्व विधायकों को सालाना एक लाख रुपए का रेल कूपन मिलता है, जिसमें से 50 हजार रुपए निजी वाहन के डीजल, पेट्रोल के लिए कैश लिए जा सकते हैं। इसके अलावा जीवनभर मुफ्त रेलवे पास और मुफ्त मेडिकल सुविधा का लाभ मिलता है। उप्र में पिछले 9 बार से विधानसभा का चुनाव जीतने वालों में भाजपा के सुरेश खन्ना, सपा के दुर्गा यादव हैं, जबकि आजम खान 10वीं बार जीते हैं। 2016 में अखिलेश यादव सरकार ने उप्र के पूर्व विधायकों की पेंशन को 10 हजार रुपए प्रति महीने से बढ़ाकर 25 हजार रुपए प्रतिमाह किया था।

हिमाचल में 36 हजार पेंशन

प्रदेश में विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जैसे ही विधायक बनने का सर्टिफिकेट जारी किया जाता है, वह पेंशन के हकदार बन जाते हैं। यहां पर विधायक को एक टर्म यानी 5 साल पूरा होने पर हर महीने 36,000 रुपए पेंशन मिलती है। इसके बाद एक और टर्म पूरा करने पर विधायक को 5,000 रुपए अतिरिक्त पेंशन दी जाती है यानी एक साल का एक हजार रुपए ज्यादा मिलता है। प्रदेश में इस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विद्या स्टोक्स, कौल सिंह ठाकुर और गंगूराम मुसाफिर सहित कई पूर्व विधायक हैं जिन्हें अधिक पेंशन मिलती है। विधानसभा से जुटाई गई जानकारी के अनुसार विधायकों को पेंशन बेसिक टर्म 65,000 रुपए डीए के साथ मिलता है। वहीं झारखंड में एक टर्म के विधायक को 40 हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन राशि निर्धारित है। एक बार 40 हजार रुपए का पेंशन निर्धारित होते ही प्रतिवर्ष उसमें केवल 4 हजार रुपए की वृद्धि होती जाएगी, लेकिन पेंशन की अधिकतम राशि एक लाख रुपए से अधिक नहीं होगी। दर्जनभर पूर्व विधायक हैं, जिन्हें एक लाख रुपए प्रतिमाह पेंशन मिल रही है।

गुजरात में नहीं मिलती पेंशन

देश में गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां पूर्व विधायकों को पेंशन नहीं दी जाती है। लेकिन यहां भी पूर्व विधायकों को कई सुविधाएं दी जाती हैं। उन्होंने सरकारी हॉस्पिटल के मानदंड के अनुसार इलाज के बिल के भुगतान और राज्य परिवहन में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है।  पूर्व सांसदों के लिए पेंशन की व्यवस्था सभी लोकतंत्रात्मक देशों में है। परंतु उन्हें पेंशन उस दिन से मिलती है, जब वे उतनी आयु के हो जाते हैं, जो उस देश में शासकीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु है। जैसे यदि फ्रांस में शासकीय कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष है, तो वहां के हर सांसद को 60 वर्ष का होने के बाद ही पेंशन मिलेगी।

बात पेंशन की हो या वेतन की, भारत की अर्थव्यवस्था को देखते हुए यह सार्वजनिक हित में नहीं है। इन नियमों में तत्काल परिवर्तन की जरूरत है। कम-से-कम सांसदों और विधायकों का वह अधिकार समाप्त कर देना चाहिए, जिसके चलते वे स्वयं अपने वेतन-भत्ते निर्धारित कर लेते हैं। विदेशों की तरह यहां भी पेंशन के नियमों में परिवर्तन करके पेंशन पाने की आयु-सीमा शासकीय कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की आयु-सीमा के समान होनी चाहिए।

गौरतलब है कि पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस प्रकार की पहल की तो थी, परंतु उन्हें समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। वेतन और पेंशन संबंधी नियमों में परिवर्तन न होने से जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, वह जारी रहेगा और संसद की प्रजातांत्रिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे। हमारे संविधान ने संसद और विधानमंडल को सरकार की वित्तीय गतिविधियों पर पूरा नियंत्रण रखने का अधिकार दिया है। संसद और विधानमंडल की स्वीकृति के बिना सरकार एक पैसा भी खर्च नहीं कर सकती। परंतु माननीयों द्वारा पेंशन के अधिकार का उपयोग स्वयं के लाभ के लिए किया जाता रहा है, जो कि एक दृष्टि से अनैतिक है। आज ऐसा लगता है कि जनप्रतिनिधि अपने हित में सरकारी कोष का दुरुपयोग कर रहे हैं। इससे जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच में अविश्वास की खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, जो स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज को कायम रखने में बाधक सिद्ध हो सकती है। आज समय की मांग है कि जनप्रतिनिधियों को अपने चाल-चलन से आदर्श स्थापित करना चाहिए।

माननीयों की बंद हो सकती एक से अधिक पेंशन!

विधायक, सांसद एवं मंत्रियों को एक से अधिक पेंशन मिलने से जुड़े नियम में बदलाव की मांग को लेकर इंदौर हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर गत दिनों जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस अमरनाथ केसरवानी की युगल पीठ में सुनवाई हुई। मामले में पहले ही केंद्र और राज्य सरकार को कोर्ट नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब पेश करने के आदेश दे चुकी है। मप्र के संसदीय कार्य विभाग के प्रमुख सचिव को भी पक्षकार बनाने के आदेश दिए हैं। विभाग की ओर से मुख्य सचिव के स्थान पर उनका नाम जोड़ने से जुड़ा आवेदन पेश किया गया था, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई होगी। याचिका को लेकर अब तक किसी ने जवाब पेश नहीं किया है। कोर्ट ने पहले ही पूछा है कि जब सभी विभागों में एक व्यक्ति को एक ही पेंशन दी जाती है तो फिर विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को अधिक क्यों दी जाती है। इसके क्या नियम हैं? शासन की ओर से पूर्व में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति पेश की थी, लेकिन कोर्ट ने उसे हालिया याचिका से अलग मुद्दा मानते हुए नोटिस जारी किए हैं। एडवोकेट पूर्वा जैन ने बताया, याचिका में मांग है कि जब देश में चपरासी से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक को सिर्फ एक पेंशन मिलती है तो सांसद, विधायक और मंत्रियों को एक से अधिक पेंशन देने का नियम क्यों है? यदि कोई विधायक बाद में सांसद भी बन जाए तो उसे विधायक और सांसद का वेतन और भत्ता भी मिलता है। राज्यसभा सांसद चुने जाने और केंद्रीय मंत्री बन जाने पर मंत्री का वेतन-भत्ता और विधायक-सांसद की पेंशन भी मिलती है।

हाथ में कैंची तो है मगर चला नहीं सकते

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री भगवंत मान ने यह घोषणा कर मास्टर स्ट्रोक लगा दिया कि अब राज्य में पूर्व विधायकों को सिर्फ एक बार एमएलए बनने की पेंशन मिलेगी। पूर्व विधायकों को मिलने वाले कई दूसरे भत्तों में भी कटौती करने की बात कही गई है। वहीं अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री इस स्ट्रोक से मुश्किल में पड़ गए हैं। उनके हाथ में कैंची तो है, मगर वे अपनी मर्जी से उसे चला नहीं सकते। मुख्यमंत्री भगवंत मान की घोषणा के बाद कई दूसरे राज्यों में भी इसे लेकर चर्चा होने लगी है। सोशल मीडिया पर लोगों ने मान के फैसले की तारीफ की है। चूंकि, हरियाणा, पंजाब से लगता हुआ राज्य है, इसलिए यहां पर उस फैसले की ज्यादा चर्चा सुनाई पड़ रही है। 2024 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए आम आदमी पार्टी ने हरियाणा में लोगों को जोड़ना शुरू कर दिया है। पूर्व विधायकों सहित खेलों से जुड़े लोग भी आप में शामिल हो रहे हैं। अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ रहे लोगों से भी संपर्क किया जा रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान का कहना था, कुछ विधायक तो ऐसे हैं जो कई बार विधायक बनने के बाद चुनाव हार गए हैं। उन्हें भी पेंशन मिल रही है। कई विधायक तो ऐसे हैं, जिनकी मासिक पेंशन चार-पांच लाख रुपए से ज्यादा है। अब उन्हें एक ही टर्म की पेंशन मिलेगी। अगर कोई नेता विधायक और सांसद की पेंशन एक साथ ले रहा है, तो उसे केवल एक ही पेंशन का लाभ दिया जाएगा।

8 वर्षों में पूर्व सांसदों को 500 करोड़ की पेंशन

बीते 8 सालों में पूर्व सांसदों को पेंशन में करीब पांच सौ करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। गौरतलब है कि पूर्व में यह नियम था कि वही पूर्व सांसद पेंशन के योग्य माना जाएगा जिसने बतौर सांसद 4 साल का कार्यकाल पूरा किया हो, पर साल 2004 में कांग्रेस नीत संप्रग की सरकार ने  संशोधन कर यह प्रावधान कर दिया था कि यदि कोई एक दिन के लिए भी सांसद बन जाएगा तो वह पेंशन का हकदार होगा और तब से यही हो रहा है। यही नहीं 1954 में लागू किए गए सांसदों के वेतन, भत्ता एवं पेंशन अधिनियम में अब तक 29 बार मनमाने संशोधन किए जा चुके हैं। एक सांसद को तब भी पेंशन मिलने लगती है, जब उसने एक दिन भी सांसदी संभाली हो। इसमें एक अजब-गजब बात यह है कि सांसदों और विधायकों को दो-दो, तीन-तीन बार पेंशन लेने तक का हक है। मसलन कोई व्यक्ति पहले विधायक रहा हो और बाद में सांसद बना हो या पहले सांसद और बाद में विधायक बना हो, तो उसे दो-दो पेंशन मिलती हैं। इतना ही नहीं, इनके पति, पत्नी या आश्रित को भी परिवार गुजारा भत्ता (फैमिली पेंशन) की सुविधा है। मतलब अगर किसी सांसद या पूर्व सांसद या विधायक या मंत्री की मृत्यु हो जाती है, तो उसके पति या पत्नी या आश्रितों को आजीवन आधी पेंशन दी जाती है। इसके अलावा सभी को मुफ्त रेल यात्रा की सुविधा दी जाती है। पूर्व सांसदों को किसी एक सहयोगी के साथ ट्रेन में द्वितीय श्रेणी एसी में मुफ्त यात्रा की सुविधा है, जबकि अकेले यात्रा करने पर प्रथम श्रेणी एसी की सुविधा है। इन्हीं सब बातों से आहत होकर सनातन धर्म परिषद् के संस्थापक नंदकिशोर मिश्रा ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है। उन्होंने भारत के सभी नागरिकों से यह अपील की है कि वे इस याचिका के पक्ष में खड़े हों, ताकि इन माननीयों को मिलने वाली इस सुविधा को खत्म किया जा सके और देश का एक बड़ा खर्चा बच सके।

भारत में सांसद और विधायक खुद अपनी सैलरी बढ़ाने पर फैसला करते हैं

दुनिया के अनेक देशों में जनप्रतिनिधियों को वेतन और सुविधाएं मिलती हैं। हालांकि, इसे वह खुद नहीं तय करते हैं बल्कि इसे तय करने का अधिकार अलग संस्थाओं को रहता है। इसके लिए उम्र और सेवा की सीमा तय है। वहीं, ब्रिटेन जैसे देश में इसके लिए आयोग का गठन किया गया हैं। हालांकि, भारत में सांसद व विधायकों की सुविधाओं के संबंध में क्रमश: संसद व विधानसभाएं ही फैसला लेती हैं। कनाडा में वेतन हर साल तय होती है और ये पिछले साल के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर आधारित होती है। ब्रिटेन में आयोग है, जिसमें इंडिपेंटेंड पार्लियामेंट्री स्टैंडर्ड अथॉरिटी में शामिल सांसद, ऑडिटर और पूर्व जज तय करते हैं। सैलरी में सालाना संशोधन होता है, जो पब्लिक सेक्टर की औसत इनकम के अनुसार होता है। ऑस्ट्रेलिया में सरकार, इकोनॉमी, कानून और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के एक्सपर्ट्स तय करते हैं, सालाना संशोधित होती है। न्यूजीलैंड में जज, सांसद और स्वतंत्र कानूनी संस्थाएं तय करती हैं, ये सदन में सांसद या विधायक के पद पर आधारित होती है। फ्रांस में हाईएस्ट ग्रेड वाले सबसे ज्यादा और सबसे कम सैलरी वाले सिविल सेवकों की सैलरीज के औसत से तय होती है। सिविल सेवकों की सैलरी को सदन के कोषाध्यक्ष (तीन सांसद) तय करते हैं। 

राजेंद्र आगाल

FIRST NAME LAST NAME MOBILE with Country Code EMAIL
SUBJECT/QUESTION/MESSAGE
© 2025 - All Rights Reserved - Akshnews | Hosted by SysNano Infotech | Version Yellow Loop 24.12.01 | Structured Data Test | ^