07-Jan-2021 12:00 AM
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देशभर में लंबे समय से विवादों का सबब बन रहे लव जिहाद पर अब भाजपा शासित राज्यों में कानूनी शिकंजा कसने लगा है। दरअसल, दूसरे धर्मों की युवतियों खासकर हिंदू युवतियों से मुस्लिम युवकों द्वारा जबरिया, प्रलोभन देकर या धोखाधड़ी पूर्वक किए जाने वाले विवाहों के मामले सामने आते रहे हैं। क्या वाकई हमारे देश में लव जिहाद पूरी तरह से पैर जमा चुका है। क्या इसे खत्म करने के लिए देश में एक कड़े कानून की आवश्यकता है। लव जिहाद का मुद्दा एनसीआर के नोएडा ही नहीं बल्लभगढ़ की निकिता हो या कानपुर से लेकर इंदौर तक, भोपाल से लेकर बागपत तक जिधर भी देखो लव जिहाद की खबर सामने आ रही है। साहिल खान साहिल सिंह बन जाता है और एक मासूम को अपने प्यार के जाल में फंसाता है और फिर एक शर्मनाक खेल खेला जाता है। ये खेल बागपत, भोपाल, केरल, इंदौर देश के हर कोने में होता है। ऐसे में क्या इस पर देशव्यापी कानून बनने का वक्त आ चुका है। देशभर में लंबे समय से विवादों का सबब बन रहे लव जिहाद पर अब भाजपा शासित राज्यों में कानूनी शिकंजा कसने वाला है। उप्र के बाद अब मप्र ने भी लव जिहाद के खिलाफ कानून लाकर उस पर नकेल कस दी है।
उप्र की योगी सरकार की तरह ही मप्र की सरकार भी लव जिहाद के खिलाफ प्रस्तावित धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2020 का अध्यादेश लागू करने जा रही है। शिवराज कैबिनेट ने अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। बैठक में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इस कानून में जो व्यक्ति या संस्थाएं इसमें सहयोग करेंगी, उनको भी अपराधी बनाया है। सरकार के लिए बेटियों की सुरक्षा सर्वोपरि है। पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार का प्रावधान किया है। सरकार इस कानून को लागू करने जा रही है।
26 दिसंबर को कैबिनेट ने विधेयक को मंजूरी दी थी, लेकिन 28 दिसंबर से शुरू होने वाले विधानसभा के शीतकालीन सत्र के स्थगित होने के कारण अब सरकार इस कानून को अध्यादेश के माध्यम से लागू करने जा रही है। इसे 6 महीने के अंदर पास कराना होगा। ऐसे में इस बजट सत्र में इसे पेश किया जाएगा। मप्र से पहले उप्र में लव जिहाद के खिलाफ अध्यादेश लाया गया। यहां पर 26 नवंबर को राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने मंजूरी दी थी। वहां विधानसभा सत्र नहीं होने के कारण अध्यादेश के माध्यम से लाया गया, जबकि मप्र में विधानसभा सत्र प्रस्तावित था, लेकिन इसके स्थगित होने के कारण अब इसे अध्यादेश के रास्ते लाया गया है।
लव जिहाद की पृष्ठभूमि उस विषैले दर्शन में निहित है, जिसमें विश्व को 'मोमिनÓ और 'काफिरÓ के बीच बांटा गया है। जिसके अनुसार, प्रत्येक सच्चे अनुयायी का यह मजहबी कर्तव्य है कि वह काफिरों की झूठी पूजा-पद्धति को नष्ट कर तलवार, छल, फरेब और प्रलोभन के माध्यम से उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करे या फिर मौत के घाट उतार दे। चाहे इसके लिए अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़े। इसी मानसिकता ने मोहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, गौरी, तैमूर, बाबर, अलाऊद्दीन खिलजी आदि कई विदेशी आक्रांताओं को भारत पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया। इसी जिहाद ने 70 वर्षों में पाकिस्तान की जनसंख्या को शत-प्रतिशत इस्लाम बहुल कर दिया है। क्या यह सत्य नहीं कि विभाजन के समय जिस पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में 15-16 प्रतिशत आबादी हिंदू, सिख और जैन आदि अनुयायियों की थी, वे आज एक प्रतिशत रह गए हैं? पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के प्रति जिहाद आसान है। भारत में 79 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है, इसलिए यहां पाकिस्तान की भांति तौर-तरीके अपनाकर गैर-मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन करना कठिन है। इसी कारण यहां जिहाद के लिए तथाकथित प्रेम का प्रयोग किया जा रहा है। साल 2009 में, रिटायर्ड जस्टिस केटी शंकरन ने माना था कि केरल और मैंगलोर में जबरन धर्म परिवर्तन के कुछ संकेत मिले थे। तब उन्होंने केरल सरकार को इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान करने की बात कही थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रेम के नाम पर, किसी को धोखे या उसकी मर्जी के बगैर धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
लव जिहाद के ज्यादातर केसों में यौन शोषण संबंधी कानूनों के तहत मुकदमे चलते रहे हैं। आरोपी को पेडोफाइल मानकर पॉक्सो और बाल विवाह संबंधी कानूनों के तहत भी केस चलते रहे हैं। इसके अलावा, बलपूर्वक शादियों के मामले में कोर्ट आईपीसी के सेक्शन 366 के तहत सजा दे सकते हैं। महिला की सहमति के बगैर यौन संबंध बनाने का आरोप साबित होने पर 10 साल तक की कैद की सजा हो सकती है। ऐसे मामलों में कानूनी पेंच यहां फंसता रहा है कि मुस्लिम शादियां शरीयत कानून और हिंदू शादियां हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कानूनन होती हैं। चूंकि मुस्लिम शादियों में सहमति दोतरफा अनिवार्य है इसलिए इन शादियों में अगर यह साबित हो जाता है कि सहमति से ही शादी हुई थी, तो कई मामले सिरे से खारिज होने की नौबत तक आ जाती है।
10 साल की सजा का प्रावधान
कानून में बहला-फुसलाकर, धमकी देकर जबर्दस्ती धर्मांतरण और शादी करने पर 10 साल की सजा का प्रावधान होगा। यह अपराध गैर जमानती होगा। धर्मांतरण और धर्मांतरण के बाद होने वाले विवाह के 2 महीने पहले डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को धर्मांतरण और विवाह करने और करवाने वाले दोनों पक्षों को लिखित में आवेदन देना होगा। बगैर आवेदन दिए धर्मांतरण करवाने वाले धर्मगुरु, काजी, मौलवी या पादरी को भी 5 साल तक की सजा का प्रावधान है। धर्मांतरण और जबरन विवाह की शिकायत पीड़ित, माता-पिता, परिजन या गार्जियन द्वारा की जा सकती है। सहयोग करने वालों को भी मुख्य आरोपी बनाया जाएगा। उन्हें अपराधी मानते हुए मुख्य आरोपी की तरह ही सजा होगी। जबरन धर्मांतरण या विवाह कराने वाली संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाएगा। इस प्रकार के धर्मांतरण या विवाह कराने वाली संस्थाओं को डोनेशन देने वाली संस्थाएं या लेने वाली संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन भी रद्द होगा। इस प्रकार के धर्मांतरण या विवाह में सहयोग करने वाले सभी आरोपियों के विरुद्ध मुख्य आरोपी की तरह ही कानूनी कार्रवाई की जाएगी। अपने धर्म में वापसी करने पर इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा। पीड़ित महिला और पैदा हुए बच्चे को भरण-पोषण का हक हासिल करने का प्रावधान किया गया है। आरोपी को ही निर्दोष होने के सबूत प्रस्तुत करना होगा।
- प्रवीण कुमार