21-Aug-2020 12:00 AM
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जमीन, मिट्टी का केवल एक कतरा भर नहीं बल्कि महिला समाज के अपने पहचान, सम्मान और गौरव का पैमाना भी है। महिला समाज को उनके भूमि, संपत्ति के अधिकार से वंचित रखना वास्तव में उस आधी आबादी अथवा आधी दुनिया की अवमानना है- जो एक मां, बहन और पत्नी अथवा महिला किसान के रूप में दो गज जमीन और मुट्ठीभर संपत्ति की वाजिब हकदार है। भारत में महिलाओं के भूमि तथा संपत्ति पर अधिकार, केवल वैधानिक अवमानना के उलझे सवाल भर नहीं हैं बल्कि उसका मूल, उस सामाजिक जड़ता में है जिसे आज आधुनिक भारत में नैतिकता के आधार पर चुनौती दिया ही जाना चाहिए। भारत, दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जहां संवैधानिक प्रतिबद्धता और वैधानिक प्रावधानों के बावजूद महिलाओं की आधी आबादी आज भी जमीन में कहीं अपनी जड़ों की सतत् तलाश और तराश में है।
11 अगस्त 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 2005 की पुनर्व्याख्या करते हुए एक बार फिर समाज के उस जनमानस को जगाने का प्रयास किया है जो ऐतिहासिक कानून के बाद भी जड़हीन हो चुके (अ) सामाजिक मान्यताओं के मुगालते में जी रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार पैतृक संपत्तियों पर बेटी का समान अधिकार है। उत्तराधिकार के वैधानिक प्रावधानों के परिधि में बेटी, जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति में कानूनन बराबर की हकदार हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि भले ही पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 2005 लागू होने के पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों का माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार रहेगा। अदालत ने तो यहां तक कहा कि बेटियां, आजीवन हमवारिस ही रहेंगी, उनका यह अधिकार कभी छीना नहीं जा सकता।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न न्यायालयों में संपत्ति के अधिकारों के जो लाखों विवाद बरसों से लंबित हैं और जिसकी वजह से लाखों महिलाएं अब भी अपने हकों से मरहूम हैं, वह समाज के जनमानस में बैठे उस सामाजिक जड़ता का प्रतीक है जिसे सदियों से समाज अपने अहंकार में ढो रहा है। इसका परिणाम ही है कि संपत्ति पर अधिकारों के लिए महिलाओं के वैधानिक दावों और नैतिक अनुनयों के बावजूद अब तक मात्र 12 फीसदी महिलाओं को उनका स्थापित अधिकार मिल पाया है। अदालतों में बरसों से लंबित तथाकथित विवादित प्रकरण, उस संकुचित मानसिकता का प्रमाण है जिसे आधी आबादी के अधिकार संपन्न होने से भय और असुरक्षा की आशंका होती है।
भारत के विभिन्न अदालतों में बरसों से लंबित लगभग दो-तिहाई मामले, संपत्ति और भूमि के विवादों से जुड़े हुए हैं। यह वैधानिक जटिलता के साथ-साथ उस सामाजिक मानसिकता और उसके अनिश्चित परिणामों को भी दर्शाता है जो आज भी संपत्ति को अपने सम्मान और अधिकार का विषय तो मानता है लेकिन उसे अपने ही मां, बहन और पत्नी (अर्थात महिलाओं) के साथ साझा नहीं करना चाहता। समाज का यह दोहरा रवैया ही लाखों महिलाओं के अधिकारों को भय और कानून के जटिलताओं में उलझाकर उन्हें वंचित बनाए रखने के लिए जवाबदेह है। भारतीय प्रशासनिक सेवा संस्थान (भारत सरकार, 2016) द्वारा संपत्ति और भूमि पर महिलाओं के अधिकारों से संबंधित अध्ययन यह बताता है कि- विभिन्न राज्यों में पूरी भूमि राजस्व व्यवस्था को अब तक महिला भूमि-संपत्ति अधिकारों के अनुरूप ढाला ही नहीं जा सका है। अर्थात् भूमि अधिकारों के लिए जवाबदेह राज्यतंत्रों की प्रशासनिक इकाइयां अब तक, संपत्ति और भूमि के अधिकारों को महिलाओं के लिए सार्थक बनाने की दिशा में आगे बढ़े ही नहीं हैं।
वर्ष 2011 में जब तत्कालीन संसद सदस्य डॉ. एमएस स्वामीनाथन के द्वारा 'महिला कृषक हकदारी कानून का मसौदा संसद में प्राइवेट मेंबर बिल के बतौर सबके सामने रखा गया, तब भी राजनीतिक बिरादरी ने उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। तब से लेकर महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के तमाम अभियानों के बाद भी अब तक यह, राज्यों के राजनीतिक एजेंडा में शामिल नहीं हो पाया है। महिला सशक्तिकरण के नाम पर योजनाओं की डुगडुगी बजाने वाले सरकारों के लिए वैधानिक अधिकारों के बजाय, राजनीतिक योजनाओं को वरीयता देने का तार्किक अर्थ है कि महिलाओं के अधिकारों के लिए अभी लंबा संघर्ष शेष है।
- ज्योत्सना अनूप यादव