03-Apr-2020 12:00 AM
5536
श्रीमद्भगवत गीता में जीवन का सार छिपा है। कहा जाता है कि इस ग्रंथ का अध्ययन करने से व्यक्ति को अपने जीवन की सभी समस्याओं का हल मिल सकता है। महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश किसी के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत साबित हो सकते हैं। श्रीकृष्ण की कही गईं बातों का प्रभाव अर्जुन पर ऐसा पड़ा कि वह युद्ध भूमि में फिर से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की तरफ अग्रसर हो गया। वैसे तो गीता में जीवन-मरण से संबंधित बहुत सी बातें बताई गई हैं लेकिन यहां आप जानेंगे गीता की कुछ ऐसी बातें जो आपको अपने जीवन के किसी भी मोड़ पर काम आ सकती हैं।
नाम, पद, प्रतिष्ठा, संप्रदाय, धर्म, स्त्री-पुरुष हम नहीं हैं और न यह शरीर हम हैं। ये शरीर अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा। लेकिन आत्मा स्थिर है और हम आत्मा हैं। आत्मा कभी नहीं मरती है। न इसका जन्म है और न मृत्यु! आत्मभाव में रहना ही मुक्ति है। परिवर्तन संसार का नियम है। यहां सब बदलता रहता है। इसलिए सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान आदि में भेदों में एक भाव में स्थित रहकर हम जीवन का आनंद ले सकते हैं। अपने क्रोध पर काबू रखो। क्रोध से भ्रम पैदा होता है और भ्रम से बुद्धि विचलित होती है। इससे स्मृति का नाश होता है और इस प्रकार व्यक्ति का पतन होने लगता है। क्रोध, कामवासना और भय ये हमारे शत्रु हैं। हमें अपने देखने के नजरिए को शुद्ध करना होगा और ज्ञान व कर्म को एक रूप में देखना होगा, जिससे हमारा नजरिया बदल जाएगा। श्रीमद्भगवत गीता में सफलता का राज छुपा है। जो व्यक्ति गीता के सार को अपने जीवन में आत्मसात कर लेता है वह हर प्रकार के दुखों से मुक्ति पा लेता है। महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन दुविधा में फंस गए तब कुरूक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाया था। श्रीमद्भगवत गीता के उपदेश में जीवन को जीने की कला छिपी हुई है ये कहना गलत नहीं होगा। गीता पढ़ने से मन को शांति मिलती है। गीता अच्छे और बुरे का भेद बताती है। गीता के अनुसार क्रोध व्यक्ति का नाश कर देता है। श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। क्रोध में व्यक्ति अपना नियंत्रण खो देता है। आवेग में उसके द्वारा अनैतिक कर्म भी हो जाता है। क्रोध से दूर रहने के लिए व्यक्ति को प्रेम, ज्ञान और अध्यात्म की शरण में जाना चाहिए। अध्यात्म की शक्ति से व्यक्ति क्रोध पर काबू पा सकता है। प्रेम व्यक्ति को निर्मल बनाता है। जिसने प्रेम की शक्ति को पहचान लिया समझो उसने प्रभु को पा लिया। प्रभु को पाने का एकमात्र सरल रास्ता प्रेम ही है। क्रोध व्यक्ति की बुद्धि को भी नष्ट कर देता है। क्रोध करने से लोग दूर होने लगते हैं। क्रोधी व्यक्ति समाज में अकेला रह जाता है। क्रोध मनुष्य को मानव से दानव की श्रेणी में ले जाता है।
जो लोग कार्य करने से पहले ही परिणाम के बारे में सोचने लगते हैं वह कभी सफल नहीं होते हैं। व्यक्ति को सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए। परिणाम की लालसा मन में नहीं रखनी चाहिए। व्यक्ति को पूरी ईमानदारी और नैतिकता से अपने कार्य को पूरा करना चाहिए। जब कार्य को अनुशासन, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से पूर्ण किया जाता है तो उसके परिणाम भी अच्छे आते हैं। इसलिए व्यक्ति को कार्य की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा करते हैं वह कभी दुखी नहीं रहते हैं। क्रोध करने से बचना चाहिए। क्योंकि क्रोध करने से व्यक्ति असुर बन जाता है। क्रोध करने पर वह अच्छे बुरे का अंतर भूल जाता है। क्रोध पर नियंत्रण करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने क्रोध पर नियंत्रण करना सीख लिया वही महानता की ओर अग्रसर हुआ है।
जो व्यक्ति सदैव दूसरों की वस्तुओं पर ललचाता रहता है ऐसा व्यक्ति कभी खुश नहीं रह सकता है। लालच का परित्याग करना चाहिए। यह एक मानसिक बीमारी है जो एक दिन व्यक्ति के सामाजिक पतन का कारण बन जाती है। जो आया है वह जाएगा। जिसने जन्म लिया है उसके मृत्यु का भी दिन सुनिश्चित है। इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए। मनुष्य के रूप में जन्म लेने के बाद भी मेरा तेरा, अपना पराया में जो लोग फंसे रहते हैं उनका जीवन व्यर्थ है। मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्राप्त हुआ है। जिसने इसके महत्व को पहचान लिया वही अमर हो गया। जो व्यक्ति सभी को साथ लेकर चलते हैं ऐसे लोग समाज में सम्मान तो पाते ही हैं साथ ही साथ उनका अनुसरण भी किया जाता है। यह भाव निस्वार्थ होना चाहिए। इसमें कोई लालच नहीं होना चाहिए। लालच में यह भाव बदल जाएगा। जिसके चलते वह परिणाम नहीं आएंगे जिसकी कल्पना की है। स्वच्छता शरीर के बाहर की नहीं अंदर की भी होनी चाहिए। मन की स्वच्छता बहुत जरूरी है। जब तक मन साफ नहीं है, सोच अच्छी नहीं और भाव सुंदर नहीं है तब तक पूरी तरह से स्वच्छ नहीं माने जाओगे।
श्रीमद्भगवत गीता में जीवन का सार छुपा हुआ है, अगर कोई व्यक्ति गीता के ज्ञान को अपने जीवन में उतार ले तो वो किसी भी परिस्थिति का सामना डटकर कर सकता है और ऐसे व्यक्ति को कोई नहीं हरा सकता है। गीता के पूर्ण ज्ञान को अपने जीवन में उतारना हर किसी के बस की बात नहीं है लेकिन गीता के कुछ उपदेश ऐसे हैं जिन्हें हर व्यक्ति को अपनाना चाहिए। अगर व्यक्ति गीता के इस प्रमुख उपदेशों को अपने जीवन में शामिल कर लेता है तो उसे जीवन की हर समस्या का हल मिल जाता है और उसका जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है।
- ओम