07-Oct-2020 12:00 AM
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राजस्थान खनन माफिया की जागीर बनता जा रहा है। सरकारों के संरक्षण में यहां हमेशा से माफिया का बोलबाला रहा है। शासन-प्रशासन उनके सामने नतमस्तक नजर आते हैं। यहां हमेशा माफिया का खूनी खेल चलता रहता है। माफिया की दहशतगर्दी का इससे बड़ा सुबूत और क्या होगा कि जहां कहीं भी उन्हें रोका गया, उन्होंने खून की नदियां बहाने में एक पल की भी देरी नहीं की। अलवर में बार्डर होमगार्ड की नृशंस हत्या और जालोर में पिता, पुत्र, पुत्री को ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचलने की हाहाकारी घटनाएं प्रतीकात्मक रूप से एक भयावह सच्चाई को उजागर कर रही थी कि राज्य की बागडोर अब माफिया सरदारों के हाथों में पहुंच गई है। अलवर में खनन माफिया के दुस्साहस की पराकाष्ठा थी कि पहले तो रोके जाने पर होमगार्डों को ट्रैक्टर-ट्रॉली चढ़ाकर एक गार्ड की हत्या कर दी। फिर बजरी माफिया के गुंडे पत्थर बरसाकर भाग निकले। जालोर के खायला कस्बे में अवैध बजरी ले जा रहे ट्रैक्टर ने रोक-टोक किए जाने पर एक परिवार को ही कुचल दिया। पिछले पांच साल में माफिया के बढ़ते शिकंजे में कितने लोग जान गंवा चुके हैं। इसके आंकड़े ही चौंका देते हैं।
जल, जंगल और पर्वतों को खोखला करने वाले गिरोहबंद बेखौफ खिलाड़ियों की दस्तक को क्या अनसुना किया जा रहा है? सरकार इस मामले में सफाई देते हुए नहीं थकती कि पिछले तीन साल में बजरी माफिया से 100 करोड़ का जुर्माना वसूला जा चुका है। लेकिन साथ ही बुझे मन से प्रशासन अपराधीकरण को भी स्वीकार करता है कि माफिया के हौसले बुलंद हैं। इस मामले में सरकार द्वारा तैयार करवाई गई एक रिपोर्ट अवैध खनन की मोटी तस्वीर तो बयां करती है, लेकिन रिपोर्ट में इस खेल को रोकने की कोशिशों की स्पष्ट तस्वीर का जिक्र तक नहीं है। खनन मंत्री प्रमोद जैन भाया यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से भागते हुए नजर आते हैं कि 'यह कैंसर तो हमें पिछली भाजपा सरकार ने दिया है। हमें तो इसे जबरन भोगना पड़ रहा है।
भाया यह कहते हुए अपनी परवशता जताते हैं कि इस कैंसर का इलाज आसान नहीं है। हालांकि उन्होंने माफिया को नेस्तोनबूद करने के लिए यह कहते हुए नई नीति लाने का जिक्र भी किया कि एक सीमा तक खनन में वैधता निर्धारित कर दी जाए, ताकि यह खेल थम सके। लेकिन जानकार सूत्रों का कहना है कि इस तरह के बयान तो खनन मंत्री की लफ्फाजी के सिवाय कुछ नहीं है। सवाल है कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि पूरा खेल राजनीतिक संरक्षण और विभागीय अफसरों की मिलीभगत पर टिका है। भाजपा नेता इसका पूरा दोष सन् 2013 के दौरान सत्ता में रही कांग्रेस सरकार पर मढ़ते हैं कि यह नौबत तो तत्कालीन गहलोत सरकार की नीतियों का नतीजा है। खनन कारोबारी कुछ और ही पीड़ा बयां करते हैं। उनका कथन सरकार की मंशा को ही कटघरे में खड़ा करता है कि अवैध खनन रोकने के लिए बनाए गए 80 चैक पोस्ट हटाने का क्या मतलब था? खनन महकमे के भविष्य को लेकर दो धारणाएं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस मंत्रालय को ही समाप्त कर देना चाहिए। इसके कलुषित इतिहास को देखते हुए इससे बड़ा कोई विकल्प नहीं हो सकता।
बजरी खनन के अवैध खेल को लेकर मंत्रीजी का तर्क है कि इस बाबत तो केंद्र सरकार ही कोई नीति बनाए, तो बेहतर होगा। लेकिन सवाल है कि बजरी खनन के लालबाग में मजे करने वाला माफिया क्या किसी भी नीति को सफल होने देगा? परजीवी किस्म का माफिया क्यों नई पाबंदियों को चलने देगा? विशेषज्ञों का कहना है कि बजरी माफिया पर शिकंजा कसने की ताकत ही जब छीज रही हो, तो कोई कानून क्या कर लेगा? पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने बजरी माफिया के बुलंद होसलों पर राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए जवाब तलबी की, कि 'अवैध बजरी खनन रोकने के लिए क्या किया? चार हफ्ते में बताए सरकार।Ó बीती फरवरी में जारी किए गए इस आदेश को 6 महीने गुजर चुके हैं। लेकिन सरकार ने क्या किया? 100 करोड़ का जुर्माना वसूला और 30 हजार वाहनों को जब्त किया। किन्तु बजरी खनन तो नहीं थमा। बजरी माफिया कितना ताकतवर है? इसकी तफतीश करें तो, तस्करी के तार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश हरियाणा-दिल्ली तथा गुजरात और महाराष्ट्र तक जुड़े हैं। अरावली के खत्म होते पहाड़ों की तस्वीर पर हैरानी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि 'क्या इन पहाड़ों को हनुमान जी उठा ले गए?Ó
समितियां बेअसर
बजरी माफिया को बेकाबू करने के नाम पर अब तक समितियां बनती रही हैं और बैठकें होती रही हैं। लेकिन समितियों में शामिल अफसर बजरी माफिया की आहटों को सुनने तक को तैयार नहीं है। बजरी माफिया के हौसले बुलंद हैं और वो पूरी गिरोहबंदी के साथ सरकारी फौज पाटे से दो-दो हाथ करने को तैयार लगता है। इस मुहाने पर खान महकमा क्या कर रहा है? कोई खबर नहीं है। हैरत की बात है कि पिछली भाजपा सरकार की मुखिया वसुंधरा राजे ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाते हुए रेत खनन पर लगाए गए प्रतिबंध में कुछ रियायतें देने की याचिका लगाई थी। लेकिन विद्वान न्यायाधीश लाकोर ने दोहराया कि 'पारिस्थितिकी पर खनन के प्रभाव तथा रेत की फिर से भराई की दर के वैज्ञानिक आंकलन के बाद ही खनन की अनुमति दी जाए।Ó लेकिन यह आदेश खनन और निर्माण क्षेत्र में सक्रिय परिवारों को प्रभावित करने वाला साबित हुआ। नतीजतन रेत और बजरी के दाम आसमान छूने लगे। यहां सर्वोच्च न्यायालय के 2012 में दिए गए आदेशों का जिक्र करना भी प्रासंगिक होगा। इसमें कहा गया था कि 'बालू रेत के खनन से जुड़ी एक नीति बनाई जाए, जिसमें पर्यावरण की मंज़ूरी, उसकी निगरानी और लीज से जुड़े अन्य जरूरी प्रावधान भी शामिल किए जाएं। खनन का अधिकार इसी नीति के तहत दिया जाए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी के बावजूद सरकार ढीली-ढाली ही बनी रही। अलबत्ता सरकारी अफसर इस मामले में लीपापोती ही करते रहे कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पालन करने का पूरा प्रयास कर रही है।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी