केवल 2 फीसदी को 100 दिन काम
20-Nov-2020 12:00 AM 1260

 

कोविड-19 के दौरान हुए श्रमिकों के पलायन के कारण देश में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। कोरोना के कारण बड़ी संख्या में श्रमिक गांवों में पहुंचे हैं। बेरोजगार हो चुके इन श्रमिकों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराने का दावा सरकार द्वारा किया गया। लेकिन मनरेगा की हकीकत सामने आने के बाद यह खुलासा हुआ है कि देशभर में मनरेगा के तहत केवल 2 प्रतिशत लोगों को ही 100 दिन का रोजगार उपलब्ध हो पाया है।

कोरोनाकाल में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना को काफी महत्व मिला। राज्य सरकारों ने दावा किया कि ग्रामीणों और गांवों में लौटे प्रवासियों को मनरेगा के तहत काफी काम दिया गया, लेकिन मनरेगा के अब तक आंकड़े बताते हैं कि साल 2020-21 में इस योजना के तहत बेशक 6.26 करोड़ परिवारों को काम दिया गया, लेकिन 100 दिन का काम 13,53,994 (2.16 प्रतिशत) परिवारों को ही मिल पाया है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के पोर्टल रुरल दीक्षा के मुताबिक, औसतन 199.12 रुपए प्रतिदिन दी गई। वहीं एक परिवार ने औसतन 38.24 दिन का काम दिया गया। यानी कि एक परिवार को अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक सात माह के दौरान औसतन केवल 7,000 रुपए ही मिले। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनरेगा का यह पैसा ग्रामीणों और प्रवासियों के कितने काम आया होगा।

मनरेगा के लिए केंद्र की ओर से 26 अक्टूबर तक 68 हजार 298 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। हालांकि बजट लगभग 72,658 करोड़ रुपए का है। लेकिन जो रकम केंद्र जारी कर चुका है, उसमें से 91.55 प्रतिशत यानी 66,521 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इसमें लगभग 48,212 करोड़ रुपए मजदूरी पर खर्च किए गए हैं। शेष 25.46 फीसदी राशि मटेरियल और स्किल्ड वेज पर खर्च की गई है और 2.76 फीसदी राशि प्रशासनिक खर्च है। इस तरह एक व्यक्ति पर 263.73 रुपए खर्च किए गए हैं। हालांकि प्रति व्यक्ति मजदूरी 199.12 रुपए दी गई है।

मनरेगा के तहत इस साल अब तक जो काम हुए हैं, उनमें सबसे अधिक कृषि एवं कृषि से जुड़े कार्यों पर खर्च किया गया है। इस मद में 71.41 प्रतिशत खर्च किया गया है। अब तक 1.29 लाख काम पूरे हो चुके हैं, जबकि 1.75 लाख काम चल रहे हैं। अब तक 17.50 करोड़ जॉब कार्ड जारी हो चुके हैं, लेकिन इनमें 8.90 करोड़ जॉब कार्ड एक्टिव हैं। एक्टिव वर्कर्स की संख्या 13.80 करोड़ है, हालांकि पिछले सात महीनों में 9 करोड़ 59 हजार वर्कर्स को ही काम दिया गया।

लॉकडाउन के बाद मनरेगा में काम मांगने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई थी और लगभग सभी राज्य सरकारों ने ग्रामीणों और प्रवासियों को मनरेगा का काम देने का दावा किया था। जून में सबसे अधिक काम की मांग की गई। इस महीने 4.47 करोड़ लोगों ने काम मांगा था, लेकिन इसके बाद वर्क डिमांड घटी और अक्टूबर में यह लगभग आधी रह गई। अक्टूबर में 2.28 करोड़ लोगों ने काम की मांग की।

वर्तमान लोकसभा सत्र में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि लॉकडाउन के कारण मनरेगा में इस वर्ष 22.49 करोड़ लोगों ने रोजगार मांगा है जो पिछले वर्ष के मुकाबले 38.79 प्रतिशत ज्यादा है। पिछले वर्ष काम मांगने वालों की संख्या 16.2 करोड़ थी। उन्होंने आगे कहा कि इस वर्ष 8.29 करोड़ लोगों को मनरेगा से रोजगार दिया जा चुका है। केंद्र सरकार ने मनरेगा का इस वर्ष 2020-2021 का बजट 61,500 करोड़ बनाया था। केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोरोनाकाल में जारी आर्थिक पैकेज में मनरेगा को 40 हजार करोड़ की अतिरिक्त मदद दी है। जिससे ये आंकड़ा एक लाख करोड़ के पार जा सका है।

कुछ राज्यों से तो 200 दिन के रोजगार की जोरशोर से मांग उठाई जा रही है। इसमे राजस्थान सबसे मुखर है। विभिन्न राज्य सरकारें ढोल पीट रही हैं कि उन्होंने मनरेगा कार्यों के जरिए लोगों की समस्याओं का समाधान कर दिया है। ये बात सही है कि कोरोनाकाल के समय मनरेगा के जरिए लोगों के हाथ में कुछ रुपया आ सका जिससे उनको कुछ सहूलियत मिली लेकिन ये कहना कि इससे सभी समस्याओं का समाधान हो गया है ये सही नहीं है। सवाल यहां ये है कि क्या केवल रुपए देना ही मनरेगा का उद्देश्य है? क्या समस्या मात्र इतनी ही थी? यदि ऐसा था तो फिर इसका सबसे सरल और भरोसेमंद तरीका तो कैश ट्रांसफर है। किंतु सरकार ने ऐसा तो नहीं किया। उसने तो रुपए सीधे ट्रांसफर नहीं किए।

मतलब समस्या कुछ और थी, दावा कुछ ओर है। विभिन्न राज्य सरकारों का दावा है कि उन्होंने मनरेगा कार्यों के जरिए न केवल लोगों को रोजगार दिया बल्कि ग्रामीण जीवन का उत्थान किया है। इसके साथ महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय, पारिस्थितिकी प्रबंधन, अवसंरचना विकास और कौशल निर्माण के जरिए मानव संसाधन का प्रबंधन किया है। दूसरी तरफ पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकताओं, लोक संस्कृति के संरक्षकों और नीति निर्माताओं के एक धड़े का कहना है कि मनरेगा ने समाज में इतने गड्ढ़े कर दिए हैं जिनको भरने में हमारी न जाने कितनी पीढियां खप जाएंगी। मनरेगा ने हमारी पारिस्थितिकी, लोक कला एवं संस्कृति, सामूहिकता के दर्शन को समाप्त किया है और भ्रष्टाचार के नए-नए रूपों को हमारे आचरण का हिस्सा बनाया है।

हम राज्य सरकारों के एक-एक दावे की पड़ताल करते हैं और देखते हैं कि ये दावे किस हद तक सही हैं? क्या वाक्य में ही मनरेगा ने ग्रामीण जीवन को बदला है? क्या मनरेगा ने सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण के सपने को बल दिया है? क्या मनरेगा ने पारिस्थितिकी प्रबंधन और मानव संसाधन का विकास किया है?

मनरेगा के जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार उप्र ने 78 लाख परिवारों के 95 लाख व्यक्तियों को मनरेगा में कार्य दिया है। राजस्थान सरकार का दावा है कि कोरोना के दौरान उन्होंने 64.8 लाख परिवारों के 89.91 लाख व्यक्तियों को रोजगार दिया है। गुजरात सरकार की रिपोर्ट बताती है कि उन्होंने 9.43 लाख परिवार के 16 लाख लोगों को रोजगार दिया है जबकि हरियाणा सरकार के जारी आंकड़ों के अनुसार उन्होंने 3.25 लाख परिवारों के 4.59 लाख व्यक्तियों को काम दिया है।

मनरेगा का जहां पर कार्य चलता है उसे मनरेगा साइट कहा जाता है। एक मनरेगा साइट पर करीब 60-70 या 80 लोग काम करते हैं। इन लोगों को मनरेगा श्रमिक कहा जाता है। प्रत्येक 40 मनरेगा श्रमिक पर एक मनरेगा 'मेट’ नियुक्त किया जाता है। मनरेगा मेट का काम मनरेगा साइट पर छायां और पीने के पानी की व्यवस्था देखना, सभी मजदूरों को दिए गए कार्य का बराबर बंटवारा करना, जोहड़-तालाब की छंटाई करनी है तो सभी मनरेगा श्रमिकों को बराबर गड्ढ़े नांपकर देना और मस्ट रोल (मनरेगा कार्य की पुस्तक) में उनकी हाजिरी लगाना है।

मनरेगा मेट बनने के लिए यदि कोई महिला दलित या आदिवासी है तो उसे पांचवीं पास, सामान्य और अन्य पिछड़े वर्ग की महिला को आठवीं पास होना अनिवार्य है जबकि पुरुष के लिए 10वीं पास होना आवश्यक है। राजस्थान सरकार के आंकड़ों के अनुसार 89.91 लाख लोगों ने मनरेगा में कार्य किया। हमें ये पता है कि 40 लोगों पर एक मनरेगा मेट नियुक्त होता है। इस लिहाज से अकेले राजस्थान में करीब 2.20 लाख मेट नियुक्त हुए। उप्र के जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार 95 लाख लोगों ने मनरेगा श्रमिक के रूप में कार्य किया। इस लिहाज से वहां करीब 2.37 लाख मनरेगा मेट बने। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार वहां 16 लाख मजदूरों में करीब 40 हजार मेट बने और हरियाणा सरकार के आंकड़ों के अनुसार 4.59 लाख मनरेगा मजदूरों में करीब 11 हजार मेट नियुक्त हुए।

सरकारों ने कहा कि मनरेगा से महिला सशक्तिकरण हुआ है किंतु किसी भी राज्य सरकार ने अपने आंकड़ों में ये नहीं बताया कि आखिर उनके यहां कितनी महिलाओं को मनरेगा मेट के रूप में कार्य करने दिया? राजस्थान सरकार ये नहीं बताती की उसके यहां 2.20 लाख मनरेगा मेट में कितनी महिलाएं मेट बन सकीं? क्या 30 फीसदी महिलाओं को भी मेट बनाया गया? 30 फीसदी छोड़िए। क्या 10 फीसदी महिलाओं को भी मनरेगा मेट के रूप में नियुक्त किया गया? उप्र में नियुक्त 2.30 लाख मनरेगा मेट में कितनी महिलाओं को मेट की भूमिका दी? क्या 10 हजार महिलाओं को भी मेट बनाया? ऐसे ही गुजरात और हरियाणा में 40 हजार और 11 हजार मेट में कितनी महिलाओं को मेट की भूमिका मिली?

यहां एक बात ध्यान रखने की है। हम महिला को महिला ही मान रहे हैं। उसे दलित, आदिवासी या अन्य पिछड़े वर्ग में नहीं जोड़ रहे हैं। यदि दलित महिला, आदिवासी महिला, अन्य पिछड़े वर्ग की महिला के मनरेगा मेट के रूप में भूमिका को देखना हो तो शायद ये आंकड़ा महज 2-4 महिलाओं तक सीमित होकर रह जाए। राजस्थान समग्र सेवा संघ के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गोस्वामी इस विषय पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हम महिला को क्या मानते हैं? जो महिला चिलचिलाती धूप में मनरेगा में गड्ढ़े खोद सकती है। दिसंबर और जनवरी के महीनों में खेत में पानी दे सकती है। क्या वो महिला गड्ढ़े नापकर नहीं दे सकती? जो महिला घर-परिवार, पशुधन और खेत-खलिहान को संभाल सकती है। क्या वो मनरेगा साइट पर पानी और छायां की व्यवस्था नहीं कर सकती?

दावे और हकीकत में अंतर

विभिन्न राज्य सरकारों का दावा है कि मनरेगा ने सामाजिक न्याय व उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके जरिए सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े व गरीब लोगों के उत्थान में मदद मिली है। सुनने में तो ये दावा भी पहले वाले दावे जैसा ही लगता है। शायद उस दावे से ज्यादा गहराई को समेटे हुए है। जब इस दावे की पड़ताल करते हैं तो कुछ और ही दिखलाई पड़ता है। निसंदेह उत्थान तो हुआ है, किंतु किसका हुआ है? क्या पेंशनधारियों, सरकारी मुलाजिमो, हॉलसेल के कारोबारी और बड़े-बड़े खेतों के मालिकों को उत्थान की आवश्यकता है? सामाजिक न्याय व उत्थान के नाम पर चल तो यही रहा है। इस विषय को कुछ उदाहरणों के जरिए समझने का प्रयास करते हैं। राजस्थान के बूंदी जिले में पेंच की बावड़ी ग्राम पंचायत के अंतर्गत मनरेगा का कार्य संपन्न हुआ है। इस पंचायत के अंतर्गत दलित, आदिवासी, घुमंतू, गुर्जर व ब्राह्मण समाज के लोग रहते हैं। इस पंचायत में कलंदर-मदारी समुदाय के करीब 50 लोग रहते हैं। जो पहले बंदर-भालू का खेल तमाशा दिखाकर अपना घर-परिवार चलाते थे। इनके पास कोई जोतने की जमीन नहीं है और न ही कोई सरकारी नौकरी। इसमें मात्र तीन लोगों को मनरेगा के अंतर्गत रोजगार दिया गया वो भी मात्र एक मस्ट रोल का (13 दिन के लिए)। 

महिला सशक्तिकरण के दावे खोखले साबित हुए

सरकारों ने कहा कि मनरेगा से महिला सशक्तिकरण हुआ है किंतु किसी भी राज्य सरकार ने अपने आंकड़ों में ये नहीं बताया कि आखिर उनके यहां कितनी महिलाओं को मनरेगा मेट के रूप में कार्य करने दिया? सरकारों ने ये तो कहा कि महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मनरेगा में कार्य किया है। लेकिन वे ये नहीं बताते की उस कंधे से कंधा मिलाने में क्या मजदूर ही बनाकर रखा या मेट के रूप में नेतृत्व करने का मौका भी दिया? राजस्थान में आदिवासियों के जीवन को संहिताबद्ध करने में लगी फोटोग्राफर और कार्टूनिस्ट अंजली का कहना है कि हमने बहुत बड़ा मौका गवां दिया। मनरेगा मेट वो कड़ी है जहां महिला को नेतृत्व करने का मौका दिया जा सकता था। उसके साहस को उभारा जा सकता था। इससे समाज में सहज तरीके से उसकी भूमिका में बदलाव आता। 

- दिल्ली से रेणु आगाल

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