20-Nov-2020 12:00 AM
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भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय बेहद जरूरी है। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि केंद्र की भाजपानीत एनडीए सरकार का राज्यों की अन्य पार्टियों की सरकार से समन्वय स्थापित नहीं हो पा रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि राज्यों का विकास तो प्रभावित हो ही रहा है, साथ ही राज्यों की आर्थिक स्थिति भी कमजोर होती जा रही है।
आखिर केंद्र और राज्यों के बीच शून्य की एक स्थिति पैदा हो गई है। कारण यह है कि मजबूत केंद्र शायद राज्यों के प्रति अपने दृष्टिकोण में सहभागिता की भूमिका से दूर चला गया है और इसका नतीजा राज्यों में केंद्र के प्रति सम्मान की कमी के रूप में सामने आया है। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ बहुतायत में प्रतिरोध है। महाराष्ट्र सरकार का बिना उसकी मंजूरी के सीबीआई जांच के फैसले पर रोक लगाना इसका एक उदाहरण है। पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड तथा केरल जैसे प्रदेशों में इस बात को लेकर केंद्र के प्रति विकट नाराजगी है कि केंद्र सरकार राज्यों को जीएसटी की क्षतिपूर्ति के लिए अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने में विफल रही है।
पंजाब, जो केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र है; ने विधानसभा में केंद्रीय कानूनों को नहीं मानने के लिए बाकायदा प्रस्ताव पास किया है और अपने स्तर पर तीन विधेयक पास किए हैं। यह इस बात का संकेत है कि राज्य इस मसले पर लंबी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर चुका है; भले ही उसे भी अपने ये विधेयक पास करने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी की जरूरत रहेगी। पंजाब के इन विधेयकों में एमएसपी से नीचे की उपज की बिक्री या खरीदी करने पर कम से कम तीन साल की कैद का प्रावधान है। राज्य इस कानून के अधीन समवर्ती सूची के तहत लागू केंद्रीय कानूनों में संशोधन कर सकते हैं। हालांकि उन्हें इसके लिए राष्ट्रपति की सहमति लेनी होगी, क्योंकि इसके बगैर यह कानून लागू नहीं हो सकते।
वास्तव में केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधारों के प्रस्ताव के नाम पर अध्यादेशों का मार्ग अपनाने के बाद से केंद्र व राज्यों में विश्वास की कड़ी टूटी है। इसके बाद बिहार के विधानसभा चुनाव में वहां के लोगों को मुफ्त में कोरोना का टीका (वैक्सीन) देने के भाजपा के वादे ने अन्य राज्यों में आक्रोश पैदा किया है। उनका मानना है कि भाजपा ने ऐसा करके सिर्फ चुनाव जीतने के लिए एक महामारी की आड़ लेकर अनैतिक रूप से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की है। यही नहीं, केंद्र और राज्य के संबंधों में एक और खराब मोड़ तब आया, जब उद्धव ठाकरे की महाराष्ट्र सरकार ने सीबीआई की किसी भी जांच के लिए राज्य की अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया।
केंद्र और राज्य दोनों ही संविधान से अपने अधिकार प्राप्त करते हैं। आजादी के पहले चार दशक के दौरान हमने केंद्र और राज्यों के अच्छे संबंधों के तौर पर एक मजबूत केंद्र और अब की अपेक्षा शानदार राज्य भी देखे हैं। इसके बाद 1989 से 2014 के बीच गठबंधन युग के चलते क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के साथ एक कमजोर केंद्र और मजबूत राज्य सामने आए। 2014 के बाद एक मजबूत केंद्र का उदय हुआ और राज्य फिर कमजोर दिखने लगे। लेकिन इन दिनों केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन छिन्न-भिन्न हुआ है; क्योंकि पश्चिम बंगाल, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल समेत कई बड़े राज्य विपक्ष के पास हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी केंद्र और राज्यों की सरकारों को एक निश्चित सीमा की स्वतंत्रता का आश्वासन देने के लिए सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व और परस्पर-निर्भरता दिखाने पर जोर दिया है। पिछले काफी समय तक हमने अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार में भी काफी तनातनी देखी। बाद में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने दोनों सरकारों के बीच सत्ता के टकराव पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। समय आ गया है जब केंद्र और राज्य, दोनों सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए अपने-अपने दृष्टिकोणों का पुनर्निरीक्षण करें; ताकि संघीय मतभेदों से संवैधानिक संकट जैसी स्थिति न बन जाए।
केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति बनाते हुए उनके लगभग सभी अप्रत्यक्ष करों को समाहित करते हुए जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर के नाम से एक कर 2017 के जुलाई माह से लागू कर दिया गया। गौरतलब है कि जीएसटी लागू होने के बाद इस कर से होने वाले संपूर्ण राजस्व के दो बराबर के हिस्से होते हैं। इसमें से एक हिस्सा केंद्र सरकार के पास आता है और दूसरा राज्यों के पास। वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर केंद्र के सभी करों में राज्यों का हिस्सा निश्चित होता है। वर्तमान में यह हिस्सा 42 प्रतिशत है। यानी जीएसटी की कुल प्राप्तियों में से 71 प्रतिशत हिस्सा राज्यों के पास जाता है। जिस समय जीएसटी प्रणाली लागू की गई थी, राज्यों में यह चिंता व्याप्त थी कि नई प्रणाली में उनका राजस्व घट सकता है, इसलिए कई राज्य जीएसटी प्रणाली के लागू होने का विरोध कर रहे थे। ऐसे में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक फार्मूला लागू किया, जिसके अनुसार राज्यों को उनके उन करों से प्राप्त आमदनियों को न केवल जीएसटी में राज्यों के हिस्से में सुनिश्चित किया जाएगा, बल्कि उनमें हर वर्ष 14 प्रतिशत की वृद्धि की भी गारंटी होगी। ऐसी व्यवस्था 5 वर्ष तक चलेगी।
केंद्र सरकार की यह अपेक्षा थी कि जीएसटी एक महत्वपूर्ण कर सुधार है और इससे न केवल कर एकत्रीकरण में कुशलता बढ़ेगी, बल्कि इससे करों की चोरी भी थमेगी और करों के कारण बिना वजह कीमत बढ़ने (कासकेडिंग इफेक्ट) जैसी स्थिति भी समाप्त होगी। इसका अभिप्राय यह होगा कि एक ओर कर राजस्व बढ़ेगा तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं को भी इस व्यवस्था का लाभ होगा, क्योंकि इससे कीमतें भी कम होंगी। हालांकि जीएसटी को व्यवस्थित होने में थोड़ा समय लगा, और जीएसटी से कुल प्राप्तियां घटती-बढ़ती रहीं।
जहां सरकार की यह अपेक्षा थी कि हर महीने जीएसटी से कुल प्राप्तियां कम से कम एक लाख करोड़ रुपए रहेंगी, दिसंबर 2019 तक के जीएसटी के 30 महीनों में से सिर्फ 9 महीनों में ही एक लाख करोड़ रुपए या उससे ज्यादा की जीएसटी की प्राप्तियां हुई। इसका एक प्रमुख कारण देश में अपेक्षा से कम जीडीपी ग्रोथ था। स्वाभाविक तौर पर इसके कारण, खासतौर पर वर्ष 2019 में केंद्र सरकार पर अपने वचन के अनुसार राज्यों की भरपाई के कारण बोझ बढ़ गया।
गौरतलब है कि जीएसटी पर एक सेस लगाकर केंद्र सरकार ने राज्यों के नुकसान की भरपाई का निश्चय किया। वर्ष 2017-18 में यह भरपाई 41,146 करोड़ रुपए और 2018-19 में 69,275 करोड़ रुपए की रही। वर्ष 2019-20 में हालांकि जीएसटी की औसतन प्राप्तियां लगभग एक लाख करोड़ रुपए की रही, लेकिन राज्यों के राजस्व की भरपाई की अपेक्षा पिछले साल से भी ज्यादा हो गई। पिछले वर्ष का बकाया अभी बाकी था, कि नए वित्तीय वर्ष 2020-21 के पहले ही माह से जीएसटी की प्राप्तियां कोरोना महामारी के चलते नीचे जाने लगी। हम देखते हैं कि अप्रैल माह में जीएसटी की कुल प्राप्ति 32,172 करोड़ रुपए, मई माह में 62,152 करोड़ रुपए, जून में 90,917 करोड़ रुपए, जुलाई में 87,422 करोड़ रुपए और अगस्त माह में 86,449 करोड़ रुपए और सितंबर माह में 95,480 करोड़ रुपए रही। हालांकि कोरोना महामारी में लॉकडाउन के कारण जीएसटी राजस्व प्रभावित होने के बाद, अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के साथ-साथ राजस्व पुन: पटरी पर लौट रहा है, लेकिन राजस्व के नुकसान के बावजूद केंद्र के वचन के अनुसार राज्यों की भरपाई करना केंद्र का दायित्व बना हुआ है। चूंकि केंद्र के पास भी राजस्व घटा है, लिहाजा वह भी भरपाई करने में स्वयं को असमर्थ पा रही है। इन परिस्थितियों के संदर्भ में बीते माह ही जीएसटी काउंसिल की बैठक संपन्न हुई, लेकिन इस हेतु मतैक्य के साथ समाधान नहीं हो सका। उल्लेखनीय है कि चालू वित्तीय वर्ष में 2.35 लाख करोड़ रुपए के राजस्व की कमी रहेगी। केंद्र सरकार ने राज्यों को यह सुझाव दिया है कि इस कमी को पूरा करने के लिए वे उधार लेना शुरू करें, लेकिन सभी राज्यों में इस बाबत सहमति नहीं बन पाई है।
केंद्र के रवैए से खफा हैं कैप्टन
कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार से पंजाब में बढ़ते संकट की ओर ध्यान देने की अपील की थी। समस्या का समाधान करने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री ने 21 अक्टूबर को राष्ट्रपति भवन को पत्र भेजकर मीटिंग का समय मांगा था। 29 अक्टूबर को ज्ञापन के जवाब में सीएमओ के मीटिंग के आग्रह को इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि प्रांतीय संशोधन बिल अभी राज्यपाल के पास लंबित पड़े हैं। इस रवैए से कैप्टन काफी नाराज हैं। प्रदेश के दो मंत्रियों ने भी रेलवे और वित्त मंत्रालयों से मालगाड़ियों के निलंबन व जीएसटी बकाया की अदायगी न होने के मामले में चर्चा के लिए समय मांगा था, लेकिन उन्हें भी मंत्रियों ने समय नहीं दिया। कैप्टन ने कहा कि पंजाब में पहले की तरह बिजली आपूर्ति बहाल करने के लिए हमने नेशनल ग्रिड से बात की, लेकिन समाधान नहीं हुआ। पंजाब को नेशनल ग्रिड का 10 हजार करोड़ रुपए देना है। मार्च से जीएसटी का पैसा भी नहीं मिला है। केंद्र सरकार भेदभाव कर रही है।
भाजपा गठबंधन से इतर दलों के राज्य सरकारों की अलग राय
गौरतलब है कि जो 21 राज्य उधार लेने के लिए तैयार हैं, उन्होंने भी प्रथम विकल्प पर ही हामी भरी है। लेकिन भाजपा गठबंधन से इतर दलों की सरकारों के वित्त मंत्री उसके लिए भी तैयार नहीं हैं। समझना होगा कि वर्तमान में जब सभी प्रकार के राजस्व कम हो रहे हैं और केंद्र सरकार का राजस्व भी न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है, तो ऐसे में केंद्र सरकार से यह उम्मीद करना कि राज्यों के राजस्व की क्षतिपूर्ति तुरंत हो सकेगी, सही नहीं होगा। वैसे भी राज्यों के जीएसटी के हिस्से की क्षतिपूर्ति पूर्व में भी सेस के माध्यम से ही होती रही है। ऐसे में चूंकि राज्यों के राजस्व की क्षतिपूर्ति हेतु लिए गए ऋणों के ब्याज और मूल दोनों की अदायगी उसी सेस से ही होनी है, तो राज्यों को इसका कोई नुकसान नहीं होगा। केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ती असहमति के बीच केंद्र सरकार ने एक घोषणा की है, जिसके अनुसार राज्यों को 12 हजार करोड़ रुपए के बिना ब्याज के 50 वर्षीय ऋण उपलब्ध कराया गया है। इसका उपयोग वे अपने राज्यों में पूंजीगत व्यय बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन और अर्थव्यवस्था पर पड़े प्रतिकूल प्रभाव के कारण उत्पन्न परिस्थितियों का सभी को मिलकर सामना करना पड़ेगा। केंद्र सरकार ने राज्यों को राजस्व की भरपाई का एक अच्छा विकल्प दिया है, जिसे कई राज्यों ने स्वीकार भी किया है। यह उम्मीद की जा सकती है कि सभी के लिए स्वीकार्य एक समाधान, शायद आने वाले दिनों में संभव हो सकेगा।
- इन्द्र कुमार