जोश और जुनून भर देने वाला कप्तान!
21-Jul-2020 12:00 AM 3816

 

जुलाई माह में भारतीय क्रिकेट के दो बड़े सितारे सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी जन्मे थे। अस्सी और नब्बे के दशक में पैदा होने वाली पीढ़ी ने अपनी बचपन से जवानी तक क्रिकेट को असल में इन्हीं दोनों की कप्तानी में देखा, समझा और ऐसा जिया कि बस मजा आ गया। भारत में क्रिकेट सिर्फ गेंद और बल्ले की कहानी नहीं है। यह एक्शन, इमोशन, ट्रैजडी और ड्रामा यानी सब का कॉकटेल है। कुछ अतिउत्साही क्रिकेट प्रेमियों के लिए तो यह धर्म भी है। सन् 1983 में भारत क्रिकेट के एक दिवसीय विश्वकप का पहला खिताब जीता चुका था। इसके बाद क्रिकेट को लेकर लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ रही थीं। सन् 1991 के बाद पूरी दुनिया के साथ क्रिकेट का दौर भी फटाफट बदल रहा था। सफेद कपड़ों में खेलते खिलाड़ी अब रंग-बिरंगे कपड़ों में खेलते नजर आने लगे। सैटेलाइट चैनलों के दौर ने क्रिकेट को देखना और भी सुलभ बना दिया। विदेशी दौरों के भी लाइव टेलीकास्ट आने लगे। दर्शकों के दिल ने जितना भी 'मोर’ मांगा उतना 'मोर’ मिलने लगा। सन् 1996 के विश्वकप के सेमीफाइनल में श्रीलंका के हाथों हुई भारत की शर्मनाक हार के बाद तत्कालीन कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी के दिन लदने के संकेत दे रहे थे। बाद में मैच फिक्सिंग के आरोपों ने उनके कैरियर के सूरज को डुबो ही दिया। सन् 1999-2000 तक सौरव गांगुली के कप्तान बनने तक 1983 के क्रिकेट के विश्वकप का विजेता भारत सचिन, द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और अनिल कुंबले सरीखे तमाम प्रतिभावान खिलाड़ियों से तो संपन्न था पर एक ऊर्जावान नेतृत्व की कमी बहुत गहराई से महसूस कर रहा था। ऐसे समय में बंगाल के बाएं हाथ के बल्लेबाज सौरव गांगुली को भारत का कप्तान बनाया गया। सचिन तेंदुलकर के साथ पारी के शुरुआत से ही उनकी आक्रामक बल्लेबाजी की शैली के लोग भारी प्रशंसक थे। दादा की बल्लेबाजी जिसने भी देखी होगी उसे दादा की फास्ट गेंदबाजों को उम्दा और बेमिसाल टाइमिंग के साथ लगने वाले कवर ड्राइव आज भी याद होंगे।

इसी के साथ गेंदबाजों की आंखों में आंखे डालकर फ्रंट फुट पर तीन कदम आगे आकर मैदान के बाहर जाने वाला छक्का दादा के बैटिंग की विशिष्ट पहचान बन गया था। एक प्रतिभावान खिलाड़ी के रूप में दादा को पहचान घरेलू स्पर्धाओं के प्रदर्शन से मिलने लगी थी। बंगाल की तरफ से खेलते हुए सौरव गांगुली ने रणजी ट्रॉफी, दिलीप ट्रॉफी आदि में कई यादगार और प्रभावशाली प्रदर्शन किए। जिसके आधार पर सौरव को वर्ष 1992 में वेस्टइंडीज दौरे के लिए भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल किया गया। इस दौरे में 11 जनवरी 1992 को उन्होंने गाबा में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच खेला। लेकिन कैरियर के लिहाज से यह दौरा उनके लिए फ्लॉप साबित हुआ और दौरे के दौरान उनके खराब बर्ताव के लिए उनकी काफी आलोचना भी हुई थी। इस दौरे के बाद चार साल तक उन्हें राष्ट्रीय टीम में नहीं लिया गया। फिर वर्ष 1996 में सौरव गांगुली का चयन इंग्लैंड दौरे के लिए किया गया। इस दौरे में टेस्ट और वन-डे मैच दोनों खेले गए। यहां भी तीन वन-डे मैच में से सौरव गांगुली को सिर्फ एक वन-डे मैच में खेलने का मौका मिला जिसमें उन्होंने कुल 46 रन बनाए। लेकिन क्रिकेट के इस शूरवीर को अभी अपने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कैरियर का आरंभ अपने प्रकृति के अनुरूप शाही अंदाज में करना था और वह मौका टेस्ट मैच ने दिया 20 जून सन् 1996 को सौरव गांगुली ने इंग्लैंड के ऐतिहासिक लॉर्ड्स के मैदान पर अपने टेस्ट कैरियर का आगाज किया। इस मैच में सौरव ने 131 रनों की शानदार पारी खेली।

आत्मविश्वास से भरे सौरव ने इसी दौरे के अगले मैच में भी शतकीय पारी खेलकर अपनी योग्यता को साबित किया। इस दौरे में उन्होंने एक वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया। अपने पहले दो टेस्ट मैचों में दो सेंचुरी बनाने वाले वह दुनिया के तीसरे बल्लेबाज बन गए। इसके बाद फिर सौरव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1996-97 के दौरान सहारा कप में पाकिस्तान के खिलाफ पांच मैच की सीरीज में चार में मैन ऑफ मैच पाना हो या 1999 के वर्ल्ड कप में द्रविड़ के साथ 318 रनों की मैराथन पार्टनरशिप हो।

सौरव की कप्तानी में भारतीय टीम के जुझारूपन का अप्रतिम उदाहरण 2001 के भारत के दौरे पर आई ऑस्ट्रेलिया के टेस्ट मैचों में अपराजेयता को खंडित करने वाली टेस्ट सीरीज में 2-1 से भारत की जीत हुई। इसी भांति 2003 के विश्वकप के फाइनल तक भारत ने जिस आत्मविश्वास से खेला वह स्मृति आज भी क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में जीवित है। सन् 2000 से सन् 2005 तक का भारतीय क्रिकेट सौरव गांगुली के खेल और कप्तानी में निखरता रहा। 2006 के बाद सौरव गांगुली के कैरियर में उतार आना शुरू हो गया और सन् 2008 में दादा ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा बोल दिया। दादा को सहवाग, हरभजन सिंह, युवराज सिंह और जहीर खान जैसे खिलाड़ियों को तराशने का भी श्रेय है।

दादा के खेल और कप्तानी का सबसे सकारात्मक पक्ष यही था कि उनमें एक टाइगर की भांति जीतने की जिद, जोश और जुनून के हद तक लड़ने की क्षमता थी। यह संयोग नहीं नियति का आशीर्वाद है कि आज जब विराट कोहली की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम विश्व क्रिकेट की सिरमौर है तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष सौरव गांगुली हैं।

बैटिंग में सिद्धस्त और ख्यातिप्राप्त सौरव गांगुली को लोग भारतीय क्रिकेट के उस दौर के रूप में ज्यादा याद करते है जिस दौर में भारत ने वैश्विक क्रिकेट में महाशक्ति बनने के आत्मविश्वास को अर्जित किया। अंतिम बॉल तक जूझने के उस जज्बे को पाया जिसने आज भारतीय क्रिकेट टीम को सुपर पावर टीम के ओहदे पर लाकर खड़ा कर दिया है।

-आशीष नेमा

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