02-Jul-2020 12:00 AM
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रामचरितमानस में एक स्थान पर गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं, 'जेहि का जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू।’ अर्थात् जिसको जिस चीज से सच्चा प्रेम होता है उसे वह चीज अवश्य मिल जाती है। यानी सच्चे मन से चाही गई वस्तु अवश्य प्राप्त होती है।
प्रभु पाने का सबसे बड़ा आधार है प्रेम। प्रेम से हम किसी को पा सकते हैं, अपना बना सकते हैं। इस बात को हम दूसरी तरह से भी कह सकते हैं कि हम जो चीज पाना चाहते हैं उसे मन की गहराई से अथवा सच्चे मन से चाहें। अगर हम सच्चे मन से किसी चीज को चाहेंगे तो वह अवश्य ही उपलब्ध हो जाएगी। प्रेम सच्चा हो तो मिलन में देर नहीं लगती। हमारी सच्ची चाहत ही वस्तुओं अथवा परिस्थितियों को आकर्षित कर उन्हें सुलभ बनाती है। उत्तम स्वास्थ्य अथवा प्रसन्नता भी इसका अपवाद नहीं।
यदि हम अच्छे स्वास्थ्य व प्रसन्नता की कामना करेंगे तो परिस्थितियां अच्छे स्वास्थ्य व प्रसन्नता के अनुकूल होकर हमारी इच्छापूर्ति में सहायक हो जाएंगी। कहा गया है कि शक्करखोरे को शक्कर और टक्करखोरे को टक्कर मिलती है। हम जो कुछ खाना पसंद करते हैं वही बाजार से खरीदकर लाते हैं। जो खरीदकर लाते हैं उसकी स्पष्ट छवि पहले से ही मन में निर्मित कर लेते हैं। यदि ऐसा नहीं करते तो गलत चीज की खरीदारी की संभावना बढ़ जाती है। हम शक्करखोरे बनने की कामना करें न कि टक्करखोरे बनने की। यही चयन हमारी नियति निर्धारित कर हमें योग्य-अयोग्य अथवा सफल-असफल बनाता है। जर्मन भाषी चेक लेखक फ्रांज काफ्का भी लिखते हैं कि उस चीज में शिद्दत से यकीन करना जो है नहीं, पर जिसे बनाना है। सिर्फ वही चीजें नहीं बन पातीं जिन्हें हम शिद्दत से नहीं चाहते।
जिस प्रकार अच्छी फसल पाने के लिए उत्तम किस्म का बीज बोना अनिवार्य शर्त है, उसी तरह अन्य कुछ भी पाने के लिए उस चीज की मजबूत चाहत, यानी मन में दृढ़ इच्छा का बीजारोपण भी अनिवार्य है। जब हम कोई बीज बो देते हैं तो उससे पेड़ उगना स्वाभाविक है। बीज बो देने के बाद उसे उगने से रोकना असंभव है। बिल्कुल इसी तरह से विचार रूपी बीज को वास्तविकता में परिवर्तित होने से रोकना भी असंभव है। यदि किसी भी तरह से अच्छे विचार रूपी बीजों का मन में रोपण कर दें तो उसके परिणाम को कोई नहीं रोक पाएगा। स्पष्ट है कि जैसी चाहत होगी वैसी ही उपलब्धि होगी। जीवन को संवारना है तो अच्छी सोच अथवा शुभ संकल्प अनिवार्य हैं। तभी तो कामना की गई है कि मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
यदि हमारी इच्छाएं सात्विक नहीं हैं तो परिणाम भी सात्विक नहीं होंगे। हम स्वयं के अच्छे होने का संकल्प कर लें तो हमारे अच्छे होने में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। इच्छाएं ही हमारा जीवन है, इच्छाओं से ही हमारे व्यक्तित्व का विकास है और इच्छाओं से ही समाज का निर्माण है। जो भी ये कहते हैं कि इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बनती हैं, गलत कहते हैं। गलत इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बनती हैं न कि इच्छाएं। जीवन को संवारना है तो इच्छाओं को संवारना होगा। अस्वस्थ भावों का त्याग करना होगा तथा स्वस्थ भावधारा का चुनाव या निर्माण कर उसे पोषित करना होगा। उसे दूसरे दूषित भाव-बीजों से रक्षित करना होगा।
पौराणिक कथाओं और उनकी सीख को आज के वक्त के साथ भी जोड़कर देखा जा सकता है। हम इन कहानियों को पढ़कर पाएंगे कि कलियुग में भी इनका महत्व कम नहीं हुआ है। महाकवि तुलसीदास ने रामचरितमानस में ऐसी कई बातें लिखी हैं, जिन्हें पढ़कर आज के युग में भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। माना जाता है कि जिसका कोई नहीं होता, उसका ईश्वर होता है। एक दिन स्वामी नरहरिदास उनके गांव आए। उन्होंने ही तुलसी को आगे के जीवन की राह दिखाई। यह भेंट उनके लिए ईश्वरीय वरदान सिद्ध हो गई। कवि तुलसी ने रामकथा को आदर्श जीवन का मार्ग दिखाने का माध्यम बना लिया। उन्होंने रामकथा में न केवल सुखद समाज की कल्पना की, बल्कि आदर्श जीवन जीने का मार्ग भी दिखाया।
तुलसी ने गंगा को करुणा, सत्य, प्रेम और मनुष्यता की धाराओं में वर्गीकृत किया, जिनमें अवगाहन कर कोई भी व्यक्ति अपने आचरण को गंगा की तरह पवित्र कर सकता है। उन्होंने मनुष्य के संस्कार की कथा लिखकर रामकाव्य को संस्कृति का प्राण तत्व बना दिया। कविता का उद्देश्य लोक मंगल मानकर विपरीत परिस्थिति को तप माना। भाव भक्ति के साथ कर्म का संगम होने पर विद्या और ज्ञान स्वयं आने लगते हैं। तुलसी के राम सब में रमते हैं। वे नैतिकता, मानवता कर्म, त्याग द्वारा लोकमंगल की स्थापना करने का प्रयास करते हैं।
रामचरितमानस के अलावा, कवितावली, दोहावली, हनुमान बाहुक, पार्वती मंगल, रामलला नहछू आदि अनेक कृतियां रचीं। अनेक चौपाइयां सूक्ति बन गई हैं। तुलसी ने सत्य और परोपकार को सबसे बड़ा धर्म और त्याग को जीवन का मंत्र माना। मानव-तन को सही अर्थों में मनुष्य बनाना मानवता की सार्थकता है। भरत का त्याग, राम की करुणा, जटायू का परहित, शबरी-केवट प्रेम, हनुमान की भक्ति, सुमति जैसे शाश्वत लोकमूल्यों के माध्यम से उन्होंने विषम समस्याओं का समाधान किया। कर्म को सकारात्मक, भाग्य को नकारात्मक मानते हुए असत्य, पाखंड, ढोंग में डूबे समाज को जगाया।
- ओम