04-Jun-2020 12:00 AM
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हिन्दू धर्म में भगवत गीता एक पवित्र ग्रंथ है। इसके श्लोक जीवन को जीने की दिशा दिखाते हैं। भगवत गीता के श्लोक हमारे जीवन जीने की राह आसान कर देंगे। भगवत गीता के श्लोक जीवन का सत्य बताते हैं। श्रीमद्भगवत गीता के उपदेशों में मानव के कल्याण का रहस्य छिपा हुआ है। धर्मयुद्ध में जब अर्जुन धर्मसंकट में फंस गए तब भगवान ने उन्हें गीता का रहस्य समझाया। आज भी गीता के उपदेश लोकप्रिय हैं। करोड़ों लोग इन उपदेशों को आत्मसात करके जीवन का आंनद ले रहे हैं। जो व्यक्ति गीता के उपदेशों को जीवन में उतार लेता है उसे सही मायने में जीने की कला आ जाती है।
जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं है- रणभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि हे अर्जुन! कुछ भी स्थाई नहीं होता है। जो आया है वह जाएगा। जिसने जन्म लिया है उसे मरना ही पड़ेगा। ऐसे में मोह व्यर्थ है। जो व्यक्ति इस मोह में घिर जाता है वह सिर्फ अपनी परेशानियों को ही बढ़ाता है। ये संसार, शरीर कुछ भी स्थाई नहीं है। मनुष्य का जीवन जब तक है तब तक श्रेष्ठ कार्य करने चाहिए। लोगों के हित में कार्य करने चाहिए। आपके द्वारा अच्छे कार्यों की छाप रह जाती है बाकी सब मिट जाता है। इसलिए जीवन में ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ियां उदाहरण लें। ये दुनिया इसी तरह से चलती है और आगे भी चलती रहेगी। व्यक्ति को सदा ही अच्छे कार्यों की तरफ अग्रसर रहना चाहिए।
जीवन में अच्छी चीजों का हिस्सा बनना चाहिए- व्यक्ति के जीवन में बहुत कुछ घटित होता रहता है। लेकिन ज्ञान और जागरूकता के अभाव में यह निर्णय नहीं ले पाता है कि उसे किन चीजों का हिस्सा बनना चाहिए। सफल व्यक्ति हर चीज का ज्ञान रखता है फिर वह बुरी हो या अच्छी। जानकारी हर चीज की होनी चाहिए। लेकिन अच्छी चीजों का हिस्सा बनना चाहिए और बुरी चीजों का नहीं। लेकिन बुरी चीजें व्यक्ति को अधिक प्रभावित करती हैं। ऐसे में व्यक्ति अच्छी चीजों को त्यागकर बुरी चीजों को अपना लेता है और यहीं से उसके पतन का आरंभ होता है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
यानी शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म नहीं करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म नहीं करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते रहते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना चाहिए।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
यानी श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करते हैं, सामान्य व्यक्ति भी ऐसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि वह जिस तरह का व्यवहार करेगा, सामान्य व्यक्ति भी उस की नकल करेगा। जो काम श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्य व्यक्ति उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी उन्हीं की तरह काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम नहीं करेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
यानी ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न नहीं करे। किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही कराए। यह प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां सब आगे निकलना चाहते है। ऐसे में संस्थानों में यह होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथ के मनुष्य को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या फिर काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। उसी मनुष्य का भविष्य सबसे ज्यादा उज्ज्वल भी होता है।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
म वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
यानी जो मनुष्य जिस प्रकार से मेरी भक्ति करता है। यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुसार मैं उसे फल देता हूं। सभी लोग हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो व्यक्ति जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से भगवान का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छा भी भगवान की कृपा से पूरी हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए, जिस रूप में हम उसे पाना चाहते हैं।
-ओम