जीत के बाद भी चुप्पी
20-Oct-2020 12:00 AM 3673

 

राजस्थान में पंचायत चुनाव के सभी चरण पूरे हो चुके हैं। पहले और दूसरे दौर में इन चुनावों में कांग्रेस या भाजपा में से किस पार्टी का दबदबा रहा यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि ये चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होते हैं। लिहाजा दोनों पार्टियां अपनी-अपनी जीत के दावे जरूर करती रहती हैं कि उनकी पार्टी के सरपंच ज्यादा जीते हैं। लेकिन पार्टियों के ये दावे तथ्यात्मक कम और हवाहवाई ज्यादा होते हैं। क्योंकि अधिकांश सरपंचों ने जीत के बाद चुप्पी साध ली है। हालांकि प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस का दावा है कि पंचायत चुनाव में उसके समर्थक सरपंच अधिक जीते हैं। सरपंच किसी भी पार्टी के समर्थक रहे हों, लेकिन सरकार इसके लिए धन्यवाद का पात्र है कि कोविड-19 के इस दौर में उसने चुनाव को पूरी सतर्कता के साथ संपन्न करवाया है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि ग्राम पंचायत चुनावों में हमेशा से ही अमूमन सत्तारूढ़ पार्टी ही ज्यादा फायदे में रहती है। क्योंकि ग्रासरूट से जुड़े पार्टियों के समर्थक इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि 'तालाब में रहकर मगर से बैर नहीं पालनाÓ चाहिए। गांव का विकास चाहिए तो सत्तापक्ष से जुड़े प्रत्याशी को ही वे समर्थन देना उचित मानते हैं। इसलिए इन चुनावों में हमेशा से ही सत्तापक्ष से जुड़े कार्यकर्ता ही अपनी जीत का झंडा बुलंद करके घूमते हैं, लेकिन विपक्षी पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता अपनी जीत का खुलकर ढिंढोरा भी नहीं पीट पाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है पंचायत के विकास के लिए आने वाला करोड़ों का बजट। यह बजट राज्य सरकार के माध्यम से ही पंचायतों में पहुंचता है।

विपक्षी पार्टियों से जुड़े लोग इन चुनावों में अपनी जीत के बाद ज्यादा हल्ला-गुल्ला भी नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का अहसास होता है कि भले ही वे सत्तापक्ष से नहीं जुड़े हैं, लेकिन फिर भी काम उनका उसी से ज्यादा पड़ेगा। लिहाजा सत्तारूढ़ पार्टी से नरमी से पेश आना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उनकी पंचायत के विकास कार्यों में भेदभाव हो सकता है। राज्य सरकार उनके काम में किसी ना किसी बहाने रोड़े अटका सकती है। विकास कार्यों का उनका बजट रुक सकता है। इसलिए कुछ अपवादों को छोड़कर विपक्षी पार्टियों की विचारधारा से जुड़े सरपंच सरकार के सामने अक्सर चुप्पी साधे ही रहते हैं। वहीं इन चुनावों में बड़े नेता भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं।

जब राज्य में पंचायत चुनाव की घोषणा हुई तो किसी को भी यकीन नहीं था कि कोरोना जैसी महामारी के साए में पंचायत चुनाव भी हो सकते हैं लेकिन आयोग की टीम स्थानीय प्रशासन के जरिए मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो गई कि यदि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मतदाता सहयोग करेंगे तो 'सुरक्षित चुनावÓ संभव हैं। इसी थीम को ध्यान में रखते हुए आयोग ने सभी कलेक्टर्स और पुलिस, मेडिकल के अधिकारियों के साथ मंत्रणा शुरू कर दी। पूरी टीम के प्रयासों का ही नतीजा रहा कि मतदाता न केवल घर से निकले बल्कि अपनी सरकार को भी निर्भीक होकर चुन पाए।

राज्य में हुए पंचायत चुनाव को दो तरीकों से देखा जा सकता है। प्री-कोविड यानी जनवरी माह में हुए प्रथम चरण के चुनाव और पोस्ट कोविड यानी सितंबर-अक्टूबर के चुनाव। सामान्य हालात में हुए प्रथम चरण के चुनावों में 83.85 प्रतिशत मतदान हुआ। कोरोना के संक्रमण के दौरान लग रहा था कि मतदाता मतदान के लिए घर से बाहर नहीं निकल पाएंगे लेकिन आयोग द्वारा कोरोना के तैयार माइक्रो मैनेजमेंट प्लान को देख न केवल मतदाता बाहर निकले बल्कि रिकॉर्ड 82.25 फीसदी मतदान कर साबित कर दिया कि आयोग द्वारा संक्रमण के नियंत्रण के लिए तैयार रणनीति उन्हें खासी रास आई है। पंचायत के प्री और पोस्ट कोविड को भी देखा जाए तो आठों चरणों को मिलाकर 82.78 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया है।

आयोग की मंशा थी कि कोई भी मतदाता बिना मास्क के मतदान केंद्रों में प्रवेश नहीं करे ताकि संक्रमण का प्रसार ना हो। मतदाताओं ने भी इस मंशा को बखूबी समझा और मास्क लगाकर ही मतदान केंद्रों पर पहुंचे। पहले चरण में आयोग को लगा कि पुरुष तो मास्क लगाकर आ रहे हैं लेकिन महिलाएं बतौर मास्क अपने पल्लू या आंचल को काम में ले रही हैं। इससे संक्रमण की आशंका को देख अगले चरणों के लिए आयोग ने 'घूंघट में भी मास्कÓ का नारा दिया। मतदाता सतर्क और सजग थे, आयोग के नारे को हाथोंहाथ लिया। यही वजह रही कि तीसरे और चौथे चरण में मतदाताओं की कतारों में महिला मतदाता घूंघट होने पर भी मास्क में नजर आईं। इस बार के पंचायत चुनाव पर पूरे देश की नजर थी। आयोग ने कोरोना संक्रमित व्यक्ति को मतदान करने और उम्मीदवार बनने का मौका दिया। आयोग ने इसके लिए विशेष रणनीति बनाई और मेडिकल द्वारा सुझाए सभी प्रोटोकॉल की पालना के साथ सुरक्षित मतदान का मौका भी दिया।

इन चुनावों में पता चलेगा दबदबा

अब जल्द ही प्रदेश में जिला परिषद और पंचायत समितियों समेत जयपुर, जोधपुर व कोटा के 6 नगर निगमों तथा 129 स्थानीय निकाय के चुनाव होने वाले हैं। ये चुनाव पार्टी सिंबल पर होंगे। राज्य की असली राजनीति का पता ही इस चुनाव में चल पाएगा। क्योंकि इन चुनावों के जरिए जिला प्रमुख, प्रधान और निकाय प्रमुखों का चुनाव होगा। जिला परिषदों, पंचायत समितियों और निकायों में बनने वाले बोर्ड की संख्या से प्रदेश में पार्टी का दबदबा आम जनता के सामने आता है। जल्द ही इन चुनावों का बिगुल बजने वाला है। उसके बाद प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियां परवान चढ़ेंगी।

- जयपुर से आर.के. बिन्नानी

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