01-Sep-2022 12:00 AM
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मप्र के आदिवासी क्षेत्रों में जनजातीय समुदाय को जैविक खेती से जोड़ने के लिए चलाई गई योजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। केंद्र सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने साल 2016-17 में प्रदेश के आदिवासियों में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए 54 करोड़ स्वीकृत किए। इसी प्रकार विशेष पिछड़ी जनजाति (बैगा, भारिया, सहरिया) के लिए 20 करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे। इसके अलावा राज्य मद से 36 करोड़ दिए गए हैं।
केंद्र सरकार को भेजे गए प्रोजेक्ट में सेसबानिया बीज की जगह सेसबानिया रोस्ट्रेट नामक बीज का नाम शामिल किया गया, जबकि सेसबानिया रोस्ट्रेट नामक बीज भारत में जैविक खेती के लिए केंद्र सरकार की परम्परागत कृषि विकास योजना की गाइडलाइन में शामिल नहीं है। मप्र कांग्रेस आरटीआई प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पुनीत टंडन और कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री एवं प्रकोष्ठों के प्रभारी जेपी धनोपिया कहते हैं कि राज्य सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए संचालित जैविक खेती योजना में 100 करोड़ रुपए से अधिक का भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। पार्टी के विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले ने भी इस मामले को विधानसभा में उठाया था।
कांग्रेस आरटीआई प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष पुनीत टंडन का कहना है कि केंद्र सरकार से सेसबनिया रोस्ट्रेटा (टेंडर दर 114 रुपए प्रति किलो) मंजूर कराया गया, जबकि वितरण के समय मंडला जिले में 25 से 30 रुपए किलो मिलने वाला बीज बांटा गया। केंद्र सरकार से दो अलग-अलग राशियां 54 करोड़ आदिवासियों के लिए और 20 करोड़ विशेष पिछड़े (बैगा, भारिया, सहरिया) आदिवासियों के लिए मिली थी, इसका उपयोग अलग-अलग हितग्राहियों के लिए होना था। इसमें 36 करोड़ की राशि राज्य मद से भी जोड़ी गई थी, लेकिन आरटीआई में मिली किसानों की सूची में डिंडौरी, अनूपपुर और मंडला में दोनों मदों की राशि में एक ही सूची मिली, जिससे आशंका है कि एक आदिवासी को फायदा देने के नाम पर दो जगह भुगतान किया गया है।
मप्र कांग्रेस कमेटी के आरटीआई प्रकोष्ठ के अध्यक्ष पुनीत टंडन ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को शिकायत की थी। आयोग ने फर्जी सूची के मामले को संज्ञान में लेने के बाद जांच के लिए मप्र के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया था। कलेक्टर मंडला ने इस मामले में जांच कराई और इसमें पाया गया है कि कई गांवों के लाभांवितों की सूची में ब्राह्मण, कुर्मी, लोहार, मेहरा इत्यादि जातियों के व्यक्तियों के नाम शामिल हैं। योजना में ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से गाइडलाइन बदली गई, जिसके लिए कृषि विभाग के मुख्यालय के अधिकारी भी जिम्मेदार हैं। केंद्र सरकार से स्वीकृति के बाद ठेकेदारों को मदद कर भ्रष्टाचार करने के लिए वर्मी कम्पोस्ट यूनिट के स्थान पर प्रोम खाद और जैविक कीटनाशक प्रदाय की स्वीकृति गलत तरीके से दी गई ताकि वैरीफिकेशन न हो सके।
हितग्राहियों को जैविक सामग्री का फायदा नहीं मिला और इनको यह भी नहीं मालूम कि इनके नाम लाभांवित की सूची में कैसे आए। इससे स्पष्ट है कि झूठी हितग्राही सूची बनाकर राशि का गबन किया गया है। बाद में एक अन्य काल्पनिक सूची बनाकर गड़बड़ी की गई है। सरकारी दस्तावेज तैयार करने में बड़ी गड़बड़ी की गई है। जांच दल ने कृषि और आत्मा परियोजना मंडला के उपसंचालक कार्यालय में जो सूची उपलब्ध हैं, उनके हितग्राहियों को जैविक सामग्री देने की जांच नहीं की। 165 हितग्राहियों के नाम पर दो राशियों का आहरण किया जाना सिद्ध पाया गया है। जांच रिपोर्ट में दोहरा भुगतान होने के बावजूद दोषियों पर एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई है।
पिछले विधानसभा सत्र में इस घोटाले की गूंज सुनाई दी थी। उस समय भी कांग्रेस के ही विधायकों ने जांच की मांग उठाई थी। विधानसभा सत्र के दौरान यह मामला चर्चा में आया था। अब शिकायत ईओडब्ल्यू के पास है। उसने एक अलग टीम बनाकर जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है शिकायत से जुड़े तमाम दस्तावेज संबंधित विभाग से जुटाए जा रहे हैं। जैसे-जैसे सबूत आते जाएंगे, कार्रवाई आगे बढ़ेगी। सबूत जुटाने के लिए विभाग के कई अधिकारियों को तलब किया गया। जैविक खेती के नाम पर किया गया ये घोटाला 2017-18 का है। आदिम जाति कल्याण विभाग ने 20 जिलों के आदिवासी और विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा, सहरिया के साथ भारिया किसानों को कोदो, कुटकी, ज्वार, बाजरा के उत्पादन में सहयोग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग के लिए करीब 100 करोड़ रुपए कृषि विभाग को दिए थे। विभाग का मकसद जैविक खेती करने वाले आदिवासी किसानों को बढ़ावा दिया जाना था। यह पैसा आदिवासी किसानों के लिए केंद्र से मिला था। विभाग को इससे खाद-बीज खरीदना थे और फिर प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के लिए किसानों को देना थे।
प्लान ये था कि रासायनिक खाद के बजाय जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाए। सरकार ने पैसा तो दे दिया, लेकिन अफसरों ने उसका फायदा किसानों को नहीं पहुंचाया। सितंबर 2018 में जैविक खेती के लिए 100 करोड़ रुपए का बजट रखा गया। मप्र एग्रो को खाद सहित बाकी सामान उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई थी। एग्रो ने निजी कंपनियों को ठेका दिया। आरोप है कि जो सामग्री दी गई वो बेहद घटिया थी। खाद में राख और मिट्टी मिली थी और तरल पदार्थ में पानी भरा था। इस योजना को मंडला, बालाघाट, डिंडौरी, अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, ग्वालियर, दतिया, श्योपुर, मुरैना, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर और छिंदवाड़ा में लागू किया जाना था।
कांग्रेस ने की कार्रवाई की मांग
पूरे मंडला जिले में रेन्डम तरीके से ज्यादा से ज्यादा गांवों की जांच कराई जाए। यह योजना प्रदेश के 20 आदिवासी बाहुल्य जिलों में संचालित की गई थी जांच में मंडला जिले में जिस तरीके का भ्रष्टाचार सामने आया, उसी तरह दूसरे 19 जिलों की भी जांच कराई जाए। योजना में बदलाव करने वाले जिम्मेदारों पर एफआईआर की जाए। योजना में आदिवासी जैविक उत्पादों की ब्रांडिंग कर बेचने की बात कही गई थी, लेकिन एक भी उपज की ब्रांडिंग नहीं की गई। करीब 110 करोड़ रुपए का बंदरबाट हुआ है, इसकी एफआईआर कराई जाए। आयोग के निर्देश पर जो जांच हुई है, उसमें मिली गड़बड़ियों पर एफआईआर कराई जाए।
- अरविंद नारद