इस बार पौधारोपण नहीं
02-Jul-2020 12:00 AM 3207

 

मप्र की गिनती देश के सबसे हरे-भरे प्रदेश में होती है। इसकी वजह यह है कि यहां हर साल करोड़ों पौधों का रोपण किया जाता है। लेकिन इस बार प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे वाले जिलों में पौधारोपण नहीं हो रहा है। 

न र्मदा नदी के जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) वाले 16 जिलों में इस बार पौधरोपण नहीं होगा। वन विभाग ने आर्थिक तंगी और कोरोना संक्रमण की स्थिति को देखते हुए अपने हाथ खींच लिए हैं। विभाग और वन विकास निगम मिलकर इस बार 3.64 करोड़ पौधे लगा रहे हैं। पहली बारिश के साथ ही प्रदेश में पौधरोपण अभियान भी शुरू हो चुका है, जो जुलाई में भी जारी रहेगा। राज्य सरकार की माली हालत का असर इस बार वन विभाग पर भी पड़ा है। सरकार ने विभाग के लेखानुदान (बजट) में करीब 35 फीसदी की कटौती कर दी है। आमतौर पर विभाग का बजट 1200 करोड़ रुपए के आसपास होता है।

इस कटौती का असर विभाग की कई गतिविधियों पर पड़ा है। उन्हीं में से एक पौधरोपण अभियान भी है। यही कारण है कि विभाग ने इस बार लक्ष्य कम कर दिया है। औसत 5 करोड़ पौधे लगाने वाला विभाग इस बार 3.64 करोड़ पौधे लगाएगा। वह भी लगेंगे या नहीं इसमें भी संदेह है, क्योंकि कई जगह कोरोना संक्रमण के कारण समय से पौधरोपण की तैयारी यानी गड्ढ़ों की खुदाई नहीं हो पाई है। उल्लेखनीय है कि विभाग की नर्सरियों में सात करोड़ पौधे तैयार हैं। पौधरोपण के लिए गड्ढ़े मार्च में खोदे जाते हैं, ताकि गड्ढ़ों में तीखी धूप लगे और उनमें मौजूद पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवाणु खत्म हो सकें। इस बार ज्यादातर जिलों में मई में गड्ढ़े खोदे गए हैं, जो मापदंड पर खरे नहीं उतरते।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरू (आईआईएससी) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंस की वर्ष 2016 में आई रिपोर्ट में हमें चेताया गया था कि भोपाल शहर का ग्रीन कवर एरिया तेजी से घट रहा है और वर्ष 2018 के अंत तक यह घटकर महज 11 प्रतिशत रह जाएगा। तीन साल पहले मिली इस चेतावनी को न तो प्रदेश सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही शहर से जुड़ी जिम्मेदार संस्थाओं ने। यही कारण है कि शहर की हरियाली सिर्फ 9 प्रतिशत ही रह गई है। इसी रिपोर्ट में अपनाए गए पैरामीटर और बीते 10 साल की गूगल इमेजरी का सहारा लेते हुए ग्लोबल अर्थ सोसायटी फॉर एनवायरोमेंट एनर्जी एंड डेवलपमेंट संस्था ने यह दावा किया है। संस्था के रिसर्च एसोसिएट अभय शर्मा ने राजधानी को हराभरा रखने के लिए भोपाल नगर निगम और राजधानी परियोजना प्रशासन के उन दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जो हर साल राजधानी में लाखों पौधे रोपने के नाम पर करोड़ रुपए खर्च करते आ रहे हैं।

दो साल पहले नवीन विधायक विश्राम गृह के लिए 1149 पेड़ काटे गए थे। इसकी भरपाई के लिए 3372 नए पौधे रोपने का दावा किया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता अजय दुबे द्वारा आरटीआई में पूछे सवाल के जवाब में 1000 पौधे चार इमली स्थित मुख्य सचिव के बंगले के पीछे रोपने का दावा किया गया है, जबकि 1372 पौधे पुरानी जेल से विंध्य कोठी (विधानसभा) परिसर के गैप में रोपने का दावा किया गया है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि इन दोनों ही इलाकों में पहले से ही सघन पेड़ मौजूद हैं, ऐसे में यहां नए पौधे रोपने का न तो कोई औचित्य है और न ही इतनी खाली जमीन है कि 3 हजार से ज्यादा नए पौधे यहां लगाए जा सकें।

प्रदेश में जल सरंक्षण के लिए वन विभाग कैंपा फंड से 35 से 50 करोड़ रुपए खर्च करेगा। इसके लिए 9 जिलों में 10 हजार हेक्टेयर जमीन चिन्हित की गई है। बड़ी बात ये है कि इसमें से 6 हजार हेक्टेयर जमीन सिर्फ दो जिलों की है। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का छिंदवाड़ा और पूर्व मंत्री उमंग सिंघार का धार जिला। बाकी 7 जिलों में सिर्फ 4 हजार हेक्टेयर जमीन पर फंड खर्च होगा। इस फंड को वाटरशेड, स्टॉपेज डैम बनाने, पौधरोपण करने और कुआं-बावड़ियों का जलस्तर बढ़ाने में खर्च किया जाएगा। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (कैम्पा) आनंद बिहारी गुप्ता के कार्यालय से 20 मई को क्षतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा फंड) में एपीओ वर्ष 2020-2021 के लिए प्रथम चरण का बजट आवंटित हुआ है। विभाग ने  बजट जल ग्रहण क्षेत्र उपचार के लिए एनपीव्ही मद से जारी किया है। टीकमगढ़ जिले में बेतवा नदी के पास 1579 हेक्टेयर में काम होंगे। डीएफओ एपीएस सेंगर ने बताया कि हमने कंजर्वेशन और प्लांटेशन के लिए 21 करोड़ का प्रोजेक्ट भेजा था, जिसमें से प्रथम चरण का बजट आवंटन हुआ है।

पुरानी गड़बड़ी की जांच भी नहीं हुई पूरी

वर्ष 2017 में नर्मदा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में 7 करोड़ पौधों को रोपने की जांच आज तक पूरी नहीं हो पाई है। 8 बार जांच होने के बाद भी सरकार पौधरोपण में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाई है। कमलनाथ सरकार में वनमंत्री रहे उमंग सिंघार ने खुद जंगल में जाकर अभियान के दौरान लगे पौधों के जीवित होने की जांच की थी। जिसमें जीवितता का प्रतिशत 18 बताया गया था। मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री और वनमंत्री को जिम्मेदार माना गया था। पूर्व वित्त मंत्री तरुण भनोत की अध्यक्षता में बनी समिति ने इस पर निर्णय भी लिया, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कुछ कर पाते, उससे पहले ही सरकार चली गई और मामला अब तक उलझा हुआ है।

- राकेश ग्रोवर

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