03-Sep-2020 12:00 AM
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान की शुरूआत की थी तो सभी राज्यों ने इस दिशा में लक्ष्य बनाकर काम करना शुरू किया था। लेकिन मप्र ने स्वच्छता अभियान को आंदोलन की तरह अपनाया। इसका परिणाम यह हुआ कि यहां के शहर स्वच्छता सर्वेक्षण में हमेशा आगे रहे। प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी इंदौर का दबदबा शुरू से है, वहीं भोपाल सहित अन्य शहर भी भारतीय पटल पर छाए हुए हैं।
मप्र वाकई अजब है, गजब है। देश का हृदय प्रदेश होने के नाते इस प्रदेश का अपना ही महत्व है। इस बात को यहां का शासन-प्रशासन और जनता भी अच्छी तरह जानती है। यही कारण है कि कई मामलों में मप्र देश के लिए मिसाल बनकर सामने आता है। स्वच्छता सर्वेक्षण में मप्र शुरू से मिसाल बना हुआ है। प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर ने तो अपनी अलग ही छाप छोड़ी है। वहीं राजधानी भोपाल सहित अन्य नगरीय निकाय भी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण-2020 में मप्र ने एक बार फिर अपना लोहा मनवाया है।
इंदौर शहर ने स्वच्छ सर्वेक्षण में एक के बाद एक चार साल से लगातार देश के सबसे साफ शहर का खिताब हासिल किया है। स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 में प्रदेश के चार शहर टॉप-20 में शामिल हुए हैं। इसमें पहले नंबर पर फिर इंदौर शहर रहा है। 7वें नंबर पर भोपाल, 13वें पर ग्वालियर और 17वें पर जबलपुर रहा है। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से बात करते हुए बताया कि जब एक बार वे इंदौर आए थे तो उनके जापानी मित्र ने उसने कहा था कि मैं शहर में गंदगी ढूंढने निकला था लेकिन मिली नहीं। केंद्रीय मंत्री पुरी ने कहा कि यह बहुत बड़ी उपलब्धि है, जब दूसरे देश जहां सफाई को लेकर विशेष ध्यान दिया जाता है, वहां के लोग ऐसी बात कहें।
स्वच्छता सर्वेक्षण में इस बार भोपाल की रैंकिंग सुधकर 7वें नंबर पर आ गई है। पिछले साल यह 19वें नंबर पर था। इस बार भोपाल को 6 हजार में से 5066.31 अंक मिले हैं। इसके पहले हुए सर्वेक्षण में भोपाल को एक बार सबसे स्वच्छ राजधानी भी घोषित किया जा चुका है, लेकिन इस बार यह खिताब नहीं मिला। ग्वालियर शहर इस बार स्वच्छता सर्वेक्षण में 46 अंकों की छलांग लगाकर 59 से 13वें नंबर पर पहुंच गया है। इस बार 10 लाख आबादी वाले स्वच्छ शहरों की सूची में जबलपुर ने 17वीं रैंक हासिल की है। इस बार शहर की रैंकिंग गिर गई है। जबलपुर को सिटीजन फीडबैक में अवॉर्ड मिला है। छोटे शहरों में मध्यप्रदेश के खरगोन ने 5वां स्थान प्राप्त किया है। वहीं उज्जैन को 12वां, बुरहानपुर को 14वां, सिंगरौली को 15वां और छिंदवाड़ा को 16वां स्थान मिला है।
जबलपुर जिले की नगर पालिका परिषद सिहोरा को स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 के तहत एक लाख से कम जनसंख्या वाले शहरों में सिटिजन लेड इनोवेशन केटेगरी में ग्राउंड वाटर रिचार्जिंग के लिए पुरस्कार मिला है। साथ ही निकाय को राज्य में 11वां स्थान एवं पश्चिम जोन में 67वां स्थान प्राप्त हुआ। जो कि पिछले वर्ष के स्वच्छता परिणामों से बेहतर है। स्वछता सर्वेक्षण रैंकिंग में सिवनी 134 से 82 पायदान आगे बढ़कर 52वें नंबर में आ गया है। पहली बार के सर्वेक्षण में सिवनी 178वें स्थान पर रहा था। अब भी स्वच्छता अभियान में कमियां हैं जिसके कारण सिवनी टॉप रैंकिंग में स्थान नहीं बना पा रहा है। सीएमओ नवनीत पांडे के अनुसार लगातार अच्छे प्रयास और नागरिकों के सहयोग से रैंकिंग में सुधार आ रहा है। टॉप रैंकिंग में आने के लिए कमियों को दूर करने के प्रयास किए जा रहे है।
मप्र के नगरीय निकाय लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके पीछे शासन-प्रशासन का समर्पण और निकायों की सक्रियता का योगदान है। आज इंदौर भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर के लिए स्वच्छता की मिसाल बना हुआ है। इंदौर में स्वच्छता अभियान की शुरुआत शहर से डस्टबिन के हटाए जाने और हर एक घर से कचरा इकट्ठा कर उसके निस्तारण से हुई। वर्ष 2016 में इस शहर में पूरे 85 वार्ड में हर घर से कचरा उठाया जाने लगा था। हालांकि, वर्ष 2019 आते-आते इंदौर ने कचरे को जमा करने से लेकर उसके समुचित इस्तेमाल की एक ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली है कि कई शहर कचरे के प्रबंधन को यहां से सीख सकते हैं। तकरीबन 275 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले और 27 लाख की आबादी वाले इस शहर से रोजाना 1,150 टन कचरा निकलता है जिसमें से आधा कचरा जैविक होता है। हर तरह के कचरे को दोबारा प्रयोग में लाने के लिए शहर में बीते कुछ वर्षों में कई सफल प्रयोग हुए हैं।
स्वच्छ भारत मिशन के सलाहाकार असद वारसी के मुताबिक इस वक्त शहर के हर घर से कचरे-कचरे को जमा किया जाता है। कचरा जमा कर इसे इकट्ठा करने के बाद इंदौर नगर निगम का असली काम शुरू होता है। इंदौर नगर निगम के सलाहकार जावेद वारसी जामी बताते हैं कि कचरा इकट्ठा करते समय ही इसे गीले कचरे और सूखे कचरे के रूप में अलग-अलग रखा जाता है। कचरा इकट्ठा करने वाले वाहन के चालक गौतम कनेरिया बताते हैं कि शुरुआत में 80 प्रतिशत लोग गीला, सूखा कचरा एक साथ ही रखते थे, लेकिन काफी अनुरोध के बाद अब हमें लोगों के घर से ही कचरा अलग-अलग मिलने लगा है। कचरा ठीक से अपने गंतव्य तक पहुंचे इसके लिए हर गाड़ी में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम लगा हुआ है। शहर में 8000 से अधिक सफाईमित्र भी हैं, जो कचरा इकट्ठा करने के साथ सड़कों की सफाई भी करते हैं।
इंदौर में आमतौर पर सड़के साफ और चमकती हुई दिखती हैं। इसकी वजह सफाई के काम में लगी मशीनें हैं जो हर रात करीब 800 किलोमीटर सड़क, डिवाइडर और फुटपाथ की सफाई करती हैं। इस काम में 400 लीटर पानी लगता है। वारसी बताते हैं कि इसमें लगने वाला अधिकतर पानी रिसाइकल किया हुआ होता है। इंदौर नगर निगम के मुताबिक सड़कों की धुलाई के बाद सांस के साथ जाने वाले धूल के कणों की मात्रा 76 माइक्रोग्राम तक कम हो गई है जो कि वर्ष 2014 में 142 माइक्रोग्राम थी। इससे पर्यावरण का स्तर सुधरा है। वारसी कहते हैं कि इंदौर में बीते कुछ वर्षों से थैला बैंक और बर्तन बैंक शुरू हुआ, जिसकी मदद से आम लोग कागज और जूट के बने थैले और किसी बड़े आयोजन के लिए स्टील के बर्तन ले सकते हैं। इस तरह से कचरे की मात्रा में लगातार कमी आई। शहर में पॉलीथिन पर पाबंदी भी है और लोगों को अपना थैला लेकर चलने के लिए प्रोत्साहित भी किया गया।
इंदौर ने सब्जी मंडी में बचने वाले कचरे से बायो-सीएनजी गैस बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। यह प्लांट इस तरह के कचरे से इतना सीएनजी बना लेता है कि शहर में 20 सीएनजी बसों को रोजाना ईंधन दिया जा सकता है। नगर निगम ने सार्थक और बैसिक्स जैसे गैर सरकारी संस्थाओं का साथ लेकर शहर के 700 कचरा उठाने वाले लोगों से संपर्क किया। उन्हें प्रशिक्षण और पहचान-पत्र देकर कचरों के वर्गीकरण का काम सौंपा। वे कचरे को प्लास्टिक, कागज, इलेक्ट्रॉनिक कचरा, शीशा और धातु के मुताबिक अलग-अलग करते हैं। नगर निगम के द्वारा स्थापित वर्गीकरण वाले केंद्र में कचरा इकट्ठा करने और उसके वर्गीकरण की व्यवस्था के साथ फटका और इगलू मशीनें हैं, जिससे यह काम आसान हो जाता है। कचरे के प्रकार के मुताबिक इसे महीन टुकड़ों में काटने की व्यवस्था भी इस केंद्र में है।
जावेद वारसी जामी बताते हैं कि हर रोज प्लास्टिक के 100-100 किलो के ब्लॉक नीमच स्थित सीमेंट प्लांट में भेजे जाते हैं, जहां इसका उपयोग ईंधन के तौर पर होता है। कुछ उन्नत किस्म के प्लास्टिक के टुकड़े मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण को भी दिए जाते हैं, जिससे अच्छी सड़कें बनाई जा रही है। इस केंद्र में रोज 45,000 किलो प्लास्टिक को दोबारा उपयोग लायक बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं, इसी केंद्र पर प्लास्टिक से डीजल बनाने की पद्धति भी विकसित की जा रही है और 3000 लीटर कच्चे तेल से 2600 लीटर डीजल और 180 लीटर पेट्रोल भी बनाया जा रहा है।
इंदौर के परमाणु नगर कॉलोनी में 65 ऐसे घर हैं जो कचरे को ठिकाने लगाने के लिए कई नई पहल कर रहे हैं। ऐसे घरों से निकलने वाला कचरा पहले गीले और सूखे कचरे के रूप में छांटा जाता है। सूखे कचरे को एक जगह इकट्ठा कर रिसाइकलिंग के लिए बेच दिया जाता है और गीले कचरे को आपसी सहभागिता के साथ खाद बनाने की प्रक्रिया में डाला जाता है। कॉलोनी के भीतर ही कंपोस्टिंग के जरिए गीले कचरे से खाद बनता है। खाद बनाने के काम में शहर के 29000 और भी घर लगे हुए हैं। इंदौर नगर निगम ने घरों में खाद बनाने पर जोर दिया है और इस तरह 150 टन कचरा रोजाना कम करने का लक्ष्य रखा है। नगर निगम घरों को पचास फीसदी सब्सिडी के साथ कंपोस्टिंग यूनिट प्रदान कर रहा है। गैर सरकारी संगठन स्वाहा के जरिए मोबाइल कंपोस्टर की स्थापना भी की गई है। इस उपकरण के जरिए व्यवसायिक इलाकों से कचरे को इकट्ठा कर गाड़ी में लगे कंपोस्टर के जरिए खाद में बदला जाता है। स्वाहा 8 से 10 टन तक कचरा इकट्ठा कर रोज इसे खाद में बदल रहा है। इन उपकरणों का उपयोग व्यवसायिक इलाकों के अलावा बड़े रहवास और होटल में भी हो रहा है। वारसी कहते हैं कि इंदौर का लक्ष्य आने वाले समय में इस तरह के प्रयासों को आगे और भी बढ़ावा देना है। कचरा इकट्ठा कर एक जगह लाने में परिवहन का एक बड़ा खर्चा है, लेकिन उस कचरे को श्रोत के पास ही निपटान करने से यह खर्च कम किया जा सकता है। इंदौर नगर निगम हर वर्ष 10 प्रतिशत की दर से कचरा निस्तारण पर खर्च में कमी करना चाह रहा है। इंदौर को साफ रखने की लगातार हो रही कोशिश को लेकर इंदौर नगर निगम के अपर आयुक्त रजनीश कसेरा मानते हैं कि कचरे का समुचित निस्तारण अबाध रूप से चलता रहे, इसके लिए इसकी सतत् निगरानी, चल रहे प्रोजेक्ट के प्रति हमारा दृढ़ निश्चय और सबसे जरूरी लोगों की इस सफाई अभियान में भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।
मप्र के 378 शहरों ने अपना बेहतर प्रदर्शन किया
स्वच्छ सर्वेक्षण-2020 के घटकों में मध्यप्रदेश के 378 शहरों ने अपना बेहतर प्रदर्शन किया। इसमें शहरों में स्वच्छता, साफ-सफाई, आधारभूत संरचनाओं का निर्माण तथा उनका प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट का प्रबंधन और शहरों की स्वच्छता बनाए रखने में नागरिकों का सहयोग प्राप्त करने के प्रयास प्रमुखता से किए गए। इन्हीं प्रयासों के परिणाम स्वरूप खुले में शौच से मुक्त राज्य का गौरव प्राप्त किया और हमारे 234 शहर ओडीएफ+ और 107 शहर ओडीएफ++ के परीक्षण में सफल हुए हैं। इसी क्रम में कचरा मुक्त शहर के मूल्यांकन में राज्य के 18 निकाय स्टार रेटिंग प्राप्त करने में सफल रहे हैं, जो देश में सर्वाधिक शहरों के मामलों में द्वितीय स्थान है। उल्लेखनीय है कि विगत तीन सर्वेक्षणों में भी मध्यप्रदेश के 20 शहर देश के सर्वश्रेष्ठ 100 शहरों में रहे हैं। स्वच्छ सर्वे में भोपाल ने लंबी छलांग लगाई है। पिछले सर्वे में 19वें पायदान पर रहे भोपाल को इस बार 7वीं रैंक मिली। अब राजधानी भोपाल देश का 7वां सबसे साफ-सुथरा शहर बन गया है। देश के साफ-सुथरे शहरों की टॉप-20 लिस्ट में प्रदेश के चारों महानगरों को जगह मिली है। लिस्ट में इंदौर लगातार चौथी बार टॉप पर है, इसके बाद भोपाल 7वें, ग्वालियर 13वें और जबलपुर 17वें नंबर पर है। भोपाल को सेल्फ सस्टेनेबल कैपिटल का अवॉर्ड भी मिला है। हालांकि, इस बार क्लीनेस्ट कैपिटल ऑफ इंडिया का खिताब नहीं मिल सका। इसमें हम नई दिल्ली से पिछड़ गए।
देश के 10 सबसे साफ शहर
रैंक शहर पॉइंट
1 इंदौर 5647.56
2 सूरत 5519.59
3 नवी मुंबई 5467.89
4 विजयवाड़ा 5270.32
5 अहमदाबाद 5207.13
6 राजकोट 5157.36
7 भोपाल 5066.31
8 चंडीगढ़ 4970.07
9 विशाखापट्टनम 4918.44
10 वडोदरा 4870.34
- सुनील सिंह