17-Mar-2021 12:00 AM
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कांग्रेस की मुश्किलें और महाजन का कर्ज ये दोनों ही अब एक दूसरे के पर्यायवाची बनते जा रहे हैं। न महाजन का दिया कर्ज कभी खत्म होता है और न कांग्रेस की मुश्किलें खत्म हो रही हैं। कांग्रेस में गांधी परिवार के खिलाफ बगावत करने वाले जी-23 नेताओं का समूह 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले एक बार फिर से पार्टी पर जुबानी हमले करने में जुट गया है।
5प्रदेशों में चुनावी सरगर्मियां दिनों दिन तेज हो रही हैं। इस बार कमोबेश सारे दल अंदरूनी द्वंद्व और चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इनमें केरल, तमिलनाडु तथा बंगाल ऐसे हैं, जिनमें दोनों राष्ट्रीय शिखर पार्टियां मुख्य भूमिका में नहीं हैं। वहां क्षेत्रीय दलों ने दशकों से अपने पैर मजबूती से टिकाए हुए हैं। केंद्र में अपने बूते पहली बार बहुमत में आई भाजपा को इन प्रदेशों में अपने अंकुरण को पालना-पोसना है तो कांग्रेस को खिसकता जनाधार रोकना है। इन कोशिशों में दोनों दलों ने लोकतंत्र के इस सबसे बड़े अनुष्ठान में कुछ स्याह आहुतियां भी डाली हैं। इसी तरह क्षेत्रीय पार्टियों के नेतृत्व पहली बार कड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरेंगे। यह चुनाव इस जनतांत्रिक अनुष्ठान का भी अलग ढंग से इम्तिहान ले रहा है। अपने कार्यों के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव दर चुनाव तिकड़मों के जरिए बहुमत जुटाने का हुनर हुक्मरानों ने अमल में लाना शुरू कर दिया है। इससे संसदीय निर्वाचन प्रणाली भी कई मुश्किलों का सामना करती दिखाई देती है, यानी लोकतंत्र के ये घटक अपने-अपने ढंग से एक जैसे सवालों का सामना कर रहे हैं।
कांग्रेस के लिए इन 5 राज्यों में खोने के लिए कुछ नहीं है। एक पुदुचेरी में सरकार बची थी। वह भी चली गई। इसलिए उसके नजरिए से तो सारी इबारत एकदम साफ-साफ लिखी हुई है। चुनाव दर चुनाव उसका जनाधार खिसकता जा रहा है। सीटें कम होती जा रही हैं। अपने दम पर वह किसी भी राज्य में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। अकेले पुदुचेरी में उसकी सीटें 15 और वोट 30 फीसदी थे। इसके ऊपर जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती। इसे ही पार्टी बचा ले तो बड़ी बात है। केरल में उसके 22 विधायक चुने गए थे और मतों का प्रतिशत 22 था। असम में अलबत्ता 31 फीसदी वोटों के साथ 26 सीटों पर उसे कामयाबी मिली थी। तमिलनाडु में लगभग साढ़े छह प्रतिशत मतों के ढेर पर वह खड़ी है। इस बार द्रमुक के आसार बेहतर हैं तो वह अवश्य कुछ हासिल कर सकती है। बंगाल में पिछली बार की तरह उसने फिर वाम दलों के साथ जाने का अदूरदर्शी फैसला लिया है। पिछली बार उसने 12 प्रतिशत मत के साथ 44 स्थानों पर जीत हासिल की थी। यह वाम दलों से बारह सीट ज्यादा थी। इस बार अधीर रंजन चौधरी के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी है। वे कितना जनाधार बढ़ा सकते हैं। सीटों में तो कोई बहुत बढ़ोत्री के आसार फिलहाल नहीं लगते।
जवाहरलाल नेहरू ने 1930 में अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को लिखे एक पत्र में, चीनी यात्री ह्वेन त्सांग की किताब से ली गई एक कहानी का जिक्र किया था। कहानी दक्षिण भारत के एक व्यक्ति के बारे में थी जो बिहार के वर्तमान भागलपुर के पास कर्णसुवर्ण नामक एक शहर में आया था। उसने अपनी कमर के चारों ओर ताम्र पट्टिका लपेट रखी थी और उसके सिर पर एक मशाल लगी हुई थी। जब लोग उससे इस अजीबोगरीब पहनावे के बारे में पूछते, तो वह उन्हें बताता कि वह इतना बुद्धिमान है कि उसे डर है कि पट्टिका लपेटकर नहीं रखने पर कहीं उसका पेट न फट जाए। और उसने मशाल इसलिए लगा रखी है क्योंकि उसे अपने आसपास मौजूद अज्ञानियों पर तरस आता है, जो कि अंधकार में पड़े हैं।
नेहरू ने इंदिरा को बताया कि ह्वेन त्सांग की किताब में वर्णित अभिमानी व्यक्ति के विपरीत, उनके पास सीमित ज्ञान है और इसलिए वह बुद्धिमान व्यक्ति बनकर उपदेश नहीं देंगे। उन्होंने लिखा कि सही और गलत का पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका है बातचीत और चर्चा करना है, न कि उपदेश। तब नेहरू ने कल्पना नहीं की होगी कि उनके वंशज विश्व इतिहास की झलक में उनके पत्रों को पढ़ेंगे और इस कहानी का कोई अलग अर्थ निकालेंगे। उनके पत्र लिखने के लगभग 90 साल बाद, ऐसा लगता है मानो गांधी परिवार ने अपनी कमर में टाइटेनियम की पट्टिका लगा ली है। मशाल के बजाय, उनके पास नाइट विजन वाले चश्मे हैं, जिनके सहारे वे अंधेरे में भी देख लेते हैं जबकि कांग्रेस के बाकी सदस्य और आम लोग अंधेरे में पड़े हुए हैं। इसके अलावा, राहुल गांधी के लिए अच्छी बात ये है कि वह दक्षिण भारत से सांसद हैं, न कि उत्तर (यानि कर्णसुवर्ण) से।
कांग्रेस के बागी जी-23 नेता भले ही पार्टी के 'कमजोर पड़नेÓ के बारे में लगातार शोर मचा रहे हों, लेकिन गांधी परिवार अभी भी आत्मविश्वास से लबरेज है- प्रियंका गांधी तीन विवादित कृषि कानूनों को रद्द करने का वादा कर रही हैं, जबकि राहुल गांधी नागरिकता (संशोधन) कानून को असम में लागू नहीं करने की कसमें खा रहे हैं। उनकी राजनीति भी व्यवस्थित नजर आती है। मशरूम बिरयानी खाना और तमिलनाडु के ग्रामीणों के साथ जलीकट्टू देखना, केरल के कोल्लम में मछुआरों के साथ तैरना और तमिल क्लासिक कहे जाने वाले तिरुक्कुरल को पढ़ना जिसे राहुल के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खोलकर देखा तक नहीं होगा।
जी-23 द्वारा सोनिया गांधी को विवादित पत्र लिखे जाने के 6 महीने बाद, अब एक बात बिल्कुल स्पष्ट है- गांधी परिवार ज्ञान से इतना परिपूर्ण है (ह्वेन त्सांग की किताब में वर्णित व्यक्ति की तरह) कि उसे पार्टी चलाने के बारे में दूसरों की सलाह की कोई जरूरत नहीं। वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में परिवार के अलावा किसी और को हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा जैसा कि असंतुष्ट समूह कांग्रेस कार्यसमिति और चुनाव समिति के लिए चुनाव की मांग के जरिए हासिल करना चाहता है। लेकिन गत दिनों जम्मू में असंतुष्टों के भाषणों के सुर और लहजे से स्पष्ट लगा कि जी-23 सदस्य हार मानने को तैयार नहीं हैं।
मोटे तौर पर ऐसे तीन तत्व हैं जो किसी राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता को पार्टी विशेष से बांधे रखते हैं वैचारिक प्रतिबद्धताओं या किसी बड़े उद्देश्य या आंदोलन का हिस्सा होने की वजह से उत्पन्न परस्पर लगाव की भावना, चुनावी सफलताएं दिला सकने वाले एक लोकप्रिय और करिश्माई नेता के तहत भविष्य की संभावनाएं और संसाधनों की उपलब्धता।
वर्तमान कांग्रेस के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। जी-23 के अधिकांश सदस्य और अनेकों दूसरे भी कांग्रेस पार्टी की उस विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध हैं जिसे कि वे दशकों से जानते समझते आए हैं। लेकिन आज वे पार्टी नेतृत्व को पूरी तरह से भ्रमित पा रहे हैं, बात धर्मनिरपेक्षता और नरम हिंदुत्व के बीच झूलने की हो या राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर भ्रामक प्रतिक्रियाएं देने की। और, ये तो बस दो मुद्दे हैं। किसी आंदोलन या उद्देश्य से जुड़ाव का मुद्दा अब आम लोगों से संबंधित नहीं है, यह अब गांधी परिवार के हितों का मामला लगता है। जहां तक करिश्माई नेतृत्व की बात है, तो ज्यादातर कांग्रेसियों को आज राहुल गांधी के चुनाव जीतने की क्षमता पर उतना ही भरोसा है जितना कि नरेंद्र मोदी या अमित शाह को। और, राजनीति जारी रखने के लिए जरूरी संसाधनों की उपलब्धता के बारे में आप हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवारों से पूछें या सिर्फ गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल से बात करके देखें, जिनका कहना है कि हाल के नगरपालिका चुनावों में पार्टी उम्मीदवारों को अपने पैसे खर्च करने पड़े और वह खुद के लिए फेसबुक लाइव करने में असमर्थ हैं क्योंकि वह 7 हजार रुपए का कैमरा नहीं ले सकते।
सोनिया या राहुल की हैसियत इंदिरा गांधी वाली नहीं है। इंदिरा ने 1969 और 1978 में, कांग्रेस के दिग्गजों को चुनौती दी थी और पार्टी को विभाजित कर दिया था। दोनों अवसरों पर, उन्होंने मूल पार्टी को छोड़ते हुए अपने धड़े को असली कांग्रेस के रूप में स्थापित करने का काम किया था। तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा और ब्रह्मानंद रेड्डी विरोधी खेमे में थे जिन्होंने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था। सोनिया गांधी को पता है कि राहुल या प्रियंका के पास अपनी दादी वाला करिश्मा नहीं है कि अगर उन्हें पार्टी छोड़नी पड़े या इंदिरा गांधी की तरह उन्हें निष्कासित कर दिया जाए तो वे कांग्रेसियों के बहुमत का समर्थन हासिल कर पाएंगे। इसलिए सोनिया कांग्रेस की बागडोर नहीं छोड़ेंगी। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो अंतरिम कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए सोनिया उनके खिलाफ कार्रवाई करने में नहीं हिचकेंगी।
तमिलनाडु में आपसी खेमेबाजी में फंसी कांग्रेस
तमिलनाडु में प्रदेश कांग्रेस में आपसी गुटबाजी के चलते असंतोष भरा पड़ा है। कांग्रेस और डीएमके के बीच सीट शेयरिंग को लेकर गठबंधन पर असमंजस बरकरार है। राहुल गांधी के तमिलनाडु पहुंचने पर चुनाव प्रचार अभियान ने जोर पकड़ा था। लेकिन, उनके जाते ही फिर से गुटबाजी हावी होने लगी है। तमिलनाडु में प्रदेश अध्यक्ष केएस अलागिरी को लेकर कार्यकर्ताओं समेत कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में नाराजगी की बात सामने आई है। कांग्रेस आलाकमान द्वारा प्रदेश टीम की घोषणा करते समय भी कार्ति चिदंबरम ने इसका विरोध किया था। कहा जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व ने फैसले करने से पहले प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से बात नहीं की थी। वहीं पश्चिम बंगाल में वाम दलों के साथ गलबहियां कर चुनाव लड़ने जा रही कांग्रेस केरल में उन्हीं के खिलाफ खड़ी है। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने हाल ही में राहुल गांधी और कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था। पिनराई विजयन ने ट्वीट कर राहुल गांधी के बंगाल चुनाव से दूर रहने और केरल में ही ध्यान लगाने पर सवाल उठाए थे। पुदुचेरी में कांग्रेस की स्थिति जगजाहिर है। राहुल गांधी का दौरा खत्म होने के दूसरे ही दिन राज्य में कांग्रेस की सरकार गिर गई थी। इस स्थिति में कहा जा सकता है कि कांग्रेस की मुश्किलें अभी खत्म होती नहीं दिख रही हैं।
चुनावी राज्यों में कांग्रेस पर सवाल उठा रहे हैं जी-23 नेता
पश्चिम बंगाल में भी अब कांग्रेस नेता इन असंतुष्टों पर हमलावर नजर आ रहे हैं। जी-23 नेता में से एक आनंद शर्मा ने हाल ही में फुरफुरा शरीफ के अब्बास सिद्दीकी के साथ कांग्रेस करे गठबंधन पर सवाल खड़े किए थे। शर्मा ने इस गठबंधन को पार्टी की गांधीवादी और नेहरूवादी मूल विचारधारा और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बताया था। आनंद शर्मा ने इस गठबंधन को लेकर कांग्रेस कार्य समिति में चर्चा करने की बात के साथ प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी की भी आलोचना की थी। इसके जवाब में अधीर रंजन चौधरी ने सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फं्रट (आईएसएफ) के साथ गठबंधन के फैसले का बचाव किया और शीर्ष नेतृत्व को इसकी जानकारी होने की बात भी कही।
- इन्द्र कुमार