20-Nov-2020 12:00 AM
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आखिरकार राजस्थान में चल रहा गुर्जर आंदोलन 12वें दिन खत्म हो गया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के बीच आरक्षण आंदोलन की मांग को लेकर सहमति बन गई है। सब कमेटी और गुर्जर संघर्ष समिति के बीच वार्ता में 6 बिंदुओं पर सहमति बनी है। 5 मांगों पर गुर्जर समाज ने सहमति दी। मारे गए 3 आंदोलनकारी के परिजनों को सरकारी नौकरी मिलेगी, आंदोलन में लगे मुकदमों को सरकार वापस लेगी, नवी अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र को पत्र लिखेगी गहलोत सरकार। अब सवाल उठता है कि क्या गुर्जर आंदोलन राजनीति के चतुर सुजान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मास्टर स्ट्रोक है? इस बार गुर्जर आंदोलन जिस दिन से शुरू हुआ है उसी दिन से इस बात को लेकर आम लोगों में चर्चा है कि क्या इस गुर्जर आंदोलन के जरिए अशोक गहलोत एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं। निशाना भी ऐसा साध रहे हैं कि जिसे लगे उसका जख्म भी न दिखे। कहा जा रहा है कि इस बार राजस्थान में गुर्जर आंदोलन की सियासी आग लगी है जिसमें धुआं ही धुआं है।
गौरतलब है कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनते ही हाशिए पर जा चुके गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के लिए भी आंदोलन महत्वपूर्ण था। उन्होंने इस बार के आंदोलन में अपने पुत्र विजय बैंसला को लॉन्च किया। गौरतलब है कि फरवरी 2019 में भी बैंसला ने आंदोलन के माध्यम से सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराया था। जिस बैंसला को लोग चुका हुआ गुर्जर नेता मान चुके थे, वो बैंसला तीन से चार हजार गुर्जरों की भीड़ के साथ सवाई माधोपुर के पास मलारना रेलवे स्टेशन पर पटरी पर बैठ गए थे। एक छोटी सी भीड़ को रेलवे ट्रैक पर बैठते हुए बड़ी संख्या में तैनात पुलिसकर्मी देखते रह गए। बैंसला ने कहा कि आंदोलन पूरी तरह से अहिंसात्मक होगा। अगर हिंसा हुई तो वह आंदोलन को छोड़कर उठ जाएंगे। उस आंदोलन के बाद उन्होंने सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस साल 1 नवंबर से आंदोलन शुरू कर दिया था।
राजस्थान में चल रहा गुर्जर आरक्षण आंदोलन समाप्त हो गया है। सरकार द्वारा आंदोलनकारियों की सभी मांगें मान लिए जाने के बाद 12वें दिन आंदोलनकारी दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक से हट गए हैं। वहीं आंदोलन के कारण करौली-हिंडौन सड़क मार्ग पर लगाया गया जाम भी हटा लिया गया है। इसके साथ ही प्रशासन ने इंटरनेट सेवाएं भी बहाल करवा दी हैं। आंदोलनकारियों के पटरियों से हट जाने के कारण विगत 11 दिनों से बाधित हो रहा दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक अब बहाल हो गया है। गुर्जर आरक्षण आंदोलन की समाप्ति के बाद करौली-हिंडौन मार्ग पर रोडवेज बसों का संचालन शुरू कर दिया गया है। करौली से महुआ, मंडावर, अलवर, जयपुर, भरतपुर और दिल्ली सहित अन्य मार्गों पर भी रोडवेज का संचालन शुरू कर दिया गया है। करौली रोडवेज यातायात प्रभारी शिवदयाल शर्मा ने बताया कि सरकार से गुर्जर समाज के हुए समझौते के बाद बस सेवाओं को बहाल कर दिया गया है। आंदोनलनकारियों ने करौली-हिंडौन सड़क मार्ग पर गुड़ला गांव में लगाया गया जाम हटा दिया है। यहां सड़क पर सूखा पेड़ डालकर जाम लगाया हुआ था। लेकिन इसके बाद गुर्जर आंदोलन नहीं करेंगे, यह सुनिश्चित नहीं हैं। हालांकि इस बार आंदोलन पहले की अपेक्षा कमजोर रहा।
गुर्जर आंदोलन पूरे राजस्थान में इस बार पहले की तरह दिखना तो छोड़िए पिछले गुर्जर आंदोलन की छाया की तरह भी नहीं दिखा। राजस्थान सरकार इस तरह से आचरण कर रही थी जैसे पूरे राजस्थान में गुर्जर सड़कों पर हैं और वह पूरी तरह से चिंतित हैं। बैंसला पहले दिन से संकेत देते रहे कि उन्हें मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से काफी उम्मीदें हैं लेकिन सियासत के जानकार कहते हैं गुर्जर आंदोलन से बैंसला को कोई उम्मीद हो या ना हो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं। राजस्थान के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच के वोट का अंतर देखें तो कांग्रेस को भाजपा से महज 1 लाख 42 हजार वोट ज्यादा मिले हैं। और माना जा रहा है कि जिस तरह से गुर्जरों ने बड़ी संख्या में कांग्रेस को वोट किए हैं इस 1 लाख 42 हजार में से 80 फीसदी गुर्जर वोट हैं, जबकि 20 फीसदी मुस्लिम वोट हैं। भाजपा का एक भी गुर्जर विधायक विधानसभा में नहीं पहुंचा है। दरअसल गुर्जर समझ रहे थे कि इस बार राजस्थान का मुख्यमंत्री गुर्जर का बेटा सचिन पायलट बनेगा। मगर यह हो न सका और राजस्थान की कमान राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत के हाथों में चली गई। सचिन पायलट देखते ही रह गए।
अशोक गहलोत राहुल गांधी के बगल से सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के पिटारे से मुख्यमंत्री का पद दिल्ली से निकाल लाए। सांत्वना में सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री के पद से नवाजा गया। सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन अशोक गहलोत को जानने वाला जानते हैं कि गहलोत का काटा पानी नहीं मांगता है। यह पूरे देश में देखा भी की किस तरह उन्होंने सचिन पायलट को कमजोर कर दिया है। ऐसे में इस बार के गुर्जर आंदोलन में सरकार की पूरी कोशिश यह रही कि आंदोलन विकराल रूप धारण न करे। इसलिए सरकार लगातार इस कोशिश में लगी रही कि आंदोलनकारियों से किसी भी तरह वार्ता कर आंदोलन को खत्म कराया जाए।
राजनीति के चौबीसों घंटे के खिलाड़ी
अशोक गहलोत को पहचानने वाले जानते हैं कि गहलोत राजनीति के चौबीसों घंटे के खिलाड़ी हैं जो हर वक्त शतरंज खेलते हैं और सबसे अच्छी उनकी चाल घोड़े की होती है। वह हमेशा ढाई घर की चाल चलते हैं। दो घर आगे बढ़ते हैं तो एक घर पीछे भी हटते हैं और यहीं से उनकी मारक क्षमता बढ़ जाती है। ऐसे में सचिन पायलट अगर कोई उम्मीद पाले बैठे हैं कि राज्य की राजनीति में अशोक गहलोत के रहते नंबर एक की हैसियत पा लेंगे तो सचिन पायलट को किसी करिश्मे से उम्मीद करनी चाहिए। जानकारों का कहना है कि इस आंदोलन के माध्यम से किरोड़ी सिंह बैंसला के पुत्र विजय बैंसला को एक गुर्जर नेता के रूप में स्थापित किया जा रहा है। दरअसल सचिन पायलट के समानांतर एक और गुर्जर नेता अशोक गहलोत खड़ा करने की कोशिश में लगे हुए हैं। यानी राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट के लिए राह आसान नहीं है।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी