गड्ढों में भोपाल
20-Nov-2021 12:00 AM 732

 

देश के दिल मप्र की राजधानी भोपाल को पिछले 20 साल से पेरिस बनाने के वादे और दावे किए जा रहे हैं, लेकिन आज भी स्थिति यह है कि यहां विकास अनियंत्रित, अव्यवस्थित और भेदभावपूर्ण हो रहा है। मानसून की बारिश, स्मार्ट सिटी योजना, अमृत योजना, मेट्रो रेल परियोजना के कारण शहर में खराब हुई सड़कों, विकास के नाम पर जगह-जगह खुदाई के कारण ऐसा लगता है जैसे भोपाल गड्ढ़े में है। सड़कों की मरम्मत और गड्ढ़ों की भराई में भेदभाव इस कदर है कि वीआईपी क्षेत्र चकाचक हैं, जबकि आम आदमी गड्ढ़े में है।

देश में अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ख्यात मप्र की राजधानी भोपाल कभी राजाभोज, कभी दोस्त मोहम्मद खान, कभी गोंड महारानी कमलापति, कभी आबिदा सुल्तान, कभी भोपाल गैस त्रासदी के लिए सुर्खियों में रहा है। लेकिन इन दिनों यह शहर अनियंत्रित तथा भेदभावपूर्ण विकास और गांवों से भी जर्जर सड़कों के कारण सुर्खियों में है। यह स्थिति तब है जब शहर की करीब 20 लाख आबादी से भरपूर टैक्स लिया जा रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि सर्वाधिक टैक्स देने वाली निजी कॉलोनियों और वहां के लोगों को सुविधाओं के नाम पर छला जा रहा है। आमजन से विभिन्न प्रकार के विकास का टैक्स लेकर वीआईपी कॉलोनियों को सजाया और संवारा जा रहा है। सरकार से लाखों रुपए की पगार लेने वाले साहेबान सरकारी कॉलोनियों में ऐश कर रहे हैं वहीं टैक्स देने वाले आम लोग धूल, कचरा और गड्ढ़ों से युक्त कॉलोनियों में रहने को मजबूर हो रहे हैं। 

हवाई जहाज से जब दूसरे प्रदेश या विदेश का व्यक्ति भोपाल आता है तो ऊपर से यहां का प्राकृतिक सौंदर्य देखकर मोहित हो जाता है। वाकई भोपाल का प्राकृतिक सौंदर्य मनमोहक है भी। लेकिन जब वही व्यक्ति शहर के रहवासी क्षेत्रों में जाता है तो उसे भोपाल रेशम के कपड़े में लगे पेबंद जैसा नजर आता है। यह भोपालवासियों के लिए ही नहीं बल्कि सरकार के लिए भी शर्म की बात है। जिस शहर के विकास के लिए अकेले नगर निगम करीब 2600 करोड़ रुपए का बजट स्वाहा करता है, उस शहर में गड्ढ़े, गंदगी और धूल का गुबार यह दर्शाता है कि यहां का विकास केवल कागजों में हो रहा है। हां, वही व्यक्ति जब चार इमली, 74 बंगला, 45 बंगला, अरेरा कॉलोनी क्षेत्र में जाता है तो उसे अहसास होता है कि वाकई वह स्मार्ट सिटी में आ गया है। शहर के विकास में यह भेदभाव वाकई चिंता का विषय है।

विकास में भेदभाव

भोपाल भ्रमण करने पर ये साफ नजर आता है कि वाकई मप्र अजब है, गजब है। इसकी वजह यह है कि एक तरफ भोपाल सुंदर, आकर्षक, हरी-भरी और व्यवस्थित कॉलोनियों वाला शहर नजर आता है, वहीं दूसरी तरफ विकास के गड्ढ़े नजर आते हैं। हैरानी की बात यह है कि राजधानी में विकास का यह भेदभाव आज से नहीं बल्कि वर्षों से चला आ रहा है। लेकिन इस पर न तो शासन और न ही प्रशासन ने कोई कदम उठाया है। हैरानी की वजह यह है कि मानसून के कारण जब पूरे शहर की सड़कें खराब होती हैं तो सड़कों की मरम्मत और गड्ढ़ों की भराई में भी भेदभाव इस कदर होता है कि वीआईपी क्षेत्र चकाचक नजर आता है, जबकि आम आदमी गड्ढ़े में। यह स्थिति तब है जब शहर की आम कॉलोनियों के लोग सबसे अधिक टैक्स दे रहे हैं, जबकि वीआईपी कॉलोनियों से नगर निगम को कुछ नहीं मिलता। राजधानी में आम आदमी से तो भरपूर टैक्स लिया जा रहा है, लेकिन सुविधाएं वीआईपी क्षेत्रों को दी जा रही है। इस कारण जहां चार इमली, 74 बंगला, 45 बंगला, अरेरा कॉलोनी क्षेत्र में विकास नजर आ रहा है, वहीं आम आदमी वाली कॉलोनियों की पहचान टूटी सड़क, खुदी सड़क, उड़ती धूल, सड़कों पर अंधेरा बन गया है। जब राजधानी भोपाल में यह हाल है तो अन्य क्षेत्रों का क्या होगा?

शहर की सड़कों की रिपेयरिंग में भी वीआईपी और आम ट्रीटमेंट नजर आ रहा है। जहां से मंत्री, विधायक या अफसर गुजरते हैं, वहां तो सड़क पर डामर की परत बिछाई जा रही है, लेकिन जिन सड़कों से आमजन गुजरते हैं, उनके गड्ढ़े भी सही ढंग से नहीं भरे जा सके हैं। वीआईपी ट्रीटमेंट वाली सड़कों में मंत्रालय और चार इमली का हिस्सा प्रमुख है। दूसरी ओर शाहपुरा, कोलार, अयोध्या बायपास, बावड़ियाकलां, होशंगाबाद रोड, कोहेफिजा, दानिश नगर, इंद्रपुरी, आनंद नगर, करोंद, भोपाल टॉकीज के सामने आदि इलाकों में सड़कें अब तक चकाचक नहीं हो पाई है।

300 से अधिक कॉलोनियां गड्ढ़ायुक्त

मानसून की विदाई के बाद भी शहर की उखड़ी, टूटी, खुदी व खराब सड़कें वैसी की वैसी हैं। इस साल मानसून की बारिश से 300 से अधिक कॉलोनियों के लोग दिक्कत में आ गए हैं। इनमें 60 फीसदी कॉलोनियां कोलार में हैं। बाकी नेहरू नगर, भदभदा क्षेत्र, करोंद, बैरागढ़, पुराने शहर, गोविंदपुरा व कटारा हिल्स से जुड़ी हुई कॉलोनियां हैं। यहां बीते एक साल के दौरान सड़क खुदाई से लेकर नाली निर्माण के काम हुए हैं। यहां काम करने के बाद सड़क दुरूस्त नहीं की गई, जिससे अब रिमझिम बारिश में यहां सड़क से बाहर पड़ी धूल-मिट्टी कीचड़ में बदल गई। कुछ सड़कों पर तो बड़े गड्ढ़े हो गए। कुछ सड़कों पर कीचड़ फिसलन की बड़ी वजह बन गया। लोगों को बेहद संभलकर जाना पड़ रहा है। यहां थोड़ी सी लापरवाही दुर्घटना का कारण बन रही है। कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां दो साल से सड़कें खोदी हुई हैं। निर्देश के बावजूद ठेका एजेंसी दुरूस्त नहीं कर रही। बारिश के बाद हर बार यहां कीचड़ और इससे लोगों को परेशानी की स्थिति बनती है। कोलार की राजहर्ष कॉलोनी, प्रियंका नगर, ललिता नगर, नम्रता नगर, सनखेड़ी रोड, वंदना नगर से लेकर मिसरोद, बावड़िया, गुलमोहर से जुड़ी कॉलोनियां हैं। शाहपुरा में तो निगमायुक्त बीते दो माह में तीन बार निरीक्षण कर खुदी सड़कों को दुरूस्त करने का कह चुके, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। सड़कें दुरूस्त रहे इसके लिए निर्माण एजेंसी की सिविल शाखा जिम्मेदार है। शहर के अंदरूनी गलियों, मोहल्लों की सड़कों में कीचड़ की स्थित अधिक है। इसके लिए संबंधित जोन के कार्यपालन यंत्री-डिप्टी सिटी इंजीनियर, सहायक यंत्री सिविल जिम्मेदार है।

बारिश मेें बह गई सड़कें

भोपाल में नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, बीडीए और सीपीए (राजधानी परियोजना प्रशासन) की करीब 4700 किलोमीटर सड़कें हैं। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत सड़कें बारिश के कारण जर्जर हो गई हैं। इन्हीं सड़कों को लेकर जहां सियासत गरमा गई है तो वहीं लाखों लोग परेशान हो रहे हैं। कोलार की कई सड़कों पर पैदल चलना तक मुश्किल है तो पुराने शहर के भोपाल टॉकीज, हमीदिया रोड और करोंद में भी सड़कें गड्ढ़ों में गायब हो गई हैं। सीवरेज और कोलार ग्रेविटी लाइन की खुदाई होने से कोलार गेस्ट हाउस से बैरागढ़ चिचली तक सड़क पूरी तरह से उखड़ी हुई है। कुछ जगह ही पक्का पेचवर्क हुआ है, जबकि बाकी में गिट्टी और मिट्टी डालकर लीपापोती कर दी गई है। बीमाकुंज से बैरागढ़ चिचली तक का हिस्सा सबसे ज्यादा जर्जर है। रायसेन रोड के इंद्रपुरी, आनंद नगर में सड़क पर ढेरों गड्ढ़े हैं। होशंगाबाद रोड पर मिसरोद तक सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढ़े हो चुके हैं। वहीं पुराने शहर में हमीदिया रोड, भोपाल टॉकीज, घोड़ा नक्कास, लोहा बाजार, नवबहार सब्जी मंडी, करोंद में हालत ठीक नहीं है। उधर, कमला पार्क के पास सड़क गड्ढ़ों में गायब हो गई है। शाहपुरा चौराहे से बंसल हॉस्पिटल तक सड़क जर्जर है। बावड़ियाकलां के मुख्य मार्ग पर कीचड़ और गड्ढ़ों के कारण लोगों का गुजरना मुश्किल हो गया है। बता दें कि राजधानी की सड़कों के बहाने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, पूर्व कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव समेत कई नेताओं ने सरकार को घेरा था। इसके बाद ताबड़तोड़ नगर निगम, पीडब्ल्यूडी ने अपनी सड़कों की सुध ली। हालांकि, पेचवर्क के नाम पर ईंट के टुकड़े और गिट्टी-मुरम गड्ढ़ों में भरी गई है, जो गाड़ियों के पहियों के साथ सड़कों पर फैलकर राहगीरों के लिए और बड़ी मुसीबत बन गए हैं। नगर निगम कमिश्नर केवीएस चौधरी का कहना है कि निगम की सड़कों का पेचवर्क कराया जा रहा है। कोलार में सीवेज और पाइप लाइन के काम के बाद सड़क की बेहतर तरीके से मरम्मत करने के निर्देश ठेकेदार को दिए गए हैं। लेकिन आज तक सड़कों की स्थिति जस की तस है। कहीं-कहीं मिट्टी और मुरम से गड्ढ़े भरने की कोशिश भी की गई है, लेकिन अब वही मिट्टी और मुरम परेशानी का सबब बन गई है।

सीवरेज की फजीहत

नगर निगम का दावा है कि शहर के सभी बड़े नालों का चैनेलाइजेशन हो चुका है, लेकिन वास्तविकता यह है कि शहर के 789 छोटे-बड़े नालों का चैनेलाइजेशन पिछले 14 सालों में 130 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं हो पाया है। नगर निगम सालाना 20 करोड़ रुपए स्टॉर्म वाटर ड्रेन नेटवर्क डेवलपमेंट और मेंटेनेंस पर खर्च करता है। साथ ही बारिश पूर्व नालों की सफाई में 20 लाख रुपए से ज्यादा खर्च होते हैं। इसके बावजूद शहर में कई जगहों पर अब भी जलभराव की स्थिति बनती है। इधर, अगर बीते पांच साल की बात करें, तो नगर निगम स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क पर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम खर्च कर चुका है। तीन साल पहले अमृत योजना के तहत 125 करोड़ रुपए की लागत से नाला चैनेलाइजेशन अधूरा काम दोबारा शुरू कराया गया, लेकिन ये भी अब तक पूरा नहीं हो सका है।

बता दें कि शहर में छोटे-बड़े 789 नालों सहित मुख्य पांच नालों के चैनेलाइजेशन प्रोजेक्ट को भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने 26 मई 2006 को मंजूरी दी थी। योजना के तहत संजय नगर, शाहपुरा, स्लाटर हाउस, पातरा व साउथ टीटी नगर के सात हजार 250 मीटर लंबे नालों का चैनेलाइजेशन 30 करोड़ 57 लाख रुपए की लागत से कराया जाना था। बड़े नालों का चैनेलाइजेशन करने के बाद इनमें छोटे नालों को कनेक्ट किया जाना था। चैनेलाइजेशन के तहत नालों की कांक्रीट लाइनिंग के जरिए डिजाइन इंबेकमेंट निर्माण शुरू हुआ, लेकिन 14 साल बाद भी काम पूरा नहीं हो सका है। अमृत योजना के तहत कुल 225 करोड़ रुपए की लागत से नालों का निर्माण कर उनका चैनेलाइजेशन किया जाना है। निगम ने पहले चरण में विभिन्न कॉलोनियों के 15 से अधिक नाले-नालियों को अमृत योजना में शामिल किया है। ये वह नाले हैं जिनकी वजह से जलभराव की समस्या होती है।

33 प्रतिशत अधिक राजस्व

भोपाल की सड़कों की बदहाली की यह तस्वीर तब है, जब नगर निगम को राजधानी में इस बार 33 प्रतिशत अधिक राजस्व मिला है। एक अप्रैल से लेकर 31 अगस्त तक नगर निगम ने करीब 137.46 करोड़ रुपए संपत्ति कर और जलकर सहित अन्य कर से कमाए हैं। जबकि पिछले साल 2020 में इसी अवधि के दौरान 91.19 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। इस तरह देखा जाए तो नगर निगम अफसरों ने पिछले साल के मुकाबले 33 प्रतिशत अधिक राजस्व कमाया है। इसमें सबसे ज्यादा राजस्व जोन क्रमांक 9 के जोनल अधिकारी ने दिया है। वहीं दूसरे नंबर पर जोन क्रमांक 13 के जोनल अधिकारी ने सबसे ज्यादा अब तक राजस्व दिया है। जोन क्रमांक 18 के जोनल अधिकारी तीसरे नंबर पर है। इसके अलावा सबसे कम राजस्व जोन क्रमांक तीन का रहा है। इस बार अधिक राजस्व प्राप्त होने के पीछे कारण रहा अधिभार में दी जाने वाली छह फीसदी की छूट। हालांकि अभी वित्तीय वर्ष समाप्त होने में करीब चार माह का वक्त शेष है। तब तक यह आंकड़ा 300 करोड़ के पार होने की संभावना है।

नगर निगम ने नामांतरण के लिए तीन माह की अवधि तय की है। इसके बाद नामांतरण नहीं कराने पर अधिभार वसूला जाएगा। चार महीने के अंदर नामांतरण नहीं कराने पर 10 प्रतिशत और देरी होने पर 15 प्रतिशत का अधिभार लगाया जाएगा। नामांतरण के लिए फीस 2500 रुपए तय है और अब तक कोई समय सीमा नहीं थी। यही कारण है कि 4000 से ज्यादा मामले अब तक नामांतरण के आ चुके हैं। इन सभी मामलों को लेकर अब नामांतरण के लिए नगर निगम विशेष अभियान चला रहा है। बता दें कि हाल ही में शहर के 4000 से अधिक लोगों को नोटिस थमाया गया है, जिसमें स्टांप शुल्क जमा करने की बात कही गई है। बता दें कि सालाना 20 हजार नामांतरण होते हैं। बता दें कि प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री कराने के बाद नगर निगम में संपत्ति कर और जलकर के खाते में नामांतरण की तरफ ज्यादातर लोग ध्यान नहीं देते हैं। बरसों तक संपत्ति कर और पानी के बिल पुराने मालिक के ही नाम आते रहते हैं। कई बार एक ही प्रॉपर्टी तीन से चार बार बिक जाती है और निगम को किसी एक का ही शुल्क मिल पाता है।

सिलेक्टिव विकास पर विवाद

जिन सड़कों से मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायकों की लाखों की कार गुजरती थी, वहां सड़कों के गड्ढों वाले मुंहासे डामर के फेशियल से ढंके जाने लगे और जिन सड़कों से आम आदमी की किश्तों पर खरीदी गई गाड़ियां गुजरती हैं, उन्हें वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। यानी सड़क बनेगी तो पहले वीआईपी, जैसे आम आदमी को तो धक्का खाना किस्मत में लिखा हो। भोपाल से रायसेन जाने वाली सड़क पर आम आदमी को स्लिप डिस्क हो जाए, गाड़ी गड्ढ़े में गिर जाए, हाथ टूट जाए, मुंह फूल जाए। गाड़ी का पुर्जा-पुर्जा हिले चाहे आम आदमी की हड्डी का, मुख्यमंत्री के आदेश के बाद भी यहां नजरें इनायत करने अफसर नहीं आते। यदि आपको अपनी कॉलोनी या शहर में अच्छी सड़कें चाहिए तो आपको वीआईपी होना बेहद जरूरी है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि प्रदेश में ऐसा ही हो रहा है। इस कड़वी हकीकत को साबित करने वाली एक चर्चित खबर 11 अक्टूबर को सुर्खियां बनी थी, जिसके अनुसार गुना जिले प्रभारी मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर को गड्ढ़ों से भरी सड़कों पर झटके लगे तो उनके एक फोन पर गुना में एबी रोड पर आनन-फानन में पेचवर्क शुरू कर दिया गया। इतना ही नहीं पीडब्ल्यूडी के जिम्मेदार अफसरों ने नाराज मंत्रीजी को भरोसा दिलाया कि गुना बायपास के खराब हिस्से को अगले ही दिन दुरुस्त करवा दिया जाएगा। आपको बता दें कि सिस्टम के वीआईपी सिंड्रोम से पीड़ित होने का यह कोई दुर्लभ उदाहरण नहीं है बल्कि यह हर जगह हो रहा है। राजधानी भोपाल भी इससे अछूती नहीं है। यहां भी आम और खास के बीच भेदभाव किया जा रहा है। सरकार को हर सेवा और सुविधा के लिए अपनी जेब से टैक्स अदा करने वाली आम जनता की सड़कों के गड्ढ़े वेस्ट मटेरियल यानी कचरे से भरे जा रहे हैं। जबकि जनता के टैक्स के पैसों से बड़ी सैलरी और मुफ्त सुविधाएं लेने वाले बड़े नेता-अफसरों की सड़कों की सरफेस उखड़ने पर भी उन्हें  करोड़ों रुपए खर्च कर नए सिरे से बनाकर चमकाया जा रहा है। राजधानी भोपाल में 6 अक्टूबर से शुरू हुए सड़क के गड्ढ़ों को भरने के काम में खुलेआम ऐसा ही भेदभाव किया जा रहा है।

60 प्रतिशत सड़कें अब भी बदहाल

राजधानी की खूबसूरती पर दाग लगा रही सड़कों की तस्वीरें अभी भी नहीं बदल पाई है। अभी भी 60 प्रतिशत सड़कें खराब हालत में हैं, जबकि 6 से 20 अक्टूबर के बीच में सड़कें 100 प्रतिशत सुधर जानी चाहिए थीं। तत्कालीन कमिश्नर कवींद्र कियावत ने तीनों निर्माण एजेंसी पीडब्ल्यूडी, नगर निगम और सीपीए को हर हाल में रिपेयरिंग करने को कहा था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। कई इलाकों में तो सिर्फ मिट्टी और चूरी डालकर गड्ढ़े भर दिए गए। इस कारण धूल के गुबार उड़ रहे हैं और एयर पॉल्यूशन बढ़ रहा है। गड्ढ़ों और खराब सड़कों के कारण अयोध्या बायपास, कोलार, हमीदिया रोड जैसे भारी ट्रैफिक वाले इलाकों में रोज एक्सीडेंट हो रहे हैं।

सितंबर में तत्कालीन कमिश्नर कियावत को तीनों एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें नगर निगम की करीब 288 सड़कें खराब होना बताई गई थी। इनमें से 24 सड़कें गारंटी पीरियड में बताई गई थी। जिनकी मरम्मत का जिम्मा ठेकेदारों पर है। वहीं, अन्य सड़कों की रिपेयरिंग में 70.30 करोड़ रुपए खर्च होने का स्टीमेट तैयार किया गया था। पीडब्ल्यूडी और सीपीए (राजधानी परियोजना प्रशासन) की सड़कें भी खराब हालत में थी। दोनों एजेंसियों ने भी सड़कों की रिपोर्ट दी थी। 6 अक्टूबर से रिपेयरिंग शुरू की गई। पीडब्ल्यूडी ने कोलार और हमीदिया रोड की सड़कों की रिपेयरिंग कराई, लेकिन कई हिस्से छोड़ दिए। इसके पीछे अफसरों का तर्क है कि सीवेज और पानी की लाइन खुदाई के कारण कुछ हिस्सा छोड़ा गया है। निगम के काम की रफ्तार शुरुआत से ही धीमी है। अब तक 40 प्रतिशत तक रिपयेरिंग का काम ही हो सका है। इधर, सीपीए मंत्रालय, चार इमली समेत अपने हिस्से की सड़कें सुधार रहा है, लेकिन 15 दिन में रिपेयरिंग का काम पूरा नहीं हो सका। अभी चार इमली और मंत्रालय के पास वाली सड़क पर डामर की परत बिछाई जा रही है। यह हालात तब है कि जब खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सड़कों में गड्ढ़ों पर नाराजगी जताते हुए तत्काल गड्ढ़ों को भरने के निर्देश दिए थे।

70 फीसदी नौकरशाहों का अपना आवास फिर भी सरकारी में निवास

राजधानी भोपाल में एक विडंबना यह भी है कि यहां सबसे अधिक विकास वीआईपी क्षेत्रों में होता है। इसकी वजह यह है कि इन क्षेत्रों में मंत्री, विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस के सरकारी आवास हैं। हैरानी की बात यह है कि सरकार जिन अफसरों के आवास पर सालाना करोड़ों रुपए खर्च करती है, उनमें से 70 फीसदी के अपने मकान भोपाल में हैं। लेकिन सरकारी सुविधाओं के आदी हो चुके ये अफसर अपने निजी मकान में जाने की बजाय सरकारी मकान में ही रहते हैं। इसकी वजह यह है कि जिन क्षेत्रों में इनके सरकारी मकान हैं, यानी चार इमली, 74 बंगले और 45 बंगले में सबसे अधिक विकास पर खर्च होता है। यहां की सड़कें सालभर चकाचक रहती हैं। घरों में बराबर पानी आता है। सड़कों की सफाई निरंतर होती है। फॉगिंग बराबर होती है। स्ट्रीट लाइट कभी भी दगा नहीं देती है। मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन की तर्ज पर अफसर सरकारी आवासों में रह रहे हैं। इसके लिए उन्हें कोई टैक्स नहीं देना पड़ता है। वहीं जो अफसर या आम आदमी निजी कॉलोनियों में रह रहे हैं, उन्हें कई तरह के टैक्स तो देने पड़ रहे हैं, लेकिन सुविधाएं नदारद हैं।

मेट्रो और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के चलते खुद गई आम सड़कें

शहर में दो बड़े प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटी और मेट्रो रेल चल रहे हैं। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए 1,247 करोड़ के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। पूरे काम या तो आधे-अधूरे हैं या फिर गड्ढ़े में हैं। जो प्रोजेक्ट पूरे हो गए हैं वे भी बदहाल हैं। खासकर स्मार्ट सिटी की सड़कों का हाल सबसे अधिक बदहाल है। मुख्यमंत्री निवास से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर बने स्मार्ट रोड का हाल देख लीजिए। इस स्मार्ट रोड का उद्घाटन शिवराज सिंह चौहान ने 11 महीने पहले ही किया है। पहली बारिश के मौसम में ही यह सड़क उखड़ने लगी। बारिश की वजह से सड़कें खराब होती हैं लेकिन यह कोई आम सड़क नहीं है। इसके निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च हुए हैं। भोपाल के डिपो चौराहे से लेकर पॉलिटेक्निक चौराहे तक की दूरी 2.2 किलोमीटर है। यह स्मार्ट सिटी के अंतर्गत आता है। इसके आसपास मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री तक के आवास हैं। मुख्यमंत्री ने 25 दिसंबर 2016 को इसके निर्माण के लिए भूमिपूजन किया था। सड़क के निर्माण में करीब 43 करोड़ रुपए की लागत आई है। आप सोच रहे होंगे कि इतनी छोटी सड़क के निर्माण पर इतनी राशि कैसे खर्च हो गई है। वहीं मेट्रो प्रोजेक्ट का भी हाल बेहाल है। राजधानी भोपाल में 2023 के अंत तक मेट्रो शुरू करने का वादा पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में मेट्रो रूट का सिविल वर्क ही 2023 तक पूरा हो जाए तो यह बड़ी बात होगी। दरअसल मेट्रो रूट की बाधाएं तो एक अलग बात है, लेकिन इसमें बड़ा मुद्दा बजट के इंतजाम का है। बता दें कि 7 साल पहले 2014 में भोपाल मेट्रो की लागत 6,941 करोड़ आंकी गई थी, लेकिन ये बढ़कर अब 9,000 करोड़ होने का अनुमान जताया जा रहा है। क्योंकि इन 7 सालों में काफी बदलाव हुआ है, यहां तक के इस दौरान कंस्ट्रक्शन मटेरियल भी महंगा हुआ है। रुपयों के मुकाबले डॉलर भी मजबूत हुआ। अब साल दर साल जिस तेजी से पेट्रोलियम व अन्य चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, ऐसे में प्रोजेक्ट लागत बढ़ने की आशंका साफ नजर आ रही है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार का बजट और मेट्रो के लोन आदि का गणित बिगड़ना स्वाभाविक है।

मेंटेनेंस का सालाना बजट है 20 करोड़, कागजों में हो रहा काम

राजधानी में मानसून के महीनों में हरियाली और तालाबों की खूबसूरती तो बढ़ गई, पर सड़कें बद से बदतर हो चली हैं। लावारिस छोड़ दी गईं, इन सड़कों पर पैदल चलना भी दूभर हो रहा है। बारिश के बाद कलेक्टर ने दो बार सड़कों को लेकर बैठक की, इसके बाद भी एजेंसियां जनता को राहत नहीं दे पाईं। अधिकारी निर्देश सुनकर चले जाते हैं, उन पर अमल नहीं करते। यहां तक की पेचवर्क भी शुरू नहीं किया गया। शहर में नगर निगम के पास 3 हजार 879 किलोमीटर की सड़कें हैं। इसी तरह पीडब्ल्यूडी के पास 531 और सीपीए के पास 132 किमी सड़कें हैं। इसमें से निगम की 800 किमी सड़कें खराब हो चुकी हैं। पीडब्ल्यूडी की 50 किमी तो सीपीए की 16 किमी की सड़कें गड्ढ़े में हैं। सड़कों के रखरखाव के लिए नगर निगम ने 12 करोड़, पीडब्ल्यूडी ने 3 करोड़ और सीपीए ने 5 करोड़ का बजट रखा है।

- राजेंद्र आगाल

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