राजस्थान में कोरोना वायरस के संक्रमणकाल में सत्तारूढ़ कांग्रेस में वर्चस्व की आग सुलगने लगी है। जानकारों का कहना है कि कोरोना की स्थिति सुधरने के बाद पार्टी में एक बार फिर से विरोध प्रबल हो जाएगा। दरअसल, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच की खाई दिन पर दिन गहरी होती जा रही है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के दो खेमे हैं। यह लड़ाई कोई नई नहीं है। दिसंबर 2013 के चुनाव में जब कांग्रेस हारी तब मुख्यमंत्री पद से अशोक गहलोत हटाए गए और राज्य में युवा एवं नए नेतृत्व के नाम पर यूपीए-2 के केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट की राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी हुई। उस वक्त से ही राज्य के सबसे कद्दावर नेता अशोक गहलोत और कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की पसंद युवा नेता सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस की दो धुरी बन गए। इनके चेलों ने भी अपने-अपने हिसाब से कांग्रेस में दो खेमे बना लिए।
अशोक गहलोत के बारे में कहा जाता है कि यह राजनीति के चतुर सुजान हैं। अशोक गहलोत किसी के जाप्ता करने का प्लान बना लेते हैं तो फिर वह उसे छोड़ते नहीं है। लोग उदाहरण देते हैं कि कैसे अशोक गहलोत ने परशुराम मदेरणा, शीशराम ओला और सीपी जोशी जैसे नेताओं को ठिकाने लगाया था। अशोक गहलोत के बारे में कहा जाता है कि वह चाल कहां चलते हैं और निशाना कहां रखते हैं यह किसी को पता नहीं चलता। जब सचिन पायलट अपनी ताजपोशी की तैयारी कर रहे थे उसी वक्त अशोक गहलोत राजस्थान की सभी विधानसभा सीटों पर अपनी गोटी सेट कर चुके थे, और जब मुख्यमंत्री बनने का मौका आया तो कह दिया लोकतांत्रिक तरीके से चयन होगा। जिसके पास ज्यादा विधायक हैं वही मुख्यमंत्री बनेगा। जाहिर सी बात है कि अशोक गहलोत के पास राजस्थान में 30 साल से ज्यादा का राजनीतिक कैरियर है जबकि सचिन पायलट के पास महज 10 साल का। ऐसे में अशोक गहलोत के साथी ज्यादा होना लाजमी था और राहुल गांधी के भरोसे बैठे रहे सचिन पायलट मौका गंवा बैठे।
जब भी पायलट समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने को लेकर नारे लगाते थे, चुपचाप बैठे गहलोत समर्थक कहते थे कि गांधी परिवार में राहुल गांधी का फैसला अंतिम फैसला नहीं होता है। परिवार में और लोग भी हैं जो चीजों को तय करते हैं। कहते हैं कि हुआ भी यही। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी अशोक गहलोत के पक्ष में हो गए और उनका पलड़ा भारी हो गया। पायलट खेमा कहता है कि यह तो फालतू की बातें हैं कि पायलट के पास विधायक का समर्थन नहीं था, जब मोदी ने हरियाणा में खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया तो कौन से विधायकों से वोटिंग करवाई थी। साफ है कि यहां जब पायलट और गहलोत खेमे की बात होती है तो बात सिर्फ इन दोनों नेताओं के खेमे भर की नहीं रह जाती है, बात दिल्ली तक जाती है और लोग कहते हैं कि कांग्रेस के अंदर आलाकमान के घर भी कई खेमे हैं।
मगर इसका मतलब यह नहीं समझा जाएगा कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार को कोई खतरा है। हालांकि राजस्थान में कभी अल्पमत की सरकारें गिरी भी नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत ने भानुमति का कुनबा जोड़कर चार बार सरकार बनाई मगर वह आसानी से अल्पमत की सरकार चलाते रहे। अशोक गहलोत को तीन में से दो बार अल्पमत की सरकार मिली मगर बहुमत जुटाने के लिए घर से बाहर नहीं निकलना पड़ा। दरअसल राजस्थान की तासीर ऐसी है कि यहां की आबोहवा में बगावत की बू नहीं आती। राज्य में जब पहली बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर सामने आया तो पंडित जवाहरलाल नेहरू की पसंद पंडित जय नारायण व्यास तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़कर तीनों बार हार गए हों, मगर कांग्रेस ने फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। राजीव गांधी को अशोक गहलोत पसंद थे तो उन्होंने 1998 में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कांग्रेस के कद्दावर नेता परसराम मदेरणा समेत कांग्रेस के राजेश पायलट, शीशराम ओला और नवल किशोर शर्मा जैसे नेताओं को किनारे कर अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया। ऐसा लगा कि राज्य में बगावत हो जाएगी, मगर कानाफूसी के अलावा 5 साल में किसी ने भी आवाज नहीं उठाई।
सचिन पायलट किसी बेहतर मौके की तलाश में
बाकी नेताओं में और सचिन पायलट में एक फर्क है। ये थोड़ी बहुत बगावत कर लेते हैं क्योंकि इन्होंने अपना ज्यादा जीवन राज्य के बाहर बिताया है। विदेशों में पढ़े हैं, युवा हैं, संघर्ष करने का माद्दा है, जाति का मजबूत आधार है और राहुल गांधी का साथ है। इसलिए लोगों को लग रहा है कि सचिन पायलट किसी बेहतर मौके की तलाश में बैठे हैं। उन्हें किसी दिन ऐसा लगेगा कि उनके साथ एक तिहाई विधायक आ सकते हैं तो उसी दिन बगावत कर देंगे। हालांकि सचिन पायलट ने आज तक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ कुछ भी नहीं बोला है। अपनी नाराजगी भी जताई है तो बेहद नपे तुले शब्दों में। सचिन पायलट जानते हैं कि अशोक गहलोत अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं, कांग्रेस में उनका भविष्य लंबा है। राहुल गांधी भले ही किनारे पड़ गए हो मगर वह गांधी परिवार के मजबूत स्तंभ है। पायलट को लगता है कि अगर मौका मिलेगा तो राहुल गांधी जरूर साथ देंगे। अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों को इस लड़ाई में अपने-अपने हिस्से का मजा मिल रहा है, मगर मर कांग्रेस रही है। आपको कहीं भी कांग्रेस का कार्यकर्ता नहीं मिलेगा। या तो सचिन पायलट खेमे का कांग्रेसी मिलेगा या फिर अशोक गहलोत का समर्थक मिलेगा। हर कांग्रेसी आपको यही पूछते मिल जाएगा कि भाई साहब इन दोनों में से कौन रहेगा। गहलोत रहेगा या जाएगा या फिर पायलट की छुट्टी होगी या पायलट मुख्यमंत्री बनेगा। यह कोई नहीं सोचता है कि प्रदेश में कांग्रेस कैसे मजबूत होगी और कांग्रेस को मजबूत करने के लिए क्या करना चाहिए। साफ है पायलट या गहलोत दोनों में से जीते कोई हारेगी तो कांग्रेस ही।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी