03-Sep-2020 12:00 AM
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अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से 2018 में जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई कि भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने नक्सली दुनिया के चौथे सबसे खतरनाक आतंकी संगठन हैं। देश में जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में होने वाले आतंकी हमलों की तुलना में नक्सली हिंसा ने अधिक सुरक्षाकर्मियों की जानें ली है। सीपीआई माओवादी को विश्व का चौथा सबसे खतरनाक संगठन करार देते हुए 2018 की अमेरिकी स्टडी में कहा गया कि भारत में हुए 53 प्रतिशत हमलों में इसका हाथ रहा है। हालांकि, इस अध्ययन के मुताबिक, भारत में 2016 और 2017 के बीच नक्सली हमलों में कमी आई है। नक्सलवाद सिर्फ देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि राजनीतिक और आर्थिक समस्या के साथ-साथ एक विकट सामाजिक समस्या भी है। नक्सलवाद ने अब तक हजारों लोगों की जानें ली हैं। जब भी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरों की बात आती है, तो नक्सलवाद सबसे पहले आता है। लेकिन अब वक्त बदल रहा है। इतिहास गवाह है कि वैचारिक भटकाव, स्वार्थलिप्सा और छलावा जैसी प्रवृत्तियां किसी भी आंदोलन या क्रांति की कब्रगाह साबित होती हैं। ऐसा ही कुछ नक्सल आंदोलन के साथ हो रहा है। माओवादी विचारधारा या कथित क्रांति से मोहभंग की लगातार आ रही खबरें इन दिनों दंडकारण्य के जंगलों में जबरदस्त हलचल पैदा कर रही हैं। प्राय: रोजाना ही नक्सलियों के आत्मसमर्पण करने और हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास की मुख्यधारा के सहयात्री बनने की खबरें बता रही हैं कि गलियारे का लाल रंग तेजी से फीका पड़ता जा रहा है। जिन्होंने कभी विचारधारा के नाम पर बंदूकें उठाई थीं, आज वे व्यवस्था के मददगार बन रहे हैं। सवाल है कि नक्सलवाद की जमीन कैसे हिल रही है?
अभी हाल ही में दंतेवाड़ा जिले के कुआकोंडा ब्लॉक स्थित नहाड़ी गांव से खबर आई कि ग्रामीणों ने वहां ढहाए गए एक स्कूल की इमारत दोबारा खड़ी कर दी है। 13 साल पहले इस स्कूल को नक्सलियों ने बम से उड़ा दिया था। तब से गांव के बच्चों को घने जंगलों के बीच 7 किमी का सफर तय करके एक अन्य स्कूल जाना पड़ रहा था। इधर हाल ही में जब सुरक्षाबलों ने वहां शिविर लगाया तो नहाड़ी के ग्रामीणों ने नक्सली डर और धमकियों को दरकिनार करते हुए एक बड़ी झोपड़ी तैयार की और उस पर एस्बेस्टस की छत डालकर स्कूल खड़ा कर दिया। हाल के दिनों में दंतेवाड़ा के अलावा सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जैसे धुर नक्सल प्रभावित जिलों से दर्जनों नक्सली बंदूक से बदलाव लाने के भ्रम से बाहर आकर हथियार डाल चुके हैं। रक्षाबंधन के मौके पर एक नक्सली अपनी बहन की पुकार पर हमेशा के लिए घर लौट आया। प्रभावित इलाके के कई अन्य गांवों ने भी नक्सलवाद को आईना दिखाना शुरू कर दिया है। अभी पिछले दिनों नक्सलियों के शहीदी सप्ताह जैसे अहम मौके पर कुछ गांवों में तो अलग ही साहसिक पहल देखने को मिली। सुरक्षाबलों के अभियान के दौरान मारे गए नक्सलियों की याद में निर्मित कई पक्के स्मारकों को ग्रामीणों ने हथौड़े और फावड़े से ढहा दिया। उन्हें इस बात का डर नहीं था कि नक्सली संगठन इसे किस तरह से लेंगे। एक तरह से यह व्यवस्था के प्रति जंगल की नाराजगी या फिर विभ्रम दूर होने के संकेत हैं। क्षेत्रवासियों को शायद अब ऐसा लगने लगा है कि पुलिस और प्रशासन उनके दुश्मन नहीं, बल्कि मददगार हैं। लोगों को अहसास हो गया है कि विकास और हक दिलाने के नाम पर लंबे समय से चल रहे इस कथित क्रांति के बावजूद आदिम समाज आज भी जस का तस वहीं खड़ा है। दूसरी ओर, नक्सल नेता और कमांडर ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं। इनके पास अथाह पैसा है और इनके बच्चे जंगलों से बहुत दूर महानगरों में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं। ये सारी बातें छन-छनकर जंगलों में भी पहुंच रही हैं और नक्सलवाद तेजी से अपनी सहानुभूति खो रहा है। उससे तो यही लगता है कि करीब चार दशक से रक्त-पथ पर लहूलुहान दंडकारण्य बदलाव की करवट लेने जा रहा है।
दरअसल, पिछले एक साल के दौरान दंडकारण्य में नक्सली आंदोलन के 9 बड़े माओवादी नेताओं की मौत हो गई है। इससे आंदोलन कमजोर पड़ता जा रहा है। ऐसे में नक्सली नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई है। इसका प्रभाव यह पड़ा है कि बड़ी संख्या में नक्सलियों का आंदोलन से मोहभंग हो गया है। वे अब मुख्यधारा में लौटने के लिए पुलिस के सामने सरेंडर कर रहे हैं।
तेजी से सिकुड़ रहा नक्सली आंदोलन
दंडकारण्य समेत देशभर में तेजी से सिकुड़ रहा नक्सली आंदोलन 9 बड़े नक्सली नेताओं की मौत से और भी कमजोर हो गया है। दंडकारण्य में साढ़े तीन दशक तक नक्सलवाद की कमान संभालने वाले रावुलू श्रीनिवास उर्फ रमन्ना की मौत के 8 महीने बाद भी नक्सली उसकी जगह नया नेता नहीं तलाश पाए हैं। ऐसे में आधा दर्जन से अधिक बड़े नेताओं की मौत से नक्सल संगठन में बिखराव की आंशका जताई जा रही है। रमन्ना दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सचिव तथा सेंट्रल कमेटी का सदस्य था। उसकी मौत से नक्सली आंदोलन को बड़ा झटका लगा है। इसका खुलासा नक्सली संगठनों ने शहीदी सप्ताह के दौरान पर्चा जारी कर किया था। उसमें रमन्ना के अलावा 8 और बड़े नेताओं की मौत का ब्यौरा दिया गया है। नक्सलियों ने माना है कि बीते एक साल में बीमारी, मुठभेड़ और कथित मुठभेड़ों में उनके 105 साथी मारे गए हैं। यह आंकड़ा देशभर में मारे गए नक्सलियों से संबंधित है। बिहार-झारखंड के चार, दंडकारण्य के 67, आंध्र-ओडिशा बॉर्डर इलाके के 14, सेंट्रल रिजर्व कमेटी नंबर दो का एक सदस्य, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन के 9 तथा पश्चिमी घाट इलाके के 4 नक्सली बीते एक साल में मारे गए हैं। नक्सलियों ने मौत से हुए नुकसान के क्रम में रमन्ना की मौत को सबसे ऊपर रखा है।
- रायपुर से टीपी सिंह