26-Dec-2020 12:00 AM
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अगले आम चुनाव में अभी तीन साल हैं। कांग्रेस चाहे तो उसके पास एक नए नेतृत्व में खुद को तैयार करने और दूसरे विपक्षी दलों के साथ गठबंधन बनाने के लिए यह समय काफी है। अपनी पार्टी और अपने देश का हित देखते हुए गांधी परिवार को अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को ही नहीं बल्कि पूरी पार्टी को ही अलविदा कह देना चाहिए। अगर वे पार्टी में बने रहे तो एक वैकल्पिक सत्ता केंद्र बना रहेगा जो सिर्फ साजिशों और असंतोष के लिए ईंधन देने का काम करेगा।
कांग्रेस इन दिनों दुविधा में फंसी हुई है। क्योंकि न राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर वापस आने को फिलहाल तैयार हैं और न ही 'भारत यात्राÓ जैसी जनसंवाद की कोई विस्तृत योजना कांग्रेस की ओर से प्रस्तावित है। मोदी के नेतृत्व में देश आर्थिक ही नहीं, अन्य मोर्चों पर भी पस्त नजर आ रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी के लिए बड़ा अवसर है। लेकिन जैसी तैयारी और घेरेबंदी की जरूरत है, वह कांग्रेस नेतृत्व में नजर नहीं आती। राहुल और प्रियंका गांधी की ओर से रोजाना विभिन्न मसलों पर ट्वीट किए जाते हैं, पर उनकी आलोचना किसी आक्रोश की संगठित शक्ति बन जाए, ऐसी कोशिश नहीं दिख रही।
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी स्थिति से बेचैन हैं। 23 वरिष्ठ नेताओं के एक समूह की ओर से पिछले दिनों कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी गई थी। बिहार में सरकार बनाने से विपक्षी महागठबंधन के चूक जाने के बाद इस समूह की ओर से फिर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कपिल सिब्बल जैसे नेता खुलकर नेतृत्व की कमजोरी पर सवाल उठा रहे हैं। दिक्कत यह है कि जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हर स्तर पर नेतृत्व चुनने को रामबाण इलाज बताया जा रहा है, उस पर इस समूह के लोग भी पूरी तरह खरे नहीं उतरते। सिब्बल जैसे नेता सरकार रहने पर केंद्रीय मंत्री और न रहने पर सुप्रीम कोर्ट की वकालत के तय ढर्रे पर जिंदगी जीते हैं। संगठन खड़ा करने या उसमें योगदान देने की उनकी कोई भूमिका नजर नहीं आती। लेकिन क्या ऐसी कोई योजना है भी जिसके तहत ऐसे नेताओं के सामने स्पष्ट कार्यभार पेश किया जाए?
सोनिया गांधी ने आर्थिक, विदेशी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों की समितियां जरूर बनाई हैं, लेकिन उनसे यह कमी पूरी होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसमें शक नहीं कि राहुल गांधी जैसा नेता मध्यमार्गी राजनीति में फिलहाल दूसरा नहीं है। कोरोना महामारी से लेकर अर्थव्यवस्था तक को लेकर राहुल गांधी लगातार जो आशंकाएं जता रहे थे, वे सब सही साबित हुई हैं। लेकिन वे दार्शनिक ज्यादा और राजनेता कम नजर आ रहे हैं। उन्होंने 'फासीवादÓ से लेकर 'मनुवादÓ तक को निशाना बनाते हुए कांग्रेस के शीर्ष से एक नई भाषा की गूंज दी है, लेकिन संगठन और जनाधार में इसे लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं है।
किसी भी संगठन में कार्यकर्ताओं के जूझने की दो वजहें होती हैं। एक तो विचारधारा, दूसरी स्वार्थ। केंद्र और ज्यादातर राज्यों में सत्ता से बाहर हो चुकी कांग्रेस में कार्यकर्ताओं का निजी स्वार्थ पूरा करने का ज्यादा सामर्थ्य नहीं बचा है और जो कार्यकर्ता विचारधारा की वजह से हैं, उनके सामने भी स्थिति अमूर्त है। जिस नई आर्थिक नीति और उदारीकरण की नीति को कभी कांग्रेस ने शुरू किया था, मौजूदा सरकार उसे ही बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ा रही है। कांग्रेस की ओर से 'क्रोनी कैपिटलिज्मÓ को बढ़ावा देने की चाहे जितनी आलोचना की जाए, मूल नीतियों की न तो कोई समीक्षा की गई है और न उन्हें उलटने का कोई प्रस्ताव ही है। यह सच है कि उसने संगठन में दलित और पिछड़ी जातियों को हाल के दिनों में ज्यादा महत्व दिया है, लेकिन डॉ. अंबेडकर के 'जाति उच्छेदÓ के कार्यक्रम को अपनाने या निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसी मांग करने का साहस उसके पास नहीं है।
ऐसे में सत्ता में दलित-पिछड़ी जातियों को सांकेतिक भागीदारी देकर अपने विस्तृत 'हिंदुत्व प्रोजेक्टÓ को पूरा करने में जुटी भाजपा के सामने वह कोई गंभीर चुनौती पेश करे भी तो कैसे? गांधी परिवार की सीमा बताने वालों की कमी नहीं लेकिन यह भी सच है कि यह परिवार ही कांग्रेस की शक्ति भी है। जो भी नेता नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं, उनमें किसी के पास अपना कोई राष्ट्रव्यापी आधार नहीं है। सच्चाई यह भी है कि राजीव गांधी की शहादत के बाद इस परिवार ने राजनीति से दूरी बना ली थी। कांग्रेस के पास पूरा अवसर था कि वह बिना गांधी परिवार के खड़ी हो जाए, लेकिन पार्टी पूरी तरह असफल रही। जाहिर है, कांग्रेस के लिए गांधी परिवार बोझ नहीं, मजबूरी है।
कांग्रेस में अकेला गांधी परिवार है जिस पर कार्यकर्ता शर्त लगा सकते हैं कि वह महात्मा गांधी की हत्या करने वाली विचारधारा के सामने समर्पण नहीं करेगा। तमाम कमजोरियों के बावजूद कांग्रेस अब भी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है जो मानते हैं कि राहुल गांधी इतिहास की पुकार हैं। लेकिन क्या किसी नए आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम और जमीनी गतिशीलता के बगैर इस पुकार को एक ठोस जनाधार में बदला जा सकता है? इस सवाल का जवाब कांग्रेस नेतृत्व को भी ढूंढना होगा। खासतौर पर तब, जब वह मानता है कि संघ और भाजपा के हमले से 'भारतÓ नाम का विचार खतरे में है।
जिस तरह बिहार के चुनाव में हार के लिए पार्टी हद दर्जे तक असदुद्दीन ओवैसी को जिम्मेदार मान रही हैं, ऐसे ही करीब पांच साल पहले असम विधानसभा चुनाव में हुई हार के लिए एआईडीयूएफ के मौलाना बदरूद्दीन अजमल को जिम्मेदार माना गया था। कहा गया था कि अगर उनकी पार्टी ने मुस्लिम वोटों में बंटवारा नहीं किया होता तो पूर्वोत्तर के किसी राज्य में जिस तरह भाजपा की पहली बार एंट्री हो रही है, वह नहीं होती। इस तर्क को सही साबित करने के लिए आंकड़ों का सहारा लिया गया, बताने की कोशिश हुई कि एआईडीयूएफ ने किस हद तक वोटों का बंटवारा किया। लेकिन दिलचस्प यह है कि जिन मौलाना अजमल को पार्टी हार के लिए जिम्मेदार मान रही थी, वे जब कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोशिश में थे तो पार्टी उनके साथ कोई रिश्ता रखने को राजी नहीं हो रही थी। असम में कांग्रेस की लोकल लीडरशिप ने मौलाना अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के साथ इस बात पर चुनावी गठबंधन करने से इंकार कर दिया था कि मौलाना की छवि मुस्लिम परस्त नेता की है, उनके साथ गठबंधन करने पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की गुंजाइश ज्यादा होगी और वह कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है।
मौलाना अजमल से दूरी बनाने के बावजूद असम में कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ। भाजपा अपने गठबंधन के साथ सत्ता में आ गई और कांग्रेस पार्टी, जो राज्य की 122 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी, वह महज 26 सीटों पर जा सिमटी। उधर एआईयूडीएफ 74 सीटों पर चुनाव लड़कर 13 सीटों पर जीतने में कामयाब रहा। चुनाव के नतीजे आने के बाद मौलाना अजमल का बयान आया था, 'राज्य में भाजपा को रोकने के लिए हम गठबंधन करना चाह रहे थे, कांग्रेस राजी नहीं हुई तो राज्य में हम कांग्रेस को जिताने के लिए राजनीति नहीं कर रहे हैं।Ó ऐसा ही कुछ बिहार में भी हुआ। ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम राज्य में महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहती थी, लेकिन यहां भी उससे दूरी बनाने का ही फैसला हुआ। वजह वही थी कि ओवैसी का साथ नुकसान का सौदा साबित हो सकता है। ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ जाएगा।
मुस्लिम परस्त छवि से बचने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम नेताओं को उम्मीदवार बनाने में भी कंजूसी दिखाई, उसके हिस्से जो 70 सीटें आईं, उनमें महज 12 पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। ओवैसी ने बिहार चुनाव के दरम्यान कई मौकों पर यह कहा भी कि कांग्रेस और अपने को सेक्युलर कहने वाले दूसरे दलों को मुसलमानों के वोट तो अच्छे लगते हैं, लेकिन उनकी दाढ़ी और टोपी उन्हें पसंद नहीं। उन्हें मुसलमानों से ध्रुवीकरण का खतरा तो दिखता है, लेकिन वे फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ अपनी लड़ाई मुसलमानों के कंधे पर बंदूक रखकर ही लड़ना चाहती हैं। इससे पहले 2019 के महाराष्ट्र चुनाव में भी हार का ठीकरा ओवैसी पर ही फोड़ा गया, लेकिन वहां भी ओवैसी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का हिस्सा बनने के ख्वाहिशमंद थे, लेकिन उनसे बात करने की कोई जरूरत नहीं समझी गई।
कांग्रेस को दुविधा से बाहर आना ही होगा
70 के दशक में एक फिल्म आई थी, हीर-रांझा। इस फिल्म के एक गाने की शुरुआती लाइनें कुछ यूं थीं, 'मिलो न तुम तो हम घबराएं, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है?Ó इस गाने की ये लाइनें जेहन में अचानक इसलिए आईं कि कांग्रेस मुसलमानों को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रही है। उसे मुसलमानों का वोट तो चाहिए, लेकिन वह मुसलमानों से दूरी भी दिखाना चाहती है। दरअसल 2014 के चुनाव में पार्टी की जबरदस्त हार के बाद सीनियर लीडर एके एंटनी की अगुवाई वाली इंटरनल कमेटी ने पाया था कि मुसलमानों के तुष्टिकरण की नीति कांग्रेस की हार की मुख्य वजह है। उसके बाद पार्टी ने 'सॉफ्ट हिंदुत्वÓ के रास्ते पर चलने का फैसला किया, लेकिन करीब छह साल के दरम्यान यह कोशिश करते रहने के बावजूद उसे न तो खुदा ही मिला और न विसाल-ए-सनम। हां, उसे हर हार का ठीकरा फोड़ने के लिए किसी एक अदद चेहरे की तलाश जरूर हुई।
'सॉफ्ट हिंदुत्वÓ पर कामयाबी क्यों नहीं
सवाल उठता है कि कांग्रेस ने भाजपा के 'हिंदुत्ववादी एजेंडेÓ से पार पाने के लिए 'सॉफ्ट हिंदुत्वÓ वाले रास्ते पर चलने का जो फैसला किया, उसमें उसे कामयाबी क्यों नहीं मिल पाई? इस सवाल का जवाब पाने के लिए 2017 के गुजरात चुनाव को रीकॉल करना होगा। दरअसल यह वह चुनाव था, जिसमें राहुल गांधी बिल्कुल एक नए अवतार में देखे गए थे। उनका पूरा चुनावी अभियान इस तरह से शेड्यूल किया गया था कि 'मंदिर दर्शनÓ जरूर हो। राहुल ने चुनाव अभियान के दौरान गुजरात के 27 मंदिरों में हाजिरी लगाई थी। पार्टी की तरफ से यहां तक दावा कर डाला गया था कि राहुल सिर्फ एक हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि वे जनेऊधारी भी हैं। इन सबके बावजूद कांग्रेस गुजरात नहीं जीत सकी। भले ही नजदीकी मुकाबला रहा हो, लेकिन भाजपा एक बार फिर से गुजरात जीतने में कामयाब रही थी। वजह यह थी कि कांग्रेस ने खुद चुनाव को 'हिंदुत्वÓ की पिच पर ला खड़ा किया और उस 'पिचÓ पर भाजपा को हराना बहुत आसान नहीं है। वह तो उस 'पिचÓ पर खेलने की इतनी अभ्यस्त है कि कांटे के मुकाबले में भी जीत हासिल कर सकती है। या यूं समझिए कि अगर हमें कोई प्रोडक्ट पसंद है तो भी हम बड़े 'ब्रैंडÓ का प्रोडक्ट लेने को तरजीह देते हैं। कांग्रेस को समझना होगा कि दो नावों पर सवारी करके किसी दरिया को पार नहीं किया जा सकता है। उसमें डूबने का खतरा ज्यादा रहता है। आधे-अधूरे मन से कोई बात नहीं बनने वाली।
- इन्द्र कुमार