कांग्रेस के लिए निर्णायक घड़ी
07-Jan-2021 12:00 AM 3579

 

राहुल गांधी को दोबारा अध्यक्ष बनाने से पहले कांग्रेस को एक सवाल का जवाब जरूर खोजना चाहिए। वह यह कि राहुल कांग्रेस की समस्याओं का समाधान हैं या खुद समस्या हैं। हालांकि कांग्रेस के लोग इसी सवाल से भाग रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें जवाब पता है।

दिल से या बेदिल से राहुल गांधी एक बार फिर से। सोनिया गांधी के साथ पार्टी के असंतुष्टों और संतुष्टों की बैठक का यही नतीजा है। सोनिया गांधी बेटे से इतर देखने को तैयार नहीं हैं और असंतुष्टों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। वे बदलाव तो चाहते हैं, लेकिन उसके लिए जो आवश्यक है उसकी न तो उनके पास ताकत है और न ही राजनीतिक इच्छाशक्ति। उन्होंने अभी तक ठहरे हुए शांत पानी में कंकड़ फेंकने का काम किया है। सोनिया को भी पता है कि वह असंतुष्टों से लड़ने की ताकत खो चुकी हैं। ऐसे में यथास्थिति के अलावा दोनों खेमों के पास कोई रास्ता नहीं है।

उम्मीद का स्तर गिर जाए तो ऐसा ही होता है। सोनिया गांधी इस बात से संतुष्ट हो गई लगती हैं कि बैठक में राहुल गांधी के दोबारा अध्यक्ष पद संभालने की बात का विरोध नहीं हुआ। असंतुष्टों को लगा कि पहली बार पूरा परिवार विनम्रता की प्रतिमूर्ति के रूप में उपस्थित हुआ। यही प्रगति है। इसीलिए सोनिया गांधी के साथ चली करीब 5 घंटे की बैठक में पिछली बार की तरह दोनों खेमों की ओर से आक्रामकता नदारद थी। शायद गांधी परिवार के तीनों सदस्यों खासतौर से राहुल की अप्रत्याशित विनम्रता से अंसतुष्ट खेमा हतप्रभ रह गया हो।

दरअसल दोनों खेमे युद्ध को टाल रहे हैं। इसलिए नहीं कि वे युद्ध नहीं चाहते, बल्कि इसलिए कि दोनों के पास लड़ने के लिए हथियार नहीं है। पूरी कांग्रेस पार्टी पराजय की मानसिकता से ग्रस्त है। ऐसी मानसिकता व्यक्ति और संगठन को सोच-विचार में असमर्थ बना देती है। कांग्रेस फिलहाल इसी दौर से गुजर रही है। सवाल है कि कांग्रेस को जरूरत किस चीज की है और उसे मिल क्या रहा है। पार्टी को जरूरत एक ऐसे नेता की है जो उसे पराजय की इस मानसिकता से निकालकर अगले राजनीतिक युद्ध के लिए तैयार कर सके। क्या राहुल गांधी में वह क्षमता है? पिछले 16 वर्षों के दौरान तो राहुल गांधी इस क्षमता के दर्शन नहीं करा पाए हैं। फिर ऐसा क्या बदल गया है कि उन्हें एक बार फिर अध्यक्ष पद सौंपने की तैयारी है। राजनीतिक परिदृश्य पर कांग्रेस के लिए कुछ नहीं बदला है, पर कांग्रेसियों में जरूर बदलाव आया है। उनकी अपेक्षाएं घट गई हैं।

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी जिस तरह पार्टी अध्यक्ष पद छोड़कर गए थे उससे लगता था कि वह जल्दी लौटने वाले नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अब उनके परिवार से कोई अध्यक्ष नहीं बनेगा। उसी बैठक के विस्तार में सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बन गईं। फिर राहुल गांधी ने डेढ़ साल पहले ऐसा क्यों कहा था? दरअसल उनको और उनके परिवार को उम्मीद थी कि राहुल का ऐसा बयान आते ही कांग्रेस में हाहाकार मच जाएगा। देशभर से 'राहुल लाओ देश बचाओÓ की गूंज सुनाई देगी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। देशभर के कांग्रेसियों को तो छोड़िए सोनिया के साथ हुई बैठक में भी अंबिका सोनी के 'राहुल लाओÓ के प्रस्ताव का विरोध भले ही न हुआ हो, मगर उसे समर्थन भी नहीं मिला।

किसी समस्या का हल खोजने के लिए पहली जरूरत है उस समस्या को स्वीकार करना और पहचानना। कांग्रेस ऐसा करने में असमर्थ दिखती है। इतना ही नहीं वह कोई नया राष्ट्रीय विमर्श खड़ा करने में लगातार नाकाम हो रही है। उसका संगठन हारी हुई सेना के शिविर जैसा दिखता है। वहां तलवार पर सान चढ़ाने वालों से ज्यादा बड़ी संख्या अपने घाव सहलाने वालों की है। यानी कांग्रेस समस्या को पहचान ही नहीं पा रही है। यदि पहचानने का प्रयास करती तो पहले गांधी परिवार से ही दो प्रश्न तो पूछने ही चाहिए थे कि असम में हेमंत बिस्व सरमा और मप्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी छोड़कर क्यों गए और इसके लिए कौन जिम्मेदार है? और दूसरा यह कि बिहार विधानसभा चुनाव के बीच राहुल गांधी छुट्टी मनाने शिमला क्यों चले गए? क्या ऐसी सहूलियत पार्टी के दूसरे नेताओं को भी उपलब्ध है?

चूंकि राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष नहीं हैं तब आखिर वह किस हैसियत से सभी सांगठनिक फैसले ले रहे हैं। इन फैसलों की जवाबदेही किसकी होगी? सोनिया या राहुल की? पिछले लोकसभा चुनाव के पहले से ही पार्टी की उप्र इकाई प्रियंका के हवाले है। बीते दिनों उप्र में 7 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए। उनमें से 4 पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई। प्रियंका से कोई सवाल पूछेगा? बिना जवाबदेही के कोई संगठन आगे बढ़ना तो दूर चलना भी मुश्किल है। यह समझ लीजिए कि प्रियंका से कोई सवाल न पूछकर पार्टी के नीति निर्माता किसी दूसरे नेता से सवाल करने का नैतिक अधिकार खो देते हैं।

कहते हैं कि बिना अमल के परिकल्पना या सपने का कोई अर्थ नहीं। कांग्रेस और राहुल गांधी के पास सपने हैं, परंतु उन्हें साकार करने की कुवत नहीं बची है। कांग्रेस को जरूरत है ऐसे नेता या नेताओं की जो पार्टी के लिए सपना देखें और उसे पूरा करने का उद्यम करें। अपने राजनीतिक विरोधी की ट्विटर या ऐसे अन्य मंचों पर आलोचना कर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री समझकर कांग्रेस का भला नहीं होने वाला। कोई रेस जीतनी है तो उसके लिए मैदान में उतरना और दौड़ना पड़ता है। किनारे खड़े होकर ताली बजाने से आज तक कोई रेस नहीं जीती। कांग्रेस जिस हालत में है उसमें उसे ऐसा नेता चाहिए जिसमें जोखिम और उसकी जवाबदेही लेने का माद्दा हो।

राहुल गांधी को दोबारा अध्यक्ष बनाने से पहले कांग्रेस को एक सवाल का जवाब जरूर खोजना चाहिए। वह यह कि राहुल कांग्रेस की समस्याओं का समाधान हैं या खुद समस्या हैं। हालांकि कांग्रेस के लोग इसी सवाल से भाग रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें जवाब पता है। सच्चाई तो यह भी है कि कांग्रेस केंद्रीय स्तर पर खत्म हो गई है। उसका जो भी वजूद है वह राज्य इकाइयों की वजह से है। उसकी समस्या का हल वहीं से निकलेगा, दस जनपथ या गुरुद्वारा रकाबगंज रोड से नहीं। पार्टी में दूसरी पीढ़ी के नेता हाशिए पर हैं। जो नहीं हैं, मानकर चलिए कि वे राहुल गांधी के कृपापात्र हैं। कृपापात्र बोझ तो बन सकते हैं, बोझ उठाने वाले नहीं। इन बोझ बने नेताओं से मुक्ति पाने में ही कांग्रेस की मुक्ति का मार्ग है। फिर वह परिवार के सदस्य हों या कोई और। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि इस बात को समझे कौन और समझाए कौन।

कांग्रेस के भीतर आजकल बीच की लकीर (धर्मनिरपेक्ष) पर चलने को लेकर इसलिए भी भय रहने लगा है, क्योंकि उसकी अपनी ही पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश की जनता के भीतर यह बात पैठ रही है कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी बनकर रह गई है या मुस्लिमों के प्रति उसका रुझान ज्यादा है। जबकि सच यह है कि कांग्रेस के पास मुस्लिमों का समर्थन 30 फीसदी भी नहीं रह गया है। हाल के चुनाव नतीजों से यह साफ जाहिर हो जाता है। नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा के लिए आरएसएस ने हिंदुत्व की जो नई परिभाषा अब गढ़ी है, उसमें उसका नेता अब चाहे मोदी, शाह या योगी में कोई भी रहे, कांग्रेस और बाकी विपक्ष के लिए स्थिति एक-सी ही रहेगी; तब तक, जब तक कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल जनता को यह नहीं समझा देते कि भाजपा की लाइन सिर्फ हिंदू वोटों के लिए है, उनके हितों की रक्षा और इससे उनकी मूल समस्याएं हल करने के लिए नहीं। कांग्रेस और बाकी विपक्षी दल कोशिश करें, तो वो जनता को मुद्दों पर मतदान करने वाली जनता बनाया जा सकता है। बिहार में विधानसभा के हाल के चुनाव में तेजस्वी यादव ने बहुत आक्रामक तरीके से जात-पात पर मतदान करने वाले इस राज्य में जोखिम लेकर रोजगार को चुनाव का मुद्दा बनाकर भाजपा से ज्यादा सीटें जीतकर यह कर दिखाया।

इसे कांग्रेस में फिर घमासान मच गया है। बिहार चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 19 ही सीटें मिलने से कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता फिर मुखर हुए हैं। लेकिन यह दौर नेतृत्व की निंदा तक ही सीमित है। सुझाव कहीं से नहीं आ रहा। याद रहे कि दो साल पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मप्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर इन और बहुत-से पार्टी नेताओं ने राहुल गांधी को कांग्रेस का एकछत्र नेता कहा था। राहुल कांग्रेस में ऐसे नेता हैं, जो सोनिया गांधी के विपरीत सोच रखते हैं। जबकि पार्टी में बहुत-से ऐसे नेता हैं, जो इस बात पर जोर देते हैं कि उन्हें सोनिया गांधी जैसा बनना होगा। लेकिन राहुल के नेतृत्व की आलोचना करते हुए कोई भी नेता विकल्प नहीं सुझाता। भूपेश बघेल जैसे नेता हैं, जो उम्मीद जगाते हैं और वह पूरी तरह राहुल के साथ है।

बहुत पहले उप्र के नेता जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के खिलाफ अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। वह हार गए थे, लेकिन इससे कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र की आवाज जिंदा रही, भले यह संदेश भी गया कि गांधी परिवार ही कांग्रेस में सर्वमान्य नेतृत्व है। आज कौन है, जो चुनाव में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव में उतर सके? तहलका से बात करते हुए इस सारे विवाद से खुद को अलग रखे हुए कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पार्टी के पास एक भी ऐसा नेता नहीं, जो पूरी कांग्रेस में गांधी परिवार के नेताओं की तरह सर्वमान्य नेता होने का दावा कर सके। उन्होंने कहा कि गांधी परिवार से बाहर का नेतृत्व लाने के लिए तो शरद पवार जैसे पार्टी से बाहर के किसी नेता को इम्पोर्ट करना पड़ेगा, क्योंकि गांधी परिवार से ज्यादा सर्वमान्य नेतृत्व कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं के पास नहीं है। उन्होंने कहा कि शायद पार्टी नेता असली समस्या की तरफ नहीं देख रहे और नेतृत्व के इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं। असली समस्या भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे का पर्दाफाश करते हुए उससे निपटना है और हालात जब माकूल होंगे, तो यही राहुल गांधी सफल नेता बन जाएंगे।

मजबूत सलाहकार की भी कमी

कांग्रेस के पास इस समय मजबूत सलाहकार की भी कमी है। अशोक गहलोत जैसा नेता कांग्रेस की जरूरत है। राहुल अध्यक्ष हैं ही नहीं, लेकिन भाजपा के निशाने पर सिर्फ वही हैं। भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा तक सभी हर मुद्दे पर राहुल गांधी को निशाने पर रखते हैं। एक-दो नेताओं को छोड़कर कितने कांग्रेस नेता हैं, जो राहुल पर भाजपा नेताओं के हमले के वक्त उन पर मजबूत जवाबी हमला करते हैं? हां, नेतृत्व की आलोचना यदा-कदा करते रहते हैं। राहुल सच में इतने ही कमजोर नेता होते, तो भाजपा दिन-रात उनकी निंदा में भला क्यों अपना वक्त बर्बाद करती? कांग्रेस की तरफ से भाजपा को जवाब नहीं मिलने से राहुल गांधी कांग्रेस की कमजोर कड़ी बन गए हैं। राहुल खुद भी ममता बनर्जी जैसे आक्रामक नेता नहीं हैं, जो ईंट का जवाब पत्थर से दे सकें। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। कोरोना का दबाव कम होते ही कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, शायद जनवरी या फरवरी तक। इस पर तैयारी शुरू हो चुकी है।

कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर

2014 और 2019 में आम चुनाव के अलावा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। इसके कारणों की पड़ताल करके तत्काल उनमें सुधार की आवश्यकता है। अन्यथा कांग्रेस इस कदर पतन की ओर चली जाएगी कि उसे दोबारा उबरना मुश्किल हो जाएगा। अपने आधारभूत वोट बैंक का खिसकना और युवाओं का पार्टी पर से विश्वास उठना उसके लिए गंभीर चिंता का विषय है। पिछले दो आम चुनावों में भारत में 18.7 करोड़ वोटर ने पहली बार मतदान किया। 2014 में 10.15 करोड़ और 2019 में 8.55 करोड़ युवा मतदाता जुड़े। युवाओं ने मोदी और भाजपा के लिए भारी मतदान किया। भाजपा का वोट शेयर 2009 में 7.84 करोड़ से बढक़र 2014 में 17.6 करोड़ और 2019 में 22.9 करोड़ हो गया। इसके विपरीत कांग्रेस ने जहां 2009 में 1.23 करोड़ वोटर गंवाए। हालांकि बाद में स्थिति में मामूली सुधार हुआ। लेकिन 2019 के चुनावी फैसले के करीब सवा साल बाद भी कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन में निरंतर गिरावट के कारणों का ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण नहीं किया है। कई राज्यों में पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ समर्थकों में कमी देखी गई है। सीडब्ल्यूसी प्रभावी रूप से भाजपा सरकार के विभाजनकारी एजेंडे और जनविरोधी नीति के खिलाफ जनमत जुटाने में सही मार्गदर्शन नहीं कर पा रही है। अब जो बैठकें भी होती हैं, वो अंतर्कलह में उलझी होती हैं, जिससे राष्ट्रीय एजेंडा और देश के अहम मुद्दे दब जाते हैं।

-  इन्द्र कुमार

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