01-Sep-2022 12:00 AM
5369
मप्र वन संपदा से परिपूर्ण प्रदेश है। प्रदेश के वनों में कई प्रकार की वन औषधियां पाई जाती हैं। जिनसे बनी दवाईयां देश-विदेश में सप्लाई की जाती हैं। अब मप्र लघु वनोपन संघ वनों में मिलने वाले फलों से पेय पदार्थ बनाने की तैयारी कर रहा है। संघ का मानना है कि स्वास्थ्यवर्धक ये पेय पदार्थ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों को चुनौती देंगे।
देश-विदेश में शीतल पेयपदार्थ के रूप में इस्तेमाल होने वाले कोकाकोला और पेप्सी जैसे उत्पादों को टक्कर देने के लिए मप्र लघु वनोपज संघ ऐसे पेयपदार्थ बना रहा है जिसमें स्वाद के साथ सेहत का भी ध्यान रखा जाएगा। मप्र राज्य लघु वनोपज संघ शहद, जामुन सहित अन्य फलों आदि से कोल्ड ड्रिंक बनाने की तैयारी कर रहा है। इसे ब्रांड विंध्या वैली के तहत जम्बूकोला, मधुकोला, बेलकोला सहित छह तरह के नाम से बाजार में उतारा जाएगा। बच्चों से लेकर वृद्धों तक की पसंद को देखते हुए इसे बनाया जाएगा। यह कोला संघ की औषधीय उत्पाद बनाने वाली एजेंसी तैयार करेगी। इसमें औषधीय गुण भी होंगे।
वनोपज संघ भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण से भी इसकी अनुमति लेगा। इन पेय पदार्थों को शुरू में छोटे स्तर पर मार्केट में उतारा जाएगा। प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए ब्रांड एम्बेसडर भी बनाया जाएगा। साथ ही एफएसएसएआई का पंजीयन लिया जाएगा। विंध्या हर्बल के तहत करीब 300 से ज्यादा आयुर्वेदिक उत्पाद का निर्माण कर बेचा जाता है। वनोपज संघ मौसम के अनुसार, अलग-अलग तरह के फ्लेवर का कोला तैयार करेगा, ताकि इनका उपयोग सेहत को दुरुस्त करने में भी हो। जम्बूकोला पेट और शुगर के मरीजों के लिए कामयाब रहेगा। प्रत्येक कोला का अपना औषधीय गुण होगा। यह ढाई किलो से लेकर आधा किलो तक की बॉटल में आएगा।
विटामिन से भरपूर फलों और शहद को आयुर्वेद में गुणकारी माना गया है। कोला के लिए बेल, शहद, जामुन, तेंदू और आंवला सहित अन्य फलों का संग्रहण जंगलों में रहने वाली आदिवासियों की समितियां करेंगी। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों की मदद से लघु वनोपज संघ इन जामुन और शहद से कोल्ड ड्रिंक बनाने में जुटा है। जामुन के गूदे को निकालकर इसमें जरूरी सामग्री मिलाकर इसकी कोल्ड ड्रिंक तैयार की जाएगी। वहीं शहद से भी इसी तरह कोल्ड ड्रिंक बनाई जाएगी। दोनों ड्रिंक लंबे वक्त तक खराब न हों इसके लिए फर्टिलाइज किया जाएगा। बताया जा रहा पेयपदार्थों का शुरुआती परीक्षण पूरा हो चुका है। मप्र लघु वनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह का कहना है कि कोला की वैराइटी तैयार की जा रही है। यह वैराइटी अभी टेस्टिंग कोल पर है। जल्द ही बाजार में आएगी। इसमें सेहत और स्वाद का बराबर ध्यान रखा जा रहा है।
आजकल के युवा कोल्ड ड्रिंक पीने के गजब के शौकीन हैं। गर्मियों में तो सभी कोल्ड ड्रिंक पीते नजर आते हैं, यहां तक कि सर्दियों में भी खूब शीतल पेय पीते हैं। यही कारण है कि कोला कंपनियां खासा लाभ कमा रहीं हैं। हालांकि अब जल्द ही एक हर्बल पेय आने वाला है जो कि मप्र राज्य लघु वनोपज संघ के ब्रांड विंध्य द्वारा बनाया जा रहा है। ये कोला जहां युवाओं का गला तर करने के साथ उन्हें शीतलता पहुंचाएगा वहीं उनकी ताकत भी बढ़ाएगा। वनोपज संघ के वैद्य लंबे अर्से से इस पर काम कर रहे थे। पहले चरण में करीब 50 लीटर शीतल पेय बनाया गया था, जिसका विभिन्न स्तर पर परीक्षण किया गया। खुद वनमंत्री और अधिकारियों ने भी पेय के फ्लेवर की काफी तारीफ की। इस पर संघ ने जामुन खरीदने की तैयारी शुरू कर दी और पेय के लिए अतिरिक्त शहद भी मंगाया। इन दोनों पेय को निषेचन यानि फर्टिलाइज कर तैयार किया जा रहा है जिससे ये लंबे समय तक खराब नहीं होंगे। अधिकारियों का तो दावा है कि ये पेय 18 महीने तक सुरक्षित रह सकते हैं। प्रारंभिक परीक्षणों में दोनों पेय पास हो चुके हैं। अब मांग के अनुसार उत्पाद तैयार होगा। ये पेय फिलहाल 200 मिलीलीटर की पैकिंग में लाया जा रहा है। गौरतलब है कि मप्र लघु वनोपन संघ कई प्रकार की औषधियों का निर्माण करता है, जिसका चिकित्सा में उपयोग होता है।
आदिवासी होंगे मालामाल
जंगल से संग्रहित फलों को सुरक्षित लाने और उसे प्रोसेसिंग करने का काम लघु वनोपज संघ के भोपाल के बरखेड़ा पठानी सहित औषधीय प्रोसेसिंग केंद्रों पर किया जाएगा। इससे मिलने वाले लाभांश में आदिवासी समितियों को भी शामिल किया जाएगा। ये, कोला कम लागत में तैयार होंगे, क्योंकि जितने तरह के कोला बनाए जा रहे हैं, उनका कच्चा माल जंगलों में पर्याप्त मात्रा में है। जिस मौसम में ये फल होते हैं, उस समय आदिवासी जंगलों से इसे संग्रहित करेंगे और उसे समितियों के जरिए वन विभाग को बेच देंगे। वन विभाग आदिवासियों को आत्मनिर्भर बना रहा है। उनसे जंगलों में व जड़ी-बूटियों, औषधीय उत्पादों और फलों का वन ग्राम समितियों के माध्यम से संग्रहण कराया जा रहा है। इसके लिए विभाग ने सभी औषधियों और फलों की दरें तैयार की हैं, ताकि निजी कंपनियां आदिवासियों से औने पौने दामों में इन्हें खरीदकर बाजार में महंगे दामों न बेच सकें।
- राकेश ग्रोवर