02-Jul-2020 12:00 AM
4105
दक्षिण एशिया वर्तमान में शक्ति प्रदर्शन, सौदेबाजी और गुटबंदी के दौर से गुजर रहा है। इसी क्रम में चीन ने हाल ही में बांग्लादेश को व्यापारिक प्रलोभनों से लुभाने की कोशिश की है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में घोषणा की है कि मत्स्य संसाधन और लेदर उत्पादों जैसे अन्य 97 प्रतिशत बांग्लादेशी उत्पादों पर चीन द्वारा कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इसका मतलब हुआ कि 97 प्रतिशत बांग्लादेशी निर्यात को चीन द्वारा लगाए जाने वाले टैरिफ से छूट मिलेगी। इसे ढाका और बीजिंग के संबंधों में बड़ी सफलता माना जा रहा है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने भी साफ कर दिया है कि इस समझौते का विरोध करने वाले और इसे अल्प विकसित बांग्लादेश के लिए खैरात जैसी शब्दावली प्रयुक्त करने वाले संकीर्ण मानसिकता के हैं।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि चीन लद्दाख जैसे अन्य मुद्दों पर बांग्लादेश को अपने साथ खड़ा करना चाहता है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि चीन दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसी देशों को ऐसे लुभावने व्यापारिक प्रस्ताव देकर भारत के साथ एक अप्रत्यक्ष और अघोषित व्यापारिक युद्ध में लगे रहना चाहता है। ऐसे समय में जब भारत के जनमानस के साथ-साथ आर्थिक व सामरिक विशेषज्ञों ने भारत को चीनी उत्पादों के आर्थिक बहिष्कार का सुझाव दिया है, ऐसे में दक्षिण एशिया में एक आर्थिक बढ़त लेने और उससे भी बड़ी बात दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के प्रयासों विशेषकर दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते (साफ्टा) को असफल बनाने की मंशा के साथ चीन व्यक्तिगत स्तर पर दक्षिण एशिया के देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की राह पर चलना चाहता है। इसलिए पाकिस्तान और मालदीव के बाद अब बांग्लादेश के तीसरे ऐसे दक्षिण एशियाई देश बनने की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता जिसके साथ चीन मुक्त व्यापार समझौते की राह पर चल पड़ा है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भारत 2011 से ही साफ्टा के तहत बांग्लादेशी उत्पादों को (केवल तंबाकू व अल्कोहल छोड़कर) शुल्क मुक्त बाजार पहुंच दे रहा है और हाल के वर्षों में दोनों देशों की सरकारों ने मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्र ही मूर्तमान स्वरूप प्रदान करने पर पारस्परिक सहमति भी बनाई है। इससे स्पष्ट है कि बांग्लादेश में भारत की आर्थिक संलग्नता को चीन स्वीकार नहीं कर पा रहा है। कुछ दिनों पहले चीन ने अपने फायदे के लिए वन बेल्ट रोड पहल से दुनियाभर के देशों के साथ गुटबाजी की है। चीन ने नेपाल के सामने यह प्रस्ताव भी रखा कि वह अपने स्कूलों में चीनी मंदारिन भाषा पढ़ाना अनिवार्य बना दे और इसे पढ़ाने वाले शिक्षकों को वेतन चीन देगा। ऐसे में यह कयास लगाना स्वाभाविक है कि कहीं चीन की मंशा नेपाल और बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों को दूसरा पाकिस्तान तो बनाने की नहीं है। एलायंस, नेटवर्क, ग्रिड बनाना गलत नहीं है, पर चीन का मकसद गलत है।
भारत ने बांग्लादेश के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में व्यापारिक संबंधों को विशेष तरजीह दी है और चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए ऐसा करना जरूरी भी है। भारत ने बांग्लादेश के साथ संबंधों को ऊंचाई देने के लिए जिन मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया है उनमें वस्तुओं और सेवाओं के द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि, बांग्लादेश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि, विकासात्मक साझेदारी को मजबूती देना, ऊर्जा परियोजनाओं पर जोर देना शामिल हैं। दक्षिण एशिया में भारत बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
भारत और बांग्लादेश में द्विपक्षीय स्तर पर कई ऊर्जा परियोजनाओं को भी चलाया जा रहा है जो आर्थिक के साथ ही सामरिक महत्व के भी हैं। भारत के एनटीपीसी के सहयोग से बांग्लादेश में मैत्री सुपर थर्मल पावर प्लांट लगाया गया है। इसे बांग्लादेश-इंडिया फे्रंडशिप पावर कंपनी के संयुक्त उपक्रम के रूप में विकसित किया गया है। यह तापीय विद्युत स्टेशन बांग्लादेश के खुलना क्षेत्र में लगाया गया है। इसके साथ 1,320 मेगावॉट का रामपाल कोयला चालित विद्युत स्टेशन भी बांग्लादेश में दोनों देशों के संयुक्त उपक्रम के रूप में विकसित किया जा रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच गहरा संबंध है।
सभी को बिजली पहुंचाने की राह होगी आसान
बांग्लादेश ने 2021 तक इलेक्ट्रिसिटी फॉर ऑल का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है जिसे पूरा करने में उसे भारत से लगातार मदद मिल रही है। बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा में भारत प्रभावी भूमिका निभा सकता है। यह काम शुरू भी हो चुका है। सीमा पार ऊर्जा व्यापार भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में उभरा है। बांग्लादेश को भारत की दक्षिण एशिया आधारित पड़ोसी प्रथम की नीति, उसकी ऊर्जा कूटनीति का एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ माना जाता है। सितंबर 2019 में बांग्लादेश ने भारत के रिलायंस पावर के साथ 718 मेगावॉट बिजली खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर किया है। इसके तहत अगले 22 वर्षों तक बांग्लादेश इससे बिजली खरीदेगा। 2019 में ही भारत ने बांग्लादेश के साथ एलपीजी खरीदने का समझौता भी किया। इस प्रकार दोनों देश ऊर्जा संबंधों को मजबूती देने का प्रयास कर रहे हैं। भारत के अक्षय ऊर्जा उद्योग से बांग्लादेश लाभान्वित हो सकता है। बांग्लादेश ने सौर ऊर्जा में भी रुचि प्रदर्शित की है। हाल ही में विश्व बैंक के प्रमुख निकाय अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम ने बांग्लादेश के साथ अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए समझौता किया है। इसके तहत विश्व बैंक बांग्लादेश में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करेगा। इससे भी स्पष्ट है कि बांग्लादेश में भारत के नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग के लिए बड़ी संभावना विद्यमान है।
- ऋतेन्द्र माथुर