चिड़ियाघर पर राजनीति
20-Nov-2020 12:00 AM 3123

 

इंदौर जू को वर्तमान जगह से हटाकर रालामंडल अभयारण्य शिफ्ट करने के पीछे बायपास के दोनों ओर मौजूद 5 से ज्यादा गांवों की जमीन का खेल है। रालामंडल अभयारण्य से सटकर रालामंडल, सनावदिया, बिहाडिया, नायता मुंडला, उमरिया मौजूद हैं। चूंकि रालामंडल नोटिफाइड अभयारण्य है, ऐसे में इसके 10 किलोमीटर के हिस्से में निर्माण के लिए वन विभाग की एनओसी की जरूरत होती है। इस राह को आसान कराने के लिए यहां चिड़ियाघर शिफ्ट कराने की तैयारी है, क्योंकि इसके बाद ये अभयारण्य नहीं रह जाएगा। ऐसे में उसके आसपास निर्माण की बाध्यता खत्म हो जाएगी। इंदौर के चिड़ियाघर को शिफ्ट करने की मंत्री विजय शाह की ख्वाहिश को लेकर ये आरोप पूर्व पर्यावरण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने लगाए हैं।

पूर्व मंत्री वर्मा के मुताबिक चिड़ियाघर के आसपास के क्षेत्र में निर्माण की अनुमति देने में किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं है। जबकि अभयारण्य के आसपास अनुमति देने पर बाद में उलझने के डर से ही शहर से एक साथ दो-दो सौगात छीनने की कोशिश की जा रही है। इंदौर शहर के बीच से जू के हटने से शहरवासियों को परेशानी तो होगी, साथ ही शहर के पास में मौजूद अभयारण्य भी इंदौर से चला जाएगा। 1989 में बने रालामंडल अभयारण्य को वैसे तो केंद्र सरकार ने जब अभयारण्य के तौर पर अनुमति दी थी, उस समय से ही इस पर अभयारण्य नियम लागू हो गए थे। इसके मुताबिक इसके 10 किलोमीटर क्षेत्र में निर्माण या खनन प्रतिबंधित है, लेकिन वन विभाग द्वारा इसमें परिवर्तन कराने की कोशिश की जा रही है। वन विभाग ने इसके लिए प्रस्ताव बनाया है, जिसमें इसकी बाउंड्री के 100 मीटर बाद से अनुमति दी जा सकती है। हालांकि इस पर फैसला नहीं हुआ है, लेकिन इसे आधार मानकर रालामंडल, नायता मुंडला, बिहाड़िया आदि गांवों में अनुमति दी जा रही है।

रालामंडल अभयारण्य के आसपास के गांवों में जमीनों के भाव ज्यादा हैं। बाजार भाव के हिसाब से रालामंडल से लगे आवासीय गांव मुंडला नायता की जमीनों का बाजार भाव 8600 रुपए वर्गमीटर है। वहीं, गाइडलाइन में यहां का भाव 4500 रुपए वर्गमीटर है। इसी तरह से पास में लगे बिहाडिया और सनावदिया गांव की गाइडलाइन के हिसाब से जमीनों की कीमत 3600 रुपए और 1500 रुपए वर्गमीटर है, जबकि बाजार में यहां की जमीनों की कीमत 3700 रुपए से ज्यादा है। इसी तरह से रालामंडल गांव की जमीनों की बाजार भाव से कीमत 8500 रुपए वर्गमीटर तक है, जबकि गाइडलाइन के मुताबिक यहां जमीनों के भाव 4 हजार रुपए तक हैं। यहां गाइडलाइन के भाव इसलिए नहीं बढ़ पा रहे हैं, क्योंकि अभयारण्य के पास में होने के कारण जमीनों को विकसित नहीं किया जा रहा है। उसमें बार-बार कई आपत्तियां आती हैं।

लाखों पेड़-पौधों के जरिए शहर तक शुद्ध हवा पहुंचाने वाले रालामंडल को 14 साल में दूसरी बार सरकार ने कैफेटेरिया, मनोरंजन केंद्र का लेवल लगाकर डी-नोटिफाई करने की कोशिश की। चिड़ियाघर को शिफ्ट करने का प्रस्ताव भले ही अधर में हो, पर ये स्पष्ट है कि मास्टर प्लान 2021 के प्रावधानों के तहत इसे संरक्षित रखने के लिए आसपास कोई इंडस्ट्री या ऐसी गतिविधि को अनुमति नहीं दी जा सकती, जिससे यहां के ईको सिस्टम को नुकसान पहुंचे। चिड़ियाघर का प्रस्ताव लाने से पहले वन मंत्री विजय शाह पहले भी यहां के लिए एम्युजमेंट पार्क शुरू करने का सुझाव दे चुके हैं। यह तब का मामला है, जब पहली बार उन्होंने ये विभाग संभाला था। तब मुख्य वन संरक्षक एसएस निनामा ने एम्युजमेंट पार्क जैसी गतिविधि शुरू करने की तैयारी भी कर ली थी। अब जब शाह के पास फिर ये महकमा है तो चिड़ियाघर की शिफ्टिंग के लिए बैठकें शुरू हो गईं। हालांकि वन विभाग के अफसर इसमें बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अभयारण्य का सुरक्षा घेरा बनाने के लिए ईको सेंसिटिविटी कमेटी बनी थी। कमेटी ने 50 मीटर का दायरा बनाया, जिसमें सभी गतिविधियां प्रतिबंधित कर दी गईं, लेकिन इस फैसले से पहले ही रालामंडल के चारों तरफ फार्म हाउस, टाउनशिप, कॉलेज, ढाबे खुल गए और अतिक्रमण भी हो गया। 2006-07 में रालामंडल को पीपीपी मोड पर देने का प्रस्ताव तत्कालीन वन संरक्षक ओपी चौधरी ने तैयार किया। 1 करोड़ 17 लाख रुपए की लागत से यहां ओपन एयर रेस्त्रां, कॉटेज सहित कई निर्माण की योजना बनी थी। डी-नोटिफाई की प्रक्रिया करते, उसके पहले लोगों का विरोध हो गया और इसे निरस्त करना पड़ा। प्रमुख सचिव वन विभाग अशोक वर्णवाल कहते हैं कि रालामंडल में आने वालों को अच्छी सुविधा मिल सके, इसके प्रयास किए जाएंगे। बच्चों के लिए गार्डन, झूले, पार्किंग, अभयारण्य के बाहर हल्का-फुल्का चाय, नाश्ता मिल जाए यह सब संसाधान यहां जुटाएंगे। इसे डी-नोटिफाई करने की योजना नहीं है।

समिति की मंजूरी बिना काम नहीं हो सकता

रिटायर्ड संयुक्त वन संरक्षक व रालामंडल के अधीक्षक रहे अशोक खराटे के मुताबिक, अभयारण्य में एक भी काम सुप्रीम कोर्ट की साधिकार समिति की अनुमति के बगैर नहीं किया जा सकता। कैफेटेरिया, रेस्त्रां जैसी गतिविधि अभयारण्य के अंदर नहीं की जा सकती। रालामंडल जैसी स्थिति में है, उसे वैसा ही रखा जाना उचित होगा। यहां 90 चीतल, 45 काले हिरण, 60 नीलगाय, 15 सांभर, 6 चिंकारा, 6 भेड़की हैं। पांच सौ से ज्यादा मोर 247 हेक्टेयर में फैले हैं। हर साल चीतल की संख्या 20 से 25 बढ़ रही है। यहां सांपों की दर्जनों प्रजातियां हैं, उन पर स्टडी भी हो चुकी है। 30 से ज्यादा तरह की चिड़िया हैं, जिन्हें देखने पर्यटक आते हैं। सांसद शंकर लालवानी कहते हैं कि चिड़ियाघर भी रहना चाहिए और रालामंडल भी विकसित होना चाहिए। ज्यादातर जानवर चिड़ियाघर में ही रखे जाएं, जबकि अधिक संख्या वाले टाइगर, लॉयन और तेंदुए जैसे प्राणियों में से आधे को रालामंडल भेज देना चाहिए। इससे सभी प्राणियों को रहने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाएगी।

- श्याम सिंह सिकरवार

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