चलो, फुर्सत हो गई अब मर जाओ
02-Jul-2020 12:00 AM 3869

 

एक समय था, जब आदमी कहता था कि मरने की फुर्सत नहीं है, आदमी का ये जुमला सुनकर ही लगाता है कि कोरोना आदमी के फुर्सत से मरने की व्यवस्था करने आया है। लॉकडाउन लगवाकर सबको फुर्सत करवा दी और कह रहा है- लो मरो, अब फुर्सत है। पर मारना कोई नहीं चाहता हर आदमी जिंदा रहने के लिए जुगाड़ लगा रहा है। जुगाड़ इसलिए कि मास्क, सैनेटाइजर दोनों हमारे देश में जुगाड़ के चल रहे है। एन-91 का काम हमारे यहां घर पर बनी मुंह पट्टी और गमछा कर रहा है। सैनेटाइजर का काम शहरों में सर्फ का पानी और गांवों में राख कर रही है।

जो दादी रोज ओटले पर बैठकर मोहल्ले के लोगों को सुनाते हुए कहती थी कि 'भगवान मुझे उठा ले- भगवान मुझे उठा ले’ वो भी कोरोना के आते ही घर के अंदर घुस गई हैं। चौबीस घंटे मास्क लगाकर रख रही हैं। और दिन-रात घर के दरवाजे की तरफ देखती रहती है, कोई अपरिचित घर में आए तो देहरी के भीतर नहीं आने देती। हर अंजान उसे मौत का दूत लगता है। किसी को अपनी खटिया के करीब भी नहीं आने देती। सैनेटाइजर की बोतल सिरहाने ही रखती है और दिन में चालीस बार अपने हाथों पर लगाती है। और अब तो ये कहना भी छोड़ चुकी है कि भगवान मुझे उठा ले।

दिन-रात काम और पैसे के चक्कर में जो कहते थे कि मरने की फुर्सत नहीं, उनसे कहा जाए चलो फुर्सत हो गई अब मर जाओ। तो हो सकता है कि वे आपके पीछे हंटर लेकर दौड़ पड़ें। क्योंकि काम सब बंद हो गए और पैसा आना भी बंद है। ऐसे लोग कसम खा लेंगे कि भूल से भी ये नहीं कहेंगे कि मरने की फुर्सत नहीं। फुर्सत नहीं थी तब कोई जहर खाकर मरने की तैयारी करता, कोई फांसी लगाकर लटकने की सोचता, कोई रेल पटरी पर सोने का मन बनाता। लेकिन कोरोनावायरस ने आकर जबसे चपेट में लेना शुरू किया है हर कोई मरने के नाम से ही डरने लगा है।

पहले कोई हार्टअटैक से मरता, कोई सांस रुकने से मरता, कोई छाती में गैस चढ़ने से मरता, कोई गंभीर बीमारी से मरता, पर अब तो हर मरने वाला अपनी मौत का इल्जाम इस कोरोना पर ही लगाकर जा रहा है। एक कोरोना ने सारे कारण खत्म कर दिए। सोचिए व्यस्त और त्रस्त जिंदगी के बीच एक स्वस्थ जिंदगी जीने का तरीका सिखा दिया।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको घर के लोग कहते थे 'काम का न काज का, दुश्मन अनाज का’ यानी असल जिंदगी में इनके पास कोई काम नहीं होता है दिन-रात केवल आभासी काम यानी टिकटॉक, फेसबुक, और वॉट्सएप के अलावा उनको कुछ सूझता ही नहीं है और सोफे और पलंग पर गड्डे जिनकी वजह से पड़ जाते है, जिनको सुबह उठते ही ताने सुनने पड़ते है। और कोई काम घर से बाहर का बताओ तो पड़ोसी के ओटले पर जाकर आधा घंटा वीडियो देखने के बाद काम करके घर आते है। वे अब कोरोना के आने के बाद से अपना जीवन अब बहुत शांति से गुजार रहे हैं।

उनको अब न ताने सुनने पड़ रहे हैं और न ही कोई घर से बाहर जाने को बोलता है। घर के लोग भी सोचते हैं पड़ा रहने दो, घर से बाहर गया तो न जाने कहां से सामान के साथ कोरोना ले आया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। ये बाहर जाकर वैसे भी कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है, कम से कम घर में रहकर आठ-दस वॉट्सएप ग्रुप तो चला रहा है। इसके अंडर में दो-ढाई हजार लोग तो हैं जो बिना पगार के लोगों को सूचनाएं भेजते है और कोरोना के विकट दौर में लोगों का मनोरंजन करते है। ये स्मार्टफोन में घुसकर ही स्मार्ट बन गया तो ही अपने भाग्य संवर जाएंगे। वैसे भी सरकार 'वर्क फ्रॉम होम’ पर ही तो जोर दे रही है। बाहर जा कर मौत ले आए उससे तो अच्छा ही है कि घर में रहे और काम करे तो साल भर में इसकी लुगाई ला देंगे। बस ये फुर्सत में न रहे। इसे मरने की फुर्सत भी न मिले यही सबकी कामना है।

 - संदीप सृजन

FIRST NAME LAST NAME MOBILE with Country Code EMAIL
SUBJECT/QUESTION/MESSAGE
© 2025 - All Rights Reserved - Akshnews | Hosted by SysNano Infotech | Version Yellow Loop 24.12.01 | Structured Data Test | ^