भर्ती का भर्ता
23-Jun-2020 12:00 AM 3550

 

भर्ती का भर्ता कैसे बनता है अगर आपको जानना है तो पढिए 69000 सहायक अध्यापक भर्ती की यह कड़वी सच्चाई जिसने योगी आदित्यनाथ सरकार की रातों की नींद उड़ाकर रख दी और गले की फांस बन बैठी। विपक्ष मन ही मन प्रश्न पूछता हुआ गाना गा रहा है चुनाव बहुत से लड़े होंगे तुमने, मगर कोई भर्ती भी तुमने करी है? सिलसिला शुरू होता है उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार के आने से। उत्तर प्रदेश में 2017 में भाजपा सरकार बहुमत से आई। और उसने आते ही कुछ दिनों के भीतर प्राइमरी में पढ़ा रहे शिक्षामित्रों के पदों को अवैध घोषित कर दिया और उनको निकालने की ठानी। भाजपा के प्रदेश में आने से बहुतों के जीवन में खुशी की लहर आ गई थी। पर कुछ चेहरे गम में भी डूब चुके थे। गाना था आने से उसके आए बहार, पर शिक्षामित्रों के मन में चलने लगा जाने से उसके आए बहार।

शिक्षामित्रों के समुदाय में लगभग भूचाल सा आ गया। सनद रहे कि शिक्षामित्रों का समायोजन समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा किया गया था। और भाजपा को विरोध करने का एक अच्छा मौका मिल चुका था। क्योंकि शिक्षामित्र 12वीं पास की योग्यता से लिए गए थे जो कि एनसीटीई के नियमों के खिलाफ था। अर्थात उसमें कहीं भी इनके स्थायी पद का जिक्र नहीं था। इसका फायदा उठाते हुए योगी सरकार ने शिक्षामित्रों को पद से हटा दिया और कहा 'हमें योग्य शिक्षक चाहिए। इसी भर्ती में शिक्षामित्रों का नेता रिजवान अंसारी उभरकर आया, उसके नेतृत्व में शिक्षामित्रों ने कई केस व आंदोलन किए। बहुत से शिक्षामित्र (लगभग 90 प्रतिशत) 10 साल से अधिक साल तक प्राइमरी में अध्यापन कार्य कर रहे थे। बहुतों की शादी भी इसी पद को स्थायी समझकर हुई थी। जैसा कि सभी को ज्ञात है कि दहेज एक कुप्रथा है परंतु शिक्षामित्रों ने अपने पद के नाम पर लाखों का दहेज लेकर शादी कर ली थी और इस कांड से उनकी इज्जत दांव में लग गई। गली, मोहल्ले, गांव, और शहर से इनमें तानों की बौछार सी होने लगी। शिक्षामित्रों के दिमाग में बस यही घूम रहा था कि, 'अब जाएं तो जाएं कहां? करें तो करें क्या?’

सुप्रीम कोर्ट के पास शिक्षामित्र गुहार लगाने गए। जहां कोर्ट ने इन्हें 10 हजार मासिक सैलरी में बने रहने को कहा। परंतु शिक्षामित्रों की सैलरी एक प्राइमरी अध्यापक की सैलरी के बराबर हो चुकी थी अर्थात् लगभग 40 हजार से भी अधिक। ऐसे में 10 हजार रुपए मासिक में गुजारा करना उन्हें मुश्किल लगा। शिक्षामित्रों ने पुन: अपील की। और सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों को 2 मौके दिए। इन दो मौकों में शिक्षामित्रों को दूरस्थ संस्थान से डीएलएड (डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन) करके टीईटी (टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) अर्थात् शिक्षक पात्रता परीक्षा को पास करना था। उसके बाद प्राथमिक स्तर के अध्यापक के लिए निकलने वाली भर्तियों में सम्मिलित होकर उसे उत्तीर्ण करना था। साथ ही शिक्षामित्रों को 25 भारांक भी दिया गया। जो तभी जोड़ा जाएगा जब वो परीक्षा की कटऑफ पार कर लेंगे। 2017-18 में 68500 प्राइमरी शिक्षक के पद निकले। जिसमें बीटीसी/डीएलएड किए हुए प्रशिक्षु और शिक्षामित्र सम्मिलित हुए। पदों की संख्या 68500 थी और प्रतियोगियों की संख्या 1 लाख 10 हजार लगभग थी। परीक्षा परिणाम आया और 150 अंक की लिखित परीक्षा में कट ऑफ लगाई गई 40 और 45 प्रतिशत। अर्थात् आरक्षण वर्ग के लिए 40 प्रतिशत यानि 60 अंक और अनारक्षित वर्ग के लिए 45 प्रतिशत यानी 65 अंक। इस कट ऑफ को पार करने वाला हर प्रतिभागी शिक्षक बनने योग्य माना गया। 68500 पदों में 40-45 प्रतिशत की कटऑफ पर 45 हजार लगभग लोग ही पास हो पाए। और एक बार फिर से योगी जी का बयान आया उत्तरप्रदेश में योग्य शिक्षकों की कमी है। वर्ष 2019 आया। 6 जनवरी को अगली परीक्षा 69000 प्राथमिक अध्यापकों की हुई। पर ये भर्ती 68500 से कुछ अलग थी। इसकी वजह थी इसमें बीएड को शामिल करना। हालांकि बीएड किए हुए छात्राध्यापक बड़ी कक्षा में पढ़ाने के योग्य माने जाते हैं। उनको प्राथमिक में पढ़ाने हेतु प्रशिक्षित नहीं किया जाता है। प्राथमिक कक्षा के बच्चों को पढ़ाने का अलग मनोविज्ञान होता है और बड़ी कक्षा के बच्चों को पढ़ाने का अलग। परंतु सरकार बीएड अभ्यर्थियों हेतु पद निकालने में सक्षम नहीं थी।

इसे सरकार की नाकामी या असफलता ही कहा जाएगा कि 7-8 सालों में बीएड हेतु कोई पद ही न निकले थे। ऐसे में उन अभ्यर्थियों को नौकरी हेतु प्राइवेट विद्यालयों में जाना पड़ता था। सरकार ने इस 69000 भर्ती में बीएड को भी योग्य घोषित करते हुए जगह दे दी। परंतु बीएड को ये कहा गया कि जॉइनिंग के सालभर के भीतर उनको एक ब्रिज कोर्स करना होगा। जिससे वो प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने हेतु पूर्ण योग्य होंगे। परीक्षा की आंसर की आई और साथ ही अबकी बार कटऑफ 60 और 65 प्रतिशत कर दी। इसकी वजह थी कि इस बार भाग लेने वाले परीक्षार्थी 4 लाख से भी ज्यादा थे। ऐसे में 40 और 45 प्रतिशत कटऑफ लगाना, मतलब बेवजह लोगों को उम्मीद देना कि आप चयनित हो सकते हैं और इसमें योग्यता भी कम हो जाती।

इस वजह से शिक्षामित्रों को जाना पड़ा फिर से कोर्ट

अब शिक्षामित्रों का कॉम्पिटीशन बीएड और बीटीसी दोनों से था। और परीक्षा के शुरुआत में कटऑफ का कोई जिक्र न होने की वजह से कुछ ने यह सोच लिया कि हम कुछ भी करके आ जाएंगे 25 भारांक तो मिलना ही है। और कुछ ने सोचा 40 और 45 प्रतिशत कटऑफ के हिसाब से पास होने भर का कर लिया जाए। मन में बस यही चल रहा था एक नौकरी चाहिए, जिंदगी के लिए। पर जब कटऑफ 60 और 65 प्रतिशत लगी तो शिक्षामित्रों के पैरों तले जमीन खिसक गई। और रिजवान अंसारी के नेतृत्व में वो कोर्ट गए। और सिंगल बेंच में फैसला उनके हक में अर्थात् 40 और 45 प्रतिशत कटऑफ में आ भी गया। पर सरकार डबल बेंच गई और फिर वकीलों की दलीलों के बाद फैसला 60-65 प्रतिशत कटऑफ का यहां से आया। वकील कई थे जिनमें बीएड और बीटीसी प्रशिक्षुओं ने चंदा इकट्ठा करके खुद के वकील अलग से भी कर रखे थे। उधर टीम रिजवान अंसारी ने भी मजबूत वकील कर रखे थे। महीनों ये सब चला और लगभग डेढ़ साल होने को आए हैं। पर सरकार भर्ती कराने में नाकाम रही है। संशोधित उत्तर कुंजी, परीक्षा परिणाम और चयनित सूची आने के बाद फिर से भर्ती की प्रक्रिया रुक गई।

- लखनऊ से मधु आलोक निगम

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