बराबरी का अधिकार
03-Mar-2020 12:00 AM 1427

हम पुरातन से कहते आ रहे हैं महिलाएं पुरुषों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं, लेकिन अभी तक कई मायनों में हम उन्हें अपने बराबर नहीं मानते हैं...

भारत की सेना में महिलाओं की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया है। महिलाओं की काबिलियत को पूरा समर्थन देते हुए, अदालत ने कहा कि सेना में स्थायी कमीशन हर महिला अधिकारी को मिलेगा, चाहे वो कितने भी वर्षों से सेवारत हों। इसके अलावा अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं को कमांड पोस्टिंग में भी तैनात किए जाने का पूरा हक है। जिस दौर में स्त्रियों ने अमूमन हर स्तर पर यह साबित किया है कि वे घर से लेकर दहलीज से बाहर किसी भी मोर्चे पर मुश्किल और जटिल हालात का बराबरी से सामना कर सकती हैं, उसमें उनकी क्षमताओं को कठघरे में करना अपने आप में बेहद अफसोसजनक पहलू है। खासतौर पर सैन्य महकमों में अलग-अलग भूमिकाओं में खुद को सौंपी गई ड्यूटी को महिलाओं ने जिस कुशलता से निभाया है, वह उनकी बहादुरी और काबिलियत का सबूत है। अगर केंद्र सरकार की इच्छा से सबकुछ होता तो शायद सेना में संघर्ष कर रही महिलाओं को फिर निराशा ही हाथ लगती। लेकिन गत दिनों सेना में महिलाओं की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया, वह आने वाले दिनों में एक बड़े और क्रांतिकारी बदलाव का वाहक बनेगा।

अदालत ने साफ लहजे में कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत आने वाली सभी महिला अफसर स्थायी कमीशन की हकदार होंगी। हालांकि युद्ध में सीधे लडऩे देने का फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार और सेना पर छोड़ दिया है और इसे नीतिगत मामला बताया है। मगर थलसेना में महिला अफसरों की कमांड पोस्टिंग पर रोक को बेतुका बताकर अदालत ने इसे बराबरी के अधिकारों के खिलाफ कहा।

गौरतलब है कि इस मुद्दे को लेकर महिलाएं लंबे समय से कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं और पुरुष वर्चस्व के समांतर भेदभाव के खिलाफ बराबरी के अधिकार की मांग कर रही थीं। स्थायी कमीशन से लेकर यूनिट और कमान के नेतृत्व यानी कमांड पोस्टिंग को लेकर सरकार का रुख बेहद नकारात्मक था और अदालत में जिस तरह की दलीलें दी गईं, वे न केवल बेहद उथली थीं, बल्कि बराबरी के मूल्यों पर आधारित एक आधुनिक समाज की परिकल्पना के खिलाफ भी।

केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अजय रस्तोगी की बेंच ने कहा कि सरकार की दलीलें 'भेदभावपूर्णÓ और परेशान करने वाली थीं और स्टीरियोटाइप पर आधारित थीं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सैनिक महिला अधिकारियों के नेतृत्व में काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं। इस पर अदालत ने कहा कि लिंग के आधार पर आक्षेप करना महिलाओं की मर्यादा और देश का अपमान है। दो जजों की पीठ ने यह भी कहा कि महिलाओं की शारीरिक विशेषताओं का उनके अधिकारों से कोई संबंध नहीं है और इस तरह की सोच को बढ़ाने वाली मानसिकता अब बदलनी चाहिए।

अदालत ने सरकार को तीन महीने में फैसले को लागू करने के लिए कहा है। फैसले को सेना में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। इस मामले में 2010 में ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि शार्ट सर्विस कमीशन के जरिए सेना में भर्ती हुई महिलाएं भी पुरुषों की तरह स्थाई कमीशन की हकदार हैं। केंद्र ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक सुनवाई चल रही है तब तक फैसले को लागू करवाने के लिए कोई बलपूर्वक कदम नहीं उठाए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

अदालत ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं था कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लग गई थी और केंद्र सरकार को तुरंत हाईकोर्ट के फैसले पर अमल करना चाहिए था। केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के नौ साल बाद, फरवरी 2019 में एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके तहत महिला सैन्य अधिकारियों को सेना के कुल 10 विभागों में स्थाई कमीशन देने की इजाजत दी गई थी। हालांकि यह सिर्फ उन महिला अधिकारियों के लिए था जो 14 से कम वर्षों से सेवा में हों। इसके अलावा यह इजाजत सिर्फ स्टाफ पोस्टिंग के लिए थी, कमांड  पोस्टिंग के लिए नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ये दोनों ही प्रतिबंध हट गए हैं। फैसला देते वक्त अदालत ने एक महत्वपूर्ण बात और कही, कि यह एक दोषपूर्ण धारणा है कि महिलाएं पुरुषों से कमजोर हैं। इस निर्णय पर महिलाओं के अधिकारों के लिए लडऩे वालों ने अदालत की सराहना की है।

-  ज्योत्सना अनूप यादव

 

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