बैंकिंग प्रणाली गहरे संकट में
21-Mar-2020 12:00 AM 3421

देश आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में बैंकिंग प्रणाली भी गहरे संकट में है। देश का सबसे बड़ा निजी बैंक यस बैंक संकट में है। सरकार ग्राहकों को आश्वासन दे रही है कि घबराने की जरूरत नहीं है। एक-एक पाई मिल जाएगा। लेकिन कब, इसका जवाब सरकार के पास नहीं है। बैंक की बदहाली और सरकार के रुख से लोगों में निराशा का भाव है।

क्या भारतीय बैंकिंग प्रणाली किसी गहरे संकट में है? यस बैंक के मौजूदा संकट के बाद यह सवाल फिर एक बार हमारे सामने खड़ा है। वित्त मंत्रालय और आरबीआई भले ही भरोसा दे रहे हों कि यस बैंक के ग्राहकों के पैसे सुरक्षित हैं, लेकिन लोगों को विश्वास नहीं हो रहा है। इसकी वजह यह है कि पूर्व में जितने भी बैंक, चिटफंड कंपनियां और उद्योगपति दिवालिया हुए हैं, उसमें डूबी लोगों की रकम नहीं मिली है या फिर इसके लिए वर्षों इंतजार करना पड़ा है।

यस बैंक जैसे बैंकों में अधिकतर पैसा रिटायर हो चुके लोगों, शासकीय और गैर शासकीय अधिकारियों-कर्मचारियों, छोटे-बड़े व्यवसायियों के जमा हैं। कंपनी के अधिकारियों एवं एक्जीक्यूटिव ने ग्राहकों को बड़े-बड़े प्रलोभन देकर फंसाया है। उनसे एफडी करवाया। और अब जब बैंक दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया है तो वे लोग चुप्पी साध गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ग्राहकों की रकम वापस दिलाने की जिम्मेदारी किस पर है। बैंक प्रबंधन की गलतियों का खामियाजा ग्राहक क्यों भुगते?

दरअसल, देश में बैंक, चिटफंड कंपनियों और उद्योगपतियों के दिवालिया होने से अभी तक सरकार ने कोई सबक नहीं लिया है। सवाल उठता है कि सरकार ने अभी तक ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया है, जिससे यह तय हो सके कि अगर किसी का पैसा बैंक के दिवालिया होने से डूबता है तो उसे किस स्रोत से उसका मूलधन मिलेगा। और इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा? देश में सारदा चिटफंड घोटाला अभी भी लोग भूले नहीं होंगे। इस घोटाले के बाद संभावना बनी थी कि सरकार कोई सख्त कानून बना सकती है लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अब यस बैंक के मौजूदा संकट से एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि ग्राहकों की परेशानी का जिम्मेदार कौन है?

पीएमसी बैंक संकट के समय कहा गया था कि यह एक सरकारी बैंक था और प्रबंधन द्वारा दिए गए कुछ बड़े कर्जों के कारण उसके सामने नगदी की समस्या उत्पन्न हुई। यस बैंक के संकट में आने के ठीक-ठीक कारण क्या हैं, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन, उसके प्रबंधन से जुड़े विवाद काफी दिनों से चल रहे थे। इन विवादों के बीच बैंक की आर्थिक स्थिति के बारे में भी सवाल उठते रहते थे, लेकिन इस बारे में स्थिति कभी साफ नहीं की गई। शुरू-शुरू में तो लोगों से बड़े-बड़े वादे करके बैंक में खाते खुलवाए गए और उनके जीवनभर की पूंजी जमा कराई गई। लेकिन अब उनको अपनी रकम निकालने के लिए भी पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। आखिर में ग्राहकों की क्या गलती थी? सरकार ने यस बैंक के चेयरमैन राणा कपूर और उनकी बेटी को अपने कब्जे में ले लिया है। सवाल उठता है कि क्या इससे लोगों की जमापूंजी उन्हें समय पर मिल पाएगी? क्या आरबीआई या सरकार को यस बैंक की खराब होती स्थिति का अहसास नहीं था?

दरअसल यस बैंक के खराब दिनों की कहानी उसी दिन शुरू हो गई थी जब चेयरमैन राणा कपूर को आरबीआई की ओर से जबरन हटाया गया। यह तभी स्पष्ट हो गया था कि बैंक के कामकाज में कुछ न कुछ ऐसा है जिसकी पर्देदारी है। बैंक की ओर से बैलेंसशीट और डूबे हुए कर्ज (एनपीए) की सही जानकारी आरबीआई को न देने का अंदेशा भी इसके बाद गहराया था। आरबीआई की ओर से स्विफ्ट कम्प्लाइंसेस में अनदेखी के कारण यस बैंक पर एक करोड़ रुपए की पेनल्टी भी लगाई गई थी। इससे यस बैंक के एक क्यूआईपी को भी खरीदार नहीं मिले थे, यानी बड़ी झोली वाले निवेशकों का भरोसा भी डगमगाने लगा था।

ताजा हालत यह है कि राणा कपूर खुद बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं और बैंक ने जिन कंपनियों को कर्ज दे रखा है उनकी हालत पतली है। इसमें एस्सेल ग्रुप, अनिल अंबानी की एडीएजी, दीवान हाउसिंग और इंडियाबुल्स हाउसिंग प्रमुख कंपनियां हैं। एनबीएफसी संकट उभरने के बाद यस बैंक में बिकवाली में तेजी हो गई। एक ताजा रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में दूसरे दौर के एनपीए की शुरुआत होने जा रही है। ऐसे में यस बैंक का भविष्य बहुत बेहतर नजर नहीं आ रहा।

पीएमसी, यस बैंक जैसी घटनाओं, मार्गन स्टेनले की ओर से एसबीआई की रेटिंग कम करना और ताजा रिपोर्ट्स बीते एक हफ्ते की इन तीनों खबरों ने पूरे बैंकिंग सेक्टर का मूड बिगाड़ दिया। ऊपर के दाम में यस बैंक के शेयर खरीदकर बैठे लोग निकलने का रास्ता तलाशेंगे, ऐसे में अगर निचले स्तर से कुछ रिकवरी देखने को मिलती भी है तो यह कितनी टिकाऊ होगी यह कहना मुश्किल है। तकनीकी चाट्र्स पर भी यस बैंक जिस स्तर पर आ चुका है उसे नो चार्ट टेरेटरी कहेंगे यानी चाट्र्स से भी संकेत मिलना बंद। अगर आप यस बैंक को सस्ता मानकार शेयर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो सर्तक रहिए और बाजार विशेषज्ञ से पूछकर ही निर्णय लें क्योंकि 400 रुपए से 30 रुपए का सफर तय करने वाले यस बैंक की यात्रा में कई ऐसे मुकाम आए होंगे जब निवेशकों को यह सस्ता मालूम हुआ होगा, नतीजा आपके सामने है।

रिजर्व बैंक की नाक के नीचे घटिया बैलेंस शीट वाली कंपनियों को यस बैंक कर्ज देता रहा, उसके एनपीए में बढ़ोतरी होती रही, उनका पीसीआर रिजर्व बैंक द्वारा तय सीमा से बहुत नीचे चलता रहा और रिजर्व बैंक को हस्तक्षेप की जरूरत महसूस नहीं हुई, यह आश्चर्यजनक है।

वित्तीय वर्ष 2018-19 में यस बैंक ने पहली बार एनपीए को कारण बताते हुए घाटा दर्ज किया। एनपीए का अनुपात बढ़ता हुआ 10 प्रतिशत के पार पहुंच गया और रिजर्व बैंक का धैर्य तब टूटा जब अक्टूबर-दिसंबर 2019 के तिमाही नतीजे जारी करने में यस बैंक की ओर से देरी की जाने लगी। कई विशेषज्ञों ने अनुमान जताया कि बैंक का वास्तविक एनपीए 30 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया है। यह एक ऐसा भयानक आंकड़ा है, जिसके सच साबित होने की स्थिति में यस बैंक का भी आइएलएंडएफएस की गति को प्राप्त होना तय था।

पहले से ही सुस्ती झेल रहे भारतीय आर्थिक ढांचे के लिए पांचवें सबसे बड़े निजी बैंक का धराशायी होना एक ऐसी परिस्थिति होती जिसे संभालना सरकार और आरबीआई के लिए बहुत मुश्किल होता। इसीलिए आखिरकार रिजर्व बैंक ने एक ऐसा कदम उठाया जो अपने आप में असाधारण है। नियामक को यह भी पता है कि यदि तीन जुलाई से पहले जमाकर्ताओं में यह भरोसा नहीं बैठाया गया कि यस बैंक में जमा उनकी रकम सुरक्षित है तो उसमें जमा करीब दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम निकालने की होड़ मच जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो यस बैंक ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय बैंकिंग तंत्र के लिए इस झटके को झेल पाना कठिन होगा। इसीलिए बिना समय गंवाए रिजर्व बैंक और सरकार ने मिलकर भारतीय स्टेट बैंक को यस बैंक की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए तैयार कर लिया है। इसके लिए एसबीआई 10 रुपए प्रति शेयर के भाव पर यस बैंक के दो रुपए फेस वैल्यू वाले शेयर खरीदेगा और इस तरह उसमें करीब 12,000 करोड़ रुपए निवेश करेगा। लेकिन यस बैंक को बचाने के लिए करीब 30,000 करोड़ रुपए की तुरंत जरूरत है। ऐसे में 18,000 करोड़ रुपए की शेष रकम की व्यवस्था करना अब एसबीआई की जिम्मेदारी है।

रिजर्व बैंक और सरकार को भरोसा है कि एसबीआई जैसे विश्वसनीय नाम के यस बैंक से जुड़ जाने से निवेशकों की तलाश आसान होगी। पर इस घोषणा के बाद एसबीआई के शेयरों में आई एक दिन में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट यह समझने के लिए काफी है कि सरकार और रिजर्व बैंक के लिए अभी चैन से बैठने का समय नहीं आया है और यदि यह मान भी लिया जाए कि यस बैंक को बचा लिया जाएगा तो असल चुनौती भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने और यस बैंक के असली गुनहगारों को कानून के शिकंजे में लाने की होगी।

आरबीआई का एक गलत फैसला संकट की वजह

वर्तमान परिस्थितियों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब यस बैंक के ग्राहकों और निवेशकों को आने वाला संकट दो साल पहले ही दिख गया था तो फिर रिजर्व बैंक की आंखों पर पट्टी क्यों बंधी रही? दरअसल यह कहना सही नहीं होगा कि रिजर्व बैंक ने यस बैंक के मामले की अनदेखी की। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि रिजर्व बैंक अनिर्णय का शिकार हुआ। राणा कपूर की रीति-नीति और यस बैंक के कामकाज को निकट से देखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अगस्त 2018 में कपूर को हटाए जाने के लिए 31 जनवरी 2019 तक की समयसीमा तय करना रिजर्व बैंक के लचर प्रशासनिक फैसले का एक उदाहरण है। कपूर ने जिस तरह यस बैंक की बैलेंस शीट को कमजोर किया था, उसमें गड़बड़ी की थी और कई आवश्यक जानकारियां छिपाने की कोशिश की थी, उसे देखते हुए बहुत पहले उनकी विदाई हो जानी चाहिए थी।

यस बैंक में भगवान जगन्नाथ के भी जमा हैं 592 करोड़

यस बैंक में आम आदमी के साथ-साथ पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के भी पैसे फंस गए हैं। आरबीआई के नए आदेश के बाद भक्त और पुजारी दोनों चिंतित हैं। यस बैंक की एक शाखा में भगवान जगन्नाथ के नाम से खुले अकाउंट में 545 करोड़ रुपए जमा हैं। इस मामले पर ओडिशा के मंत्री प्रताप जेना ने कहा है कि जगन्नाथ मंदिर के 592 करोड़ रुपए यस बैंक में जमा हैं। मार्च 2029 में फिक्स डिपॉजिट की अवधि पूरी हो जाएगी। इसके बाद मंदिर प्रबंधन पैसे निकालकर किसी राष्ट्रीय बैंक में जमा कराएगा। पैसे निकालने पर सिर्फ सेविंग अकाउंट पर प्रतिबंध है। वित्तीय संकट से जूझ रहे यस बैंक के ग्राहकों के लिए रिजर्व बैंक ने यस बैंक पर जमा राशि के निकालने की सीमा तय कर दी है। अगले 30 दिनों में ग्राहक सिर्फ 50 हजार रुपए की राशि ही निकाल सकते हैं, हालांकि मेडिकल और कुछ खास स्थितियों में इस सीमा से छूट दी गई है। यहां तक कि दिन के कारोबार के दौरान यस बैंक के शेयर 50 फीसदी तक गिर गए। जिसके बाद लोगों में हलचल का माहौल है। देशभर में यस बैंक और एटीएम के बाहर लोगों की भीड़ जुट गई है। हालांकि, इस दौरान लोगों को कई तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि एक व्यक्ति पूरे महीने में सिर्फ 50 हजार रुपए ही निकाल सकता है। हालांकि, बैंक की ओर से ग्राहकों को बताया जा रहा है कि ये हालात सिर्फ 3 अप्रैल तक ही रहेंगे, बाकी हालात सुधारने की कोशिशें जारी हैं।

- अरूण दीक्षित

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