07-Jan-2021 12:00 AM
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का संग्राम शुरू हो गया है। भाजपा और सत्तारूढ़ टीएमसी के बीच पिछले एक साल से चुनावी घमासान देखा जा रहा है। अब धीरे-धीरे कांग्रेस और वामदल भी सक्रिय हो रहे हैं। लेकिन चुनावी मैदान में फिलहाल ममता बनर्जी की टीएमसी और भाजपा ही दिख रही है। भाजपा की पूरी कोशिश है कि वह पश्चिम बंगाल में इस बार भगवा सरकार बना ले। लेकिन ममता बनर्जी उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ी हैं। अब देखना यह है कि पश्चिम बंगाल की जनता इस बार किसके हाथ में सत्ता सौंपती है।
मुश्किलें जहां भी होती हैं, उनका असर कभी एकतरफा नहीं होता। किसी के लिए थोड़ा कम तो किसी और के लिए थोड़ा ज्यादा हो सकता है। मुश्किलें जब दो विरोधियों के बीच हथियार के रूप में जगह पा जाती हैं तो दुधारी तलवार का शक्ल अख्तियार कर लेती हैं और फिर नुकसान भी दोनों तरफ होते हैं। बस थोड़ा कम या थोड़े ज्यादा का फर्क रहता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता अमित शाह और ममता बनर्जी के सामने ऐसी ही मुश्किलें हैं जो चुनौती बनी हुई हैं। ममता बनर्जी निश्चित तौर पर इस वक्त ज्यादा नुकसान उठा रही हैं, लिहाजा भाजपा फायदे में है, लेकिन चुनाव तक ऐसा ही माहौल होगा। ममता बनर्जी ही घाटे में रहेंगी और भाजपा को फायदा होगा, ऐसी गारंटी भी तो नहीं है।
अमित शाह पश्चिम बंगाल चुनाव में भी वैसे ही आगे बढ़ते चले जा रहे हैं जैसे इसी साल के शुरू में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में। जैसे दिल्ली में अमित शाह और उनके साथी अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आक्रामक रूख अख्तियार किए हुए थे, ममता बनर्जी के खिलाफ भी करीब-करीब वैसा ही माहौल बन चुका है। भाजपा के सामने दिल्ली में जो सबसे बड़ी चुनौती रही, पश्चिम बंगाल में भी वैसी ही है, कौन बनेगा भाजपा का मुख्यमंत्री? अमित शाह को ऐलान करना पड़ा है कि अगर चुनावों में भाजपा की जीत होती है तो अगला मुख्यमंत्री बंगाल की मिट्टी से ही होगा। अब तक के भाषणों में अमित शाह बंगाल से जुड़े भाजपा नेताओं के नाम तो लेते हैं, लेकिन संदेश यही होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही भाजपा पश्चिम बंगाल चुनाव में लड़ रही है।
पश्चिम बंगाल के बोलपुर में भाजपा समर्थकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी और ये देखकर अमित शाह बोल पड़े कि ऐसा रोड शो तो जीवन में नहीं देखा। अमित शाह ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष रहते भी कई रोड शो किए, लेकिन बंगाल के बोलपुर जैसा सैलाब नहीं देखा। भाजपा नेता अमित शाह ने रोड शो की भीड़ और सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन कर रहे नेताओं को बंगाल में बदलाव की तड़प बताया है। अमित शाह बंगाल के लोक मानस पर ममता बनर्जी के ही औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं- परिवर्तन। परिवर्तन के नाम पर ही ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से लेफ्ट की सत्ता का सफाया कर अपना राज कायम किया और अब उसे काफी बड़ी चुनौती मिलने लगी है। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में भगदड़ मची हुई है और वो अपने उन नेताओं को भी साथ रख पाने में नाकाम साबित हो रही हैं जो कभी उनके लिए एक पैर पर खड़े रहा करते थे, उनकी हर बात को पत्थर की लकीर माना करते थे।
ये तो सबको मालूम है कि ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन के बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं कि ये कोई नई बात है। ममता बनर्जी हमेशा ही ऐसी चुनौतियों से जूझती रही हैं। कई बार तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहता है तो भी ममता बनर्जी अपने सामने चुनौतियां खड़ी कर लेती हैं और इसके पीछे अक्सर तुनकमिजाजी में लिए उनके फैसले होते हैं। तस्वीर के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो ममता बनर्जी को मुश्किल में डालने के बावजूद भाजपा के सामने भी चुनौतियों की कमी नहीं है। सबसे बड़ी मुश्किल तो ये है कि भाजपा के पास ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसे वो ममता बनर्जी के मुकाबले खड़ा कर सके। ठीक ऐसा ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था।
भाजपा की दिक्कत ये होती है कि स्थानीय नेताओं को भी वो फ्रंट पर निर्भीक होकर लड़ने नहीं देती। दिल्ली चुनाव में भाजपा चाहती तो पार्टी की बैठकों में साफ-साफ बोल देती कि कोई भी पहले से खुद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार मानकर न चले, लेकिन ये बात दिल्ली के लोगों को नहीं बताती, तो भी काम चल जाता। मनोज तिवारी चुनावों के दौरान दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे। ग्लैमर के मामले में मनोज तिवारी में कोई कमी तो है नहीं। रही बात स्थानीय राजनीति पर पकड़ की तो भाजपा उनके संसदीय क्षेत्र की सीटें भी गंवा बैठी थी। अमित शाह ने ये समझाने में ही इतनी ऊर्जा खत्म कर दी कि मनोज तिवारी तो भाजपा के सत्ता हासिल करने पर मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले। जबसे मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था वो लगातार अरविंद केजरीवाल के खिलाफ आक्रामक बने रहे। तभी अमित शाह ने अरविंद केजरीवाल को प्रवेश वर्मा के साथ बहस करने के लिए चैलेंज कर दिया। लोगों को कन्फ्यूज होना ही था। हो गए और फैसला सुना दिए।
पश्चिम बंगाल में भी वही हाल है। मान लेते हैं कैलाश विजयवर्गीय तो मप्र से जाकर पश्चिम बंगाल के प्रभार की रस्म निभाते हैं। वैसे भी उनका दिल मप्र में लगा रहता है और दिमाग पश्चिम बंगाल में लगाना पड़ता है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष और राज्यपाल जगदीप धनखड़ बारी-बारी तो कभी साथ ही साथ ममता बनर्जी को घेरे रहते हैं। ढोल बाजे के साथ भाजपा में आने वाले शुभेंदु अधिकारी के बारे में भी सबको मालूम है कि वो तो भाजपा के सत्ता में आने पर भी मुख्यमंत्री बनने से रहे, भले ही आगे चलकर वो भाजपा में असम वाले हिमंता बिस्वा सरमा जैसा जौहर ही क्यों न दिखाने लगें, मुख्यमंत्री तो वही बनेगा जो संघ का प्रचारक रहा होगा।
असम में भी 2016 के चुनाव के लिए पहले से ही भाजपा ने सर्बानंद सोनवाल को भेज दिया था। तब वो केंद्र सरकार में मंत्री हुआ करते थे, लेकिन उनको पहले से ही मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया था। शायद ये 2015 में दिल्ली और बिहार चुनाव में भाजपा को मिली हार के चलते ऐहतियाती उपाय भी था। हालांकि, उसके बाद उप्र में भाजपा बगैर चेहरे के ही लड़ी और चुनाव जीतने के कई दिनों बाद तक सस्पेंस बने रहने के बाद योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए। भाजपा की जो भी मजबूरी रहती हो, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जाएगी, भाजपा को मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर हमेशा ही सफाई देती रहनी पड़ सकती है, और ये पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा के लिए बहुत बड़ी बाधा है।
पश्चिम बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं और ये ममता बनर्जी के कोर-वोटर माने जाते हैं। साफ है बाकी बचे 70 फीसदी हिंदुओं में ही भाजपा अपना भविष्य देख रही होगी। अनुपात तो बहुत बड़ा है, लेकिन ममता बनर्जी का वोटर एकजुट होगा। हो सकता है असदुद्दीन ओवैसी उसमें कुछ खलल डालकर वोट काटने की कोशिश करे। ये भी हो सकता है ओवैसी की पार्टी कुछ सीटें जीत भी ले और कई सीटों पर बिहार में चिराग पासवान की तरह बंगाल में ममता बनर्जी की जड़ें खोदने में कामयाब भी रहे, लेकिन ये सब बाद की बातें हैं। ऐसा भी तो नहीं कि सारे हिंदू ममता बनर्जी के खिलाफ ही होंगे और सब के सब एकजुट होकर भाजपा को वोट दे देंगे। याद रहे 2019 की मोदी लहर में भी भाजपा को 18 सीटें ही मिली हैं, जबकि 22 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का कब्जा बरकरार है। अब देखना यह है कि विधानसभा चुनाव में क्या तस्वीर उभरती है।
पीके के हाथ में टीएमसी की रणनीतिक कमान
ममता बनर्जी के हाव-भाव और भाषणों में काफी दिनों से प्रशांत किशोर का असर देखा जा रहा है। भाजपा पर तो वो हमलावर और आक्रामक रहती ही हैं, लेकिन बाकी सबसे हंसते मुस्कुराते मिलती हैं। ऐसा आम चुनाव के दौरान नहीं था। तब तो आलम ये रहा कि चलते-चलते कहीं जय श्रीराम का नारा सुन लेतीं तो गाड़ी रोककर वहीं बिफर पड़ती थीं। परदे के पीछे रहकर प्रशांत किशोर कदम-कदम पर ममता बनर्जी की राजनीति को तराश रहे हैं और भाजपा के सामने खड़ी चुनौतियों में ये भी एक है। यह किसी से छिपा नहीं है कि बंगाल में चाहे स्थानीय चुनाव ही क्यों न हों, चुनावों के दौरान हिंसा आम बात है। लेकिन जब यह राजनीतिक हिंसा बंगाल की धरती पर होती है, तो उसकी पृष्ठभूमि में मां माटी और मानुष का नारा होता है जो मां, माटी और मानुष इन तीनों शब्दों की व्याख्या को संकुचित करने का मनोविज्ञान लिए होता है। इसी प्रकार जब वहां की मुख्यमंत्री बंगाल की धरती पर खड़े होकर गैर बंगला भाषी को बाहरी कहने का काम करती हैं तो वो भारत की विशाल सांस्कृतिक विरासत के आभामंडल को अस्वीकार करने का असफल प्रयास करती नजर आती हैं।
कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन किसके खिलाफ?
पश्चिम बंगाल को लेकर तो पहले से ही साफ था कि कांग्रेस का ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता नहीं होने वाला है और ये इसलिए नहीं कि 2019 के आम चुनाव में ऐसा नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए क्योंकि अधीर रंजन चौधरी को कांग्रेस नेतृत्व ने सूबे में पार्टी की कमान सौंप दी थी। ये अधीर रंजन चौधरी ही थे जो 2011 में भी कांग्रेस के टीएमसी के साथ गठबंधन के कट्टर विरोधी रहे, लेकिन तब केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने उनकी एक न चली। जब सालभर बाद ही ममता बनर्जी ने केंद्र की यूपीए सरकार से कई मसलों को लेकर अपना समर्थन वापस ले लिया तो सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस नेताओं में पहले नंबर पर अधीर रंजन चौधरी ही रहे। अधीर रंजन चौधरी को 2019 के आम चुनाव के बाद कोलकाता से दिल्ली बुलाया गया और लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनाया गया और उसकी बड़ी वजह ये रही कि मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से लोकसभा चुनाव हार गए थे। साथ ही, अमेठी में राहुल गांधी के चुनाव हार जाने के बाद कांग्रेस को कोई ऐसा नेता चाहिए था कि वो भाजपा के हमलों का काउंटर कर सके। ये तो मानना पड़ेगा कि अपने बयानों से अधीर रंजन चौधरी ने कांग्रेस नेतृत्व की उम्मीदों से कई गुना ज्यादा ही अलग प्रदर्शन किया। इससे पहले हुए 2016 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों ने अलग-अलग उम्मीदवार खड़े किए। 2019 में कांग्रेस को तो दो सीटें मिलीं भी, लेकिन लेफ्ट का तो खाता भी नहीं खुल सका।
- दिल्ली से रेणु आगाल